Published on: 31st December 2025
ज़्यादातर निवेशकों को 15 फ़ंड की ज़रूरत नहीं होती. सच तो ये है कि सही तरह से चुने गए 4-6 फ़ंड, समय के साथ कहीं ज़्यादा बेहतर और भरोसेमंद नतीजे दे सकते हैं. सवाल संख्या का नहीं, समझ का है.
कई पोर्टफ़ोलियो बचे-खुचे खाने से भरे फ़्रिज जैसे दिखते हैं. 14 इक्विटी फ़ंड, कुछ हाइब्रिड, दो-तीन ELSS और एक-आध NFO. हर SIP छोटी है और किसी को नहीं पता कि कौन-सा फ़ंड क्यों रखा गया है.
ऐसे पोर्टफ़ोलियो देखकर सवाल आता है, “क्या ये डाइवर्सिफ़ाइड है?” जवाब अक्सर होता है, हां, लेकिन ज़्यादातर कन्फ़्यूज़न में. असली डाइवर्सिफ़िकेशन फ़ंड बढ़ाने से नहीं, सही रोल तय करने से आता है.
हर अच्छे पोर्टफ़ोलियो की शुरुआत एक ऐसे कोर इक्विटी फ़ंड से होती है जो चुपचाप सालों तक काम करे. एक अच्छा फ़्लेक्सी-कैप, लार्ज-कैप या सिंपल इंडेक्स फ़ंड अक्सर 60-70 प्रतिशत काम अकेले कर देता है.
दूसरा फ़ंड बेचैनी में नहीं, वजह से जुड़ना चाहिए. – SIP काफ़ी बढ़ गई हो – पोर्टफ़ोलियो बड़ा हो रहा हो – स्टाइल या मैनेजर रिस्क फैलाना हो एक जैसे दो फ़ंड जोड़ना डाइवर्सिफ़िकेशन नहीं, ओवरलैप है.
कोर मज़बूत हो जाने के बाद ही मिड-कैप या दूसरी स्ट्रैटेजी जोड़िए. सैटेलाइट का काम एक्स्ट्रा स्वाद देना है, खाना बदलना नहीं. अगर कोर 70-80 प्रतिशत है, तो बाकी हिस्सा ही सैटेलाइट होना चाहिए.
डेट और हाइब्रिड फ़ंड पोर्टफ़ोलियो का शॉक एब्ज़ॉर्बर होते हैं. ये अच्छे समय में चमकते नहीं, लेकिन गिरावट में पूरे प्लान को बचाते हैं. सही इक्विटी-डेट मिक्स ही निवेशक को टिकाए रखता है.
मज़बूत पोर्टफ़ोलियो शोर से नहीं, अनुशासन से बनता है. 4-6 फ़ंड, जिनका रोल साफ़ हो, अक्सर 15 फ़ंड से बेहतर काम करते हैं. सवाल यही है, आपके हर फ़ंड का असली काम क्या है.
ये निवेश की सलाह नहीं बल्कि जानकारी के लिए है. अपने निवेश से पहले अच्छी तरह से रिसर्च करें.