Aditya Roy/AI-Generated Image
जोहो के फाउंडर श्रीधर वेंबु ने हाल में एक्स पर कुछ ऐसा पोस्ट किया जिसने मुझे रुककर निवेश के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. असल में, उन्होंने वो नज़रिया सामने रखा, जिनके बारे में मैंने पहले कभी नहीं सोचा था. उन्होंने तर्क दिया कि वाशिंगटन कन्सेसस ( Washington Consensus) के दौर - दावोस-स्टाइल की सोच पर आधारित ग्लोबलाइजेशन - को "2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट में गहरा झटका लगा, महामारी के दौरान वो मर गया और आज हम उसका अंतिम संस्कार कर रहे हैं." जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वो उनका जिओपॉलिटिकल एनालिसिस नहीं था, बल्कि भारत के सबसे स्मार्ट टैलेंट को लेकर उनकी चेतावनी थी. उन्होंने लिखा, "हम नहीं चाहते कि हमारा सबसे स्मार्ट टैलेंट ख़ास तरह के फ़ाइनांस में जाए. हमें समझना चाहिए कि हम वो उधार ले रहे हैं जिसमें अमेरिका फेल हो चुका है. ये संसाधनों का बड़े स्तर पर ग़लत एलोकेशन है." उन्होंने अमेरिका की फ़ाइनेंशियल इंजीनियरिंग के प्रति जुनून को सीधे 2008 के संकट और उसके बाद की सामाजिक चिंताओं से जोड़ा. भारतीय निवेश से जुड़े सर्किल्स में इन दिनों जो हम देख रहे हैं, वो उसके साथ मेल खाता है. हमने प्रो
ये लेख पहली बार सितंबर 09, 2025 को पब्लिश हुआ.
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