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सारांशः स्मॉल-कैप फ़ंड्स में फिर से तेज़ी आ रही है और इनकी वैल्यूएशन पिछले सात सालों के एवरेज से काफ़ी ऊपर पहुंच गई है. लेकिन पिछली बार 2018 में जब स्मॉल-कैप में भारी उछाल आया था, तब निवेशकों को नुक़सान सहना पड़ा था. इस आर्टिकल में बताया गया है कि तब क्या हुआ था, आज फ़ंड मैनेजर क्या कह रहे हैं और इसका आपके निवेश पर क्या असर हो सकता है.
जुलाई 2025 तक Nifty Smallcap 250 TRI का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) मल्टीपल 35 पर ट्रेड हो रहा है, जो इसके सात साल के एवरेज 31 से ज़्यादा है. फिर भी निवेशक पीछे नहीं हट रहे, क्योंकि स्मॉल-कैप फ़ंड इस साल फ़्लेक्सी-कैप के बाद दूसरी सबसे लोकप्रिय इक्विटी फ़ंड कैटेगरी बन गया है.
लेकिन बढ़ते वैल्यूएशन और निवेश के बढ़ने के साथ एक सवाल उठता है: क्या हम फिर से ख़तरनाक स्थिति में पहुंच रहे हैं? इसका जवाब जानने के लिए 2018 की तस्वीर देखना ज़रूरी है.
पिछली बार 2018 में महंगी हो गई थी वैल्यूएशन
2018 की शुरुआत में स्मॉल-कैप इंडेक्स 70 के हैरान कर देने वाले P/E पर ट्रेड हो रहा था. ये उत्साह जल्द ही दर्दनाक साबित हुआ.
- जनवरी 2018 से दिसंबर 2019 के बीच Nifty Smallcap 250 TRI में 17.5% की गिरावट आई.
- स्मॉल-कैप फ़ंड्स में निवेश करने वालों के लिए भी खुश होने जैसा कुछ नहीं था. इस दौरान 14 में से 13 एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स ने निगेटिव रिटर्न दिया.
- सिर्फ़ Axis Small Cap Fund ट्रेंड से अलग रहा.
- सबसे अहम, 2018-19 के दौरान 10 स्मॉल-कैप फ़ंड्स में 10% से ज़्यादा की गिरावट आई.
ये दौर याद दिलाता है कि जब वैल्यूएशन बहुत ज़्यादा बढ़ जाए, तो स्मॉल-कैप निवेशकों को भारी नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
क्या हम फिर वहीं पहुंच गए हैं?
तो क्या हम 2018 दोहरा रहे हैं? पूरी तरह नहीं. मौजूदा P/E 35 एवरेज से ऊपर है, लेकिन 70 जैसी ऊंचाई से काफ़ी दूर है.
फ़ंड मैनेजर भी सतर्क हैं, लेकिन घबराए हुए नहीं.
Mahindra Manulife Mutual Fund की फ़ंड मैनेजर कीर्ति दलवी ने साफ़ कहा: “सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि कई ग्लोबल मार्केट्स में भी वैल्यूएशन अभी महंगे हैं. क्या इससे मुझे सतर्क होना चाहिए? बिल्कुल, ख़ासकर उन स्टॉक्स या सेक्टर्स में जहां वैल्यूएशन पहले से ही ऊंची है और रैली का दौर बीत चुका है. लेकिन अगर आप हाई P/E दे रहे हैं, तो उसके पीछे हाई ग्रोथ और मज़बूत संभावना का होना ज़रूरी है. इन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता.”
दलवी ज़ोर देती हैं कि असल बात ग्रोथ की स्थिरता है. अगर कंपनी 2 साल नहीं बल्कि 5 या 10 साल तक अर्निंग्स विज़िबिलिटी दे सकती है, तो ज़्यादा क़ीमत देना भी सही है. मतलब, स्मॉल-कैप फ़ंड्स में पैसा लगाने वाले निवेशकों को मानना होगा कि मार्केट में समय बिताना, मार्केट टाइमिंग से ज़्यादा फ़ायदेमंद है.
महंगा… लेकिन शायद सही दांव
Invesco Mutual Fund के फ़ंड मैनेजर आदित्य खे़मानी एक और विचार रखते हैं. वो मानते हैं कि बाज़ार महंगा है, लेकिन बारीक़ियां भी ज़रूरी है. उन्होंने कहा, “कुल मिलाकर, मैं कहूंगा कि मार्केट 20-25% महंगा हो सकता है. हालांकि, सिर्फ़ FY26 या FY27 के P/E रेशियो को देखकर ये कहना कि स्टॉक महंगा है, काफ़ी हल्का नज़रिया है.”
खे़मानी बताते हैं कि अगर आपके पास ऐसी कंपनियां हैं जो अगले 10 साल तक 20% CAGR से अर्निंग्स बढ़ा सकती हैं, तो 20-25% प्रीमियम चुकाने से लॉन्ग-टर्म रिटर्न पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा.
उनके शब्दों में: “अगर अगले दशक में अर्निंग्स 20% CAGR से बढ़ें और आपने स्टॉक 20-25% महंगा ख़रीदा, तो भी कंपाउंडिंग 17-18% CAGR हो सकती है, जो अर्निंग्स ग्रोथ के काफ़ी क़रीब है.”
निवेशकों के लिए क्या मायने हैं
- वैल्यूएशन ऊंचे हैं, लेकिन बबल जैसी स्थिति नहीं है. 2018 जैसा 70 P/E अभी सामने नहीं है.
- बाज़ार में समय बिताना ज़्यादा मायने रखता है. स्मॉल-कैप निवेश का मतलब अगले साल की तेज़ी को पकड़ने का खेल नहीं, बल्कि उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए 7-10 साल तक टिके रहने का मामला है.
- उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना होगा. अगर वैल्यूएशन और बढ़ती है, तो शॉर्ट-टर्म में गिरावट होना तय है. अहम बात ये है कि घबराकर तुरंत बाहर न निकलें.
हमारी राय
स्मॉल-कैप में तेज़ी तो है, लेकिन स्थिति अभी चिंतित होने वाली नहीं है. निवेशकों को अपने रिटर्न उम्मीदें संभालकर रखनी होंगी और याद रखना होगा कि लॉन्ग-टर्म कंपाउंडिंग उनके पक्ष में काम करती है.
हालांकि, पिछले अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले दौर ने उन निवेशकों को नुक़सान पहुंचाया जिन्होंने मोमेंटम का पीछा किया. अहम है कि डिसिप्लिन और डाइवर्सिफ़िकेशन बनाए रखें. अगर स्मॉल-कैप फ़ंड्स में SIP के ज़रिए निवेश कर रहे हैं, तो इसे कम से कम 7-10 साल के नज़रिये से करें.
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वैल्यू रिसर्च में हम न सिर्फ़ बेस्ट-परफॉर्मिंग फ़ंड्स पहचानते हैं बल्कि आपको ये भी गाइड करते हैं कि उनमें निवेश कैसे करना है. स्मॉल-कैप के लिए ये लगभग हमेशा SIP के ज़रिए होता है, एकमुश्त निवेश से नहीं. SIP से आप उतार-चढ़ाव का सामना कर सकते हैं, कॉस्ट एवरेज कर सकते हैं और लंबे समय तक टिके रहकर ग्रोथ की संभावनाओं का फ़ायदा ले सकते हैं.
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