फंड वायर

Nasdaq बढ़ा 9%, मेरा ETF सिर्फ़ 1.7%! क्या ये धोखा है?

आपका इंटरनेशनल ETF इंडेक्स जितना क्यों नहीं बढ़ रहा? आइए समझते हैं वजह

आपका इंटरनेशनल ETF इंडेक्स जितना क्यों नहीं बढ़ रहा? आइए समझते हैं वजहAI-generated image

हाल ही में एक पाठक ने हमसे नाराज़गी और हैरानी के साथ संपर्क किया. उन्होंने बताया कि 8 अप्रैल से 11 अप्रैल के बीच अमेरिका का नैस्डैक-100 इंडेक्स 17,090 से बढ़कर 18,690 हो गया—यानी 9.36% की बढ़त. लेकिन इसी दौरान, मोतीलाल ओस्वाल नैस्डैक 100 ETF, जो इस इंडेक्स को ट्रैक करता है, भारतीय स्टॉक एक्सचेंज पर सिर्फ़ 1.7% बढ़ा—₹164 से ₹167 तक. थोड़े से रुपए के अवमूल्यन को भी ध्यान में रखने के बावजूद, ये अंतर काफी बड़ा लग रहा था.

तो इस अंतर की असली वजह क्या है?

NAV और मार्केट प्राइस में फ़र्क़ ही असली वजह क्या है?
ये अंतर ETF के नेट एसेट वैल्यू (NAV) और उसके मार्केट प्राइस में फ़र्क़ की वजह से आता है. NAV ने सही ट्रैक किया था. ETF की NAV यानी इसकी असल कीमत, जिस पर इसके अंदर मौजूद स्टॉक्स आधारित होते हैं, नैस्डैक के मूवमेंट को बखूबी ट्रैक कर रही थी. 8 अप्रैल से 11 अप्रैल के बीच, इसकी NAV ₹1,439.84 से ₹1,571.70 तक गई—यानी 9.16% की बढ़त, जो Nasdaq के मूवमेंट के लगभग बराबर है.

लेकिन निवेशक ने जो देखा, वो था मार्केट प्राइस
स्टॉक एक्सचेंज पर ETF का जो प्राइस दिखा, वह NAV से अलग था. और यही असल दिक्कत है.

ETF के प्राइस पर क्या असर डालता है?
ETF, म्यूचुअल फंड्स की तरह नहीं होते जो दिन में एक बार NAV पर बिकते हैं. ये स्टॉक्स की तरह पूरे दिन एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं. और इनके प्राइस पर असर डालते हैं:

  • ट्रेडिंग एक्टिविटी
  • निवेशकों की भावना
  • लिक्विडिटी (खरीदारों और विक्रेताओं की संख्या)

इसका मतलब है कि जब ETF की मांग ज्यादा होती है, तो उसका प्राइस NAV से ऊपर चला जाता है—इसे प्रीमियम कहते हैं. जब मांग कम होती है, तो वही ETF NAV से सस्ता बिकता है—इसे डिस्काउंट कहा जाता है.

इंटरनेशनल ETFs में फ़र्क़ ज़्यादा होता है
इंटरनेशनल ETFs में ये फ़र्क़ और भी ज़्यादा होता है, ख़ासकर अभी जब बहुत से इंटरनेशनल म्यूचुअल फ़ंड्स ने नए निवेश लेना बंद कर दिया है. इससे इंटरनेशनल ETFs की ट्रेडिंग और भी असंतुलित हो गई है.

ऊंचे दाम पर ETF खरीदने से कैसे बचें?
आप किसी भी ETF के लिए वैल्यू रिसर्च की वेबसाइट पर जाकर आसानी से NAV और मार्केट प्राइस के बीच के फ़र्क़ को देख सकते हैं. वहां एक 'NAV बनाम प्राइस' चार्ट होता है जो दोनों की परसेंटेज रिटर्न लाइन दिखाता है. अगर दोनों लाइनों में बड़ा गैप है, तो समझिए कि ETF प्रीमियम या डिस्काउंट पर ट्रेड कर रहा है.

मोतीलाल ओस्वाल नैस्डैक 100 ETF के एक साल के चार्ट में आप देख सकते हैं कि कुछ समय ऐसे भी थे जब मार्केट प्राइस (हरी लाइन) NAV (नीली लाइन) से ऊपर या नीचे था.

सिर्फ़ ETF का प्राइस देखकर निवेश न करें
इसीलिए, ख़ासकर इंटरनेशनल ETFs में निवेश करते समय, सिर्फ़ प्राइस देखकर फ़ैसला न लें. हमेशा NAV चेक करें और ये देखें कि क्या ETF अपनी असल वैल्यू के आसपास ट्रेड कर रहा है.

अगर आप प्रीमियम पर ख़रीदते हैं, तो आप ETF की असली वैल्यू से ज़्यादा पैसे दे रहे हैं. और अगर बाद में वो प्रीमियम कम हो गया, तो भले ही इंडेक्स ऊपर जाए, आपके रिटर्न कम हो सकते हैं.

क्योंकि ETF में स्क्रीन पर जो दिखता है, वही पूरी कहानी नहीं होती.

ये भी पढ़ें: क्यों डेट फ़ंड सिर्फ़ रिटायर्ड और बोरिंग लोगों के लिए नहीं है? जानें 3 वजह

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

UPI फ़ीस नहीं, आपकी समस्या एक्सपेंस रेशियो है

पढ़ने का समय 3 मिनटआकार रस्तोगी

NSE IPO: ऐसा बिज़नेस जिसमें कोई कमी निकालना मुश्किल है

पढ़ने का समय 6 मिनटLekisha Katyal

वही 100 स्टॉक, एक फ़ंड ने 53% और चार ने दिया 30% रिटर्न

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

Hero Motors IPO: EV कारोबार बढ़ रहा है, लेकिन क्या इतनी क़ीमत चुकाना सही है?

पढ़ने का समय 7 मिनटसत्यजीत सेन

पैसे की ज़रूरत है? तो समझदारी से बेचिए

पढ़ने का समय 3 मिनटआशुतोष गुप्ता

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

गिरावट का मतलब नुक़सान नहीं होता

आपकी स्क्रीन पर लाल रंग का नंबर कोई नुक़सान नहीं है, आप उस पर कोई कदम उठाकर ही उसे पक्का करते हैं

दूसरी कैटेगरी