Published on: 16th Dec 2025
इंडेक्स फ़ंड्स उन निवेशकों के लिए बनाए गए हैं जो कम लागत में पूरे बाज़ार की हिस्सेदारी चाहते हैं और एक्टिव मैनेजमेंट पर निर्भर नहीं रहना चाहते. इनमें निवेश का तरीका भले ही सरल लगे, लेकिन टैक्स का नियम हर Index Fund में एक जैसा नहीं होता. टैक्स पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि फ़ंड भारतीय इक्विटी ट्रैक कर रहा है, डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करता है या फिर इंटरनेशनल इंडेक्स को फॉलो करता है.
निफ़्टी 50, सेंसेक्स या निफ़्टी नेक्स्ट 50 जैसे इंडेक्स को ट्रैक करने वाले फ़ंड भारतीय शेयरों में निवेश करते हैं. इसी वजह से इन्हें इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फ़ंड माना जाता है. इस कैटेगरी का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि यहां लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के लिए होल्डिंग पीरियड छोटा होता है और टैक्स रेट भी तुलनात्मक रूप से कम रहता है. लंबे समय तक निवेश करने वालों के लिए यह टैक्स-एफ़िशिएंट विकल्प बन जाता है.
डेट इंडेक्स फ़ंड्स ऐसे बेंचमार्क को ट्रैक करते हैं जो बॉन्ड्स या सरकारी सिक्योरिटीज़ पर आधारित होते हैं, जैसे क्रिसिल कम्पोज़िट बॉन्ड इंडेक्स या G-Sec इंडेक्स. चूंकि इनमें इक्विटी का एक्सपोज़र नहीं होता, इसलिए इन्हें इक्विटी फ़ंड्स जैसी टैक्स छूट नहीं मिलती. इन फ़ंड्स से होने वाला गेन आपकी इनकम में जुड़ता है और टैक्स आपके इनकम स्लैब के अनुसार लगता है, जिससे टैक्स बोझ बढ़ सकता है.
इंडेक्स फ़ंड्स को अक्सर आसान और सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है, लेकिन टैक्स नियम न समझने पर रिटर्न पर असर पड़ सकता है. एक जैसा दिखने वाला Index Fund टैक्स के मामले में बिल्कुल अलग व्यवहार कर सकता है. सही फ़ंड चुनने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि टैक्स के बाद हाथ में कितना रिटर्न बचेगा. लॉन्ग-टर्म निवेश में यही समझ असली फ़र्क पैदा करती है.
ये निवेश की सलाह नहीं बल्कि जानकारी के लिए है. अपने निवेश से पहले अच्छी तरह से रिसर्च करें.