Published on: 26th December 2025
इक्विटी में असली फ़ायदा उन्हें मिलता है जो सुस्त साल झेल पाते हैं और डरावने दौर से निकल जाते हैं. लेकिन निवेशक आज भी यही पूछते हैं. कितना समय काफ़ी होता है?
– तीन साल? – पांच साल? – FD जैसा कोई तय नियम? लेकिन इक्विटी ऐसे काम नहीं करती. यहां असली सवाल सालों का नहीं बल्कि मार्केट साइकिल का होता है.
किसी भी अच्छे कंपाउंडिंग बिज़नेस का शेयर सीधी लाइन में नहीं चलता. 10 से 15 साल में क़ीमत कई गुना हो सकती है, लेकिन बीच में 2-3 साल ठहराव और 30 से 40% की गिरावट आम बात है. चार्ट दूर से आसान लगता है, लेकिन रोज़ाना देखें, तो धैर्य की परीक्षा होती है.
टाइटन का सफ़र – 2010: ₹170 – 2013 से 16: लगभग ठहरा – 2019 से 20: तेज़ गिरावट – 2025: लगभग ₹3,900 जो टिके रहे, उन्हें 15 साल में क़रीब 23% का सालाना रिटर्न मिला. यही धैर्य का इनाम है.
बाज़ार को टाइम करने की कोशिश महंगी पड़ती है. 2010–2025 में पूरे समय निवेश बना रहा, तो इंडेक्स रिटर्न 12% रहा. सिर्फ़ 10 अच्छे दिन मिस किए, तो रिटर्न 8.7% रह गया. बाज़ार शोर में टिके रहने का फ़ायदा देता है.
– बिज़नेस बढ़ रहा हो – निवेश की थीसिस सही हो – वैल्यूएशन बेतुकी न हो ये 3 साल भी हो सकता है, 20 साल भी. असली बढ़त यहीं बनती है.
ये निवेश की सलाह नहीं बल्कि जानकारी के लिए है. अपने निवेश से पहले अच्छी तरह से रिसर्च करें.