Published on: 10th November 2025
मिड-कैप फ़ंड्स उन कंपनियों में निवेश करते हैं, जो ग्रोथ स्टेज में होती हैं और तेज़ी से आगे बढ़ सकती हैं. ये ज़्यादा रिटर्न दे सकते हैं, लेकिन इनका रिस्क भी ज़्यादा होता है.
SEBI के नियमों के अनुसार, मिड-कैप फ़ंड्स को कम से कम 65% हिस्सा मिड-कैप स्टॉक्स में लगाना होता है. बाक़ी 35% हिस्सा फ़ंड मैनेजर की रणनीति के अनुसार लार्ज-कैप या स्मॉल-कैप में लगाया जा सकता है.
ज़्यादातर मिड-कैप फ़ंड्स लार्ज-कैप में बहुत कम निवेश करते हैं. औसतन, ये सिर्फ़ 12% लार्ज-कैप स्टॉक्स में लगाते हैं, जिससे पोर्टफ़ोलियो में लार्ज-कैप एक्सपोज़र सीमित रहता है.
अगर आप अच्छी तरह से डायवर्सिफ़ाईड पोर्टफ़ोलियो चाहते हैं, तो सिर्फ़ मिड-कैप फ़ंड्स में निवेश करना सही रणनीति नहीं होगी. इसके लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार करना ज़रूरी है.
फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स में फ़ंड मैनेजर को लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप किसी भी कैटेगरी में निवेश की छूट होती है. हालांकि, हाल के वर्षों में इनमें 80% से अधिक निवेश लार्ज-कैप में किया गया है.
मल्टी-कैप फ़ंड्स में कम से कम 25% हिस्सा लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप में निवेश किया जाता है. यह निवेशकों को सभी मार्केट सेगमेंट्स में सही बैलेंस देता है.
सिर्फ़ मिड-कैप फ़ंड पर निर्भर रहने के बजाय, अलग-अलग कैटेगरी के फ़ंड्स को मिलाकर निवेश करने के बारे में आप सोच सकते हैं. इससे रिस्क बैलेंस रहेगा और हर मार्केट कैप का फ़ायदा मिलेगा.
अगर आप सही एक्सपोज़र और डायवर्सिफ़िकेशन चाहते हैं, तो फ़्लेक्सी-कैप या मल्टी-कैप फ़ंड्स को अपने पोर्टफ़ोलियो में शामिल करना बेहतर रहेगा.
सिर्फ़ मिड-कैप फ़ंड्स पर निर्भर न रहें. अपने निवेश में संतुलन बनाए रखें और अलग-अलग फ़ंड्स को मिलाकर एक बेहतर रणनीति अपनाएं!
ये निवेश की सलाह नहीं बल्कि जानकारी के लिए है. अपने निवेश से पहले अच्छी तरह से रिसर्च करें.