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पिछले महीने मेरी मुलाकात एक रिटायर्ड स्कूल प्रिंसिपल से हुई. कागज़ पर देखें तो उनकी आर्थिक स्थिति मज़बूत थी-बैंक में अच्छा-खासा बैलेंस, कुछ म्यूचुअल फंड्स, थोड़ा-सा इंश्योरेंस और यहां तक कि "इमरजेंसी" के लिए गोल्ड भी जमा था. लेकिन पांच मिनट की बातचीत में साफ़ हो गया कि वो आर्थिक रूप से आज़ाद नहीं थीं. उन्हें नहीं पता था कि उनके कौन से फ़ंड काम कर रहे हैं और कौन से बोझ बने हुए हैं. इक्विटी या डेट क्या होते हैं? उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था. कुछ निवेश उनकी बेटी ने सुझाए, कुछ बैंक मैनेजर ने, और कुछ "मेरे दोस्त ने ऐसा किया" के चक्कर में हुए. नतीजा क्या रहा?
ये लेख पहली बार अगस्त 19, 2025 को पब्लिश हुआ.
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