फ़र्स्ट पेज

करेक्शन की दीवानगी और रिटर्न की बर्बादी

जानिए, क्यों सही टाइमिंग से वास्तविक रिटर्न बर्बाद हो जाता है?

जानिए, क्यों सही टाइमिंग से वास्तविक रिटर्न बर्बाद हो जाता है?

back back back
4:24

हॉवर्ड मार्क्स की इनवेस्टमेंट मेमो का ज़िक्र मैंने पहले कई लेखों में किया है. मार्क्स निजी तौर पर मुझे पसंद रहे हैं. उन्होंने अपनी किताब “द मोस्ट इंपॉर्टेंट थिंग्स” में मार्केट टाइमिंग को लेकर एक बेहतरीन बात कही है. उन्होंने डे-ट्रेडिंग करने वालों का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि जो लोग ख़ुद को सफल मानते हैं क्योंकि उन्होंने किसी स्टॉक को ₹10 पर ख़रीदकर ₹11 पर बेचा, फिर उसे ₹24 पर ख़रीदा और ₹25 पर बेचा, और आख़िर में ₹39 पर ख़रीदकर ₹40 पर बेच दिया. मार्क्स कटाक्ष करते हुए कहते हैं - अगर आप यह नहीं देख पा रहे कि ₹30 बढ़ने वाले स्टॉक पर सिर्फ़ ₹3 कमाना एक गड़बड़ सोच है, तो शायद आपको निवेश करना ही नहीं चाहिए.

इसी सोच को मैं ‘करेक्शन ऑब्सेशन’ यानी ‘करेक्शन की दीवानगी’ कहता हूं - जब निवेशक लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट में टिके रहने के बजाय निवेश करने के सही समय और उससे बाहर निकने के सही समय का पीछा करते हैं. यह भारतीय इक्विटी निवेश की सबसे आम और सबसे भारी ग़लतियों में से एक बन चुकी है, जिसने आसान पूंजी निर्माण को एक मानसिक दंगल में बदल दिया है.

ये भी पढ़ें: पैसा बनाना आसान है

इस दीवानगी की झलक कई तरीक़े से दिखाई देती है. पहला है ‘परपेचुअल वेटर सिंड्रोम’, यानी वो निवेशक जो लगातार कैश को साइड में रखकर किसी करेक्शन या गिरावट के इंतज़ार में रहते हैं. 10 या 20 प्रतिशत की गिरावट की उम्मीद में वो सालों के संभावित रिटर्न गंवा देते हैं - गिरावट होगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं होती. उनके लिए धैर्य का मतलब है - सही समय तक रुके रहना, जबकि असली समझदारी मार्केट में समय बिताया जाए, जो मार्केट को टाइम करने से बेहतर तरीक़ा है.

फिर आते हैं ‘करेक्शन प्रिडिक्टर’, जो टेक्निकल चार्ट, एक्सपर्ट्स की राय और पुराने पैटर्न देख-देखकर गिरावट की भविष्यवाणियों में जुटे रहते हैं. ये सब कुछ उस ज्योतिषी की तरह है जो ग़लतियों को भूलकर सिर्फ़ सही अनुमान को याद रखता है.

इस टाइमिंग के ट्रैप का सबसे बड़ा नुक़सान तब होता है जब कोई निवेशक सच में गिरावट को पकड़ भी लेता है. वह गिरावट का इंतज़ार करता है, लेकिन पैसा कब लगाना है - इसमें उलझ जाता है. “बॉटम” का इंतज़ार करते-करते पूरी रिकवरी से ही हाथ धो बैठता है. इसकी वजह साफ़ है - गिरावट का कोई तयशुदा कार्यक्रम नहीं होता. ये मार्केट के सामान्य और बेतरतीब उतार-चढ़ाव का हिस्सा है. हर छोटी गिरावट को निवेश का अवसर समझना असली बात को नज़रअंदाज करना है - असली मौक़ा है हर परिस्थिति में लगातार निवेश जारी रखना.

ये भी पढ़ेंः फ़ाइनेंशियल प्लानिंग में सटीक होने का भ्रम

गिरावट के प्रति दीवानगी समय के साथ ख़ुद को लगातार मज़बूत करती जाती है और यही सबसे बड़ी परेशान बन जाती है. ऐसे लोगों को हर छोटी गिरावट में लगता है कि “देखा, हमने सही किया जो रुके रहे,” जबकि वो इस बीच बड़े मुनाफ़े को खो चुके होते हैं. यह एक क्लासिक कन्फ़र्मेशन बायस है - जो बहुत सोच-समझ की आड़ में ख़ुद को सही साबित करने की कोशिश होती है.

विडंबना यह है कि जब असली करेक्शन या गिरावट आती है, तो यही लोग जो सस्ते दामों का इंतज़ार कर रहे थे, अब और ज़्यादा सस्ते दामों का इंतज़ार करने लगते हैं. लालच की जगह डर ले लेता है और करेक्शन एक नया बहाना बन जाता है - कुछ देर और रुके रहने का.

यह भारतीय निवेश संस्कृति की एक बड़ी मुश्किल कही जाएगी कि हमारे यहां ज़्यादातर चर्चा इस पर होती है कि कब निवेश करें, इस पर नहीं कि कहां और कितने समय के लिए निवेश करें. ऐसा लगता है मानो हमने यक़ीन कर लिया है कि अमीर बनने का रास्ता स्मार्ट टाइमिंग से होकर जाता है - जबकि असल जवाब है लॉन्ग टर्म ग्रोथ के लिए निवेश में टिके रहना.

इस दीवानगी का इलाज बहुत आसान है: जितना पैसा है, जब है - उसी समय निवेश शुरू कर दीजिए. फिर मार्केट की परवाह किए बिना नियमित निवेश जारी रखिए. इसमें "परफ़ेक्ट टाइमिंग" की कोई रोमांचक कहानी नहीं होगी, लेकिन संपत्ति ज़रूर बनेगी. कई बार सबसे उबाऊ रणनीति ही सबसे असरदार होती है.

जैसा कि हॉवर्ड मार्क्स कहते हैं - असली कामयाबी यह नहीं कि हर छोटी-बड़ी मूवमेंट को पकड़ लिया जाए, बल्कि यह है कि जब बाक़ी लोग बाज़ार को मात देने की कोशिश में फंसे हों, तब लॉन्ग टर्म रिटर्न का बड़ा हिस्सा पकड़ लिया जाए.

ये भी पढ़ेंः निवेश पर हॉवर्ड मार्क्‍स की बात

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

4 इंटरनेशनल फ़ंड फिर खुले, ये रही पूरी लिस्ट

पढ़ने का समय 6 मिनट•आकार रस्तोगी

दो स्टॉक्स 70% गिरे, फ़ंड्स ने एक को ख़रीदा और दूसरे से किनारा कर लिया

पढ़ने का समय 7 मिनट•अभिषेक राणा

11 शेयर काग़ज़ पर बेहतर दिखते हैं, फिर भी सस्ते मिल रहे हैं

पढ़ने का समय 5 मिनट•अर्पित सूरी

पैसे की ज़रूरत है? तो समझदारी से बेचिए

पढ़ने का समय 3 मिनट•आशुतोष गुप्ता

रिटायरमेंट में सबसे बड़ा जोखिम है ख़ाली बैठना

पढ़ने का समय 2 मिनट•धीरेंद्र कुमार

स्टॉक पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

गिरावट का मतलब नुक़सान नहीं होता

आपकी स्क्रीन पर लाल रंग का नंबर कोई नुक़सान नहीं है, आप उस पर कोई कदम उठाकर ही उसे पक्का करते हैं

अन्य एपिसोड

दूसरी कैटेगरी