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कई साल पहले मेरा एक दोस्त और उसकी पत्नी हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी शहर मैक्लॉड गंज जाने की छुट्टी रद्द करने पर बात कर रहे थे. मैक्लॉड गंज, जिसे 'छोटा ल्हासा' भी कहते हैं क्योंकि यहां दलाई लामा की निर्वासित सरकार है, एक ख़ास तरह की छुट्टी पसंद करने वालों के लिए बेहद सुंदर जगह मानी जाती है. लेकिन हमारी बातचीत से कुछ दिन पहले मैक्लॉड गंज जाने वाली सड़क पर एक बस हादसा हो गया था. दिल्ली से आए 12 सैलानियों की जान चली गई जब उनकी बस पहाड़ी सड़क से लुढ़कते हुए एक खड्ड में जा गिरी. अब, मेरे दोस्तों को स्वाभाविक रूप से लगा कि पहाड़ी सड़कें यात्रा के लिए बहुत ख़तरनाक हैं. ऐसा है भी? पर किसकी तुलना में? (जैसे एक कॉमेडियन किसी के यह पूछने पर हमेशा कहता था, "आपकी पत्नी कैसी हैं?")
दिलचस्प बात यह है कि उस दौरान जब हम पहाड़ी सड़कों की सुरक्षा पर बहस कर रहे थे, दिल्ली की सड़कों पर क़रीब 15 लोग सड़क हादसों में मर गए. लेकिन इंसान जोखिम को बहुत ग़ैर-बराबर तरीक़े से महसूस करता और आंकता है. शायद पुराने ज़माने में यह ठीक था, लेकिन आज की दुनिया में, जोखिम के बारे में हमारी सोच की वजह से हम अक्सर सही फ़ैसला नहीं कर पाते, चाहे छुट्टी पर कहां जाएं यह हो या पैसा कहां लगाएं. बचत और निवेश के फ़ैसले लगभग पूरी तरह इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम जोखिम से जुड़ी जानकारी को कैसे लेते और समझते हैं और इसे फ़ायदे और मुनाफ़े के साथ कैसे तौलते हैं.
जब मेरे दोस्तों ने मुझे मैक्लॉड गंज वाली मुश्किल के बारे में बताया, उस वक़्त मैंने अभी-अभी Bruce Schneier नाम के एक क़ाबिल अमेरिकी का एक लेख 'दुर्लभ जोखिम और अति प्रतिक्रिया' (Rare Risk and Overreactions) पढ़ा था. Schneier एक क्रिप्टोग्राफ़र और कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ हैं जो धीरे-धीरे हर तरह के जोखिम और सुरक्षा पर सोचने और लिखने वाले बन गए हैं. वो अमेरिका में Virginia Tech की घटना जैसी घटनाओं से उपजी अति प्रतिक्रिया की बात करते हैं, जिसमें एक कॉलेज के छात्र ने पागल होकर कैंपस में 32 लोगों को गोली मार दी थी.
Schneier कहते हैं कि इंसानी दिमाग़ संभावना और जोखिम का आकलन करने में बहुत अच्छा नहीं है, ख़ासकर जब बात दुर्लभ और अनजानी घटनाओं की हो. हम नाटकीय, अजीब और दुर्लभ घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं और सामान्य, जानी-पहचानी और आम घटनाओं को कम आंकते हैं. हमारा दिमाग़ उन सीधे-सादे जोखिमों को बेहतर समझता है जिनसे हमारी प्रजाति सदियों से निपटती आई है, और उन जटिल जोखिमों को कमज़ोर तरीक़े से समझता है जिनका सामना आज का समाज हमें करवाता है.
लोग जानकारी और आंकड़ों के बजाय जीवंत, निजी ब्यौरे के आधार पर ज़्यादा फ़ैसले करते हैं. कोई आपको अलग-अलग तरह के वाहनों की दिन-रात के अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरह की सड़कों पर हादसे की दर बता सकता है. इस जानकारी का इस्तेमाल करके आप एक सोचा-समझा फ़ैसला कर सकते हैं कि क्या सुरक्षित है और क्या नहीं. लेकिन जब आप टेलीविज़न चालू करते हैं और हादसे में परिवार खोने वालों का दुख देखते हैं, तो आपका दिमाग़ उस एक घटना पर टिक जाता है और आपके साथ भी ऐसा ही होने की संभावना को बढ़ा-चढ़ाकर देखने लगता है. Schneier कहते हैं कि अगर कोई चीज़ ख़बर में है, तो उसकी चिंता मत करिए. ख़बर की परिभाषा ही यह है कि 'जो बहुत कम होता है'. सिर्फ़ इसलिए कि TV समाचार नाटकीय हादसे दिखाता है लेकिन अकेले किसी के दिल के दौरे को नहीं दिखाता, इसका मतलब यह नहीं कि किसी की पहली से मरने की संभावना ज़्यादा है.
निजी और जीवंत ब्यौरे का यह असर हर तरह के फ़ैसलों में होता है. मिसाल के तौर पर, जब आपको फ़ाइनेंशियल प्रोडक्ट्स का कोई सेल्समैन यह बताए कि फ़लां शख़्स ने उसकी सलाह मानकर इतना पैसा कमाया, तो आपको उन निजी ब्यौरों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. सही काम यह होगा कि निवेश की प्रकृति, उससे मिलने वाले रिटर्न और मौजूदा विकल्पों से तुलना के बारे में सटीक आंकड़ों और जानकारी पर ध्यान दें. मैं जानता हूं कि निजी ब्यौरों को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है, लेकिन कम से कम वित्तीय ब्यौरे आंकते वक़्त हम पक्की जानकारी पर ध्यान देकर और विज्ञापनों में खुशहाल परिवारों को नज़रअंदाज़ करके बेहतर फ़ैसले कर सकते हैं. आप तो जानते ही हैं, वो असली लोग नहीं हैं.
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