फंड आईडिया

सब्र रखने से बनी पूंजी की ताक़त

सच्ची वेल्थ आकर्षक वित्तीय फ़ैसलों से नहीं, बल्कि स्थिर निवेश, अनुशासन और कंपाउंडिंग पर आधारित होती है.

धैर्यपूर्ण पूंजी: लंबे समय में वेल्थ बनाने की कुंजीAditya Roy/AI-Generated Image

जोहो के फाउंडर श्रीधर वेंबु ने हाल में एक्स पर कुछ ऐसा पोस्ट किया जिसने मुझे रुककर निवेश के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. असल में, उन्होंने वो नज़रिया सामने रखा, जिनके बारे में मैंने पहले कभी नहीं सोचा था. उन्होंने तर्क दिया कि वाशिंगटन कन्सेसस ( Washington Consensus) के दौर - दावोस-स्टाइल की सोच पर आधारित ग्लोबलाइजेशन - को "2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट में गहरा झटका लगा, महामारी के दौरान वो मर गया और आज हम उसका अंतिम संस्कार कर रहे हैं."

जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वो उनका जिओपॉलिटिकल एनालिसिस नहीं था, बल्कि भारत के सबसे स्मार्ट टैलेंट को लेकर उनकी चेतावनी थी. उन्होंने लिखा, "हम नहीं चाहते कि हमारा सबसे स्मार्ट टैलेंट ख़ास तरह के फ़ाइनांस में जाए. हमें समझना चाहिए कि हम वो उधार ले रहे हैं जिसमें अमेरिका फेल हो चुका है. ये संसाधनों का बड़े स्तर पर ग़लत एलोकेशन है." उन्होंने अमेरिका की फ़ाइनेंशियल इंजीनियरिंग के प्रति जुनून को सीधे 2008 के संकट और उसके बाद की सामाजिक चिंताओं से जोड़ा.

भारतीय निवेश से जुड़े सर्किल्स में इन दिनों जो हम देख रहे हैं, उनकी बात उसके साथ मेल खाती है. हमने प्रोडक्टिव और धैर्य के साथ वेल्थ बनाने की क़ीमत पर "फाइनेंशियल सोफिस्टिकेशन" के प्रति एक ग़लत तरह का आकर्षण विकसित कर लिया है. आज किसी भी चर्चा पर ग़ौर करें तो आपको मैक्रो कॉल्स, डेरिवेटिव स्ट्रैटेजीज़ और जटिल ट्रेडिंग सेट-अप्स के बारे में लंबी-लंबी थ्योरीज सुनाई देंगी. वहीं, नियमित निवेश, डाइवर्सिफ़िकेशन और मार्केट साइकल्स के दौरान डटे रहने जैसे बेसिक्स को बोरिंग मानकर खारिज कर दिया जाता है.

वेंबु के टैलेंट के ग़लत एलोकेशन से जुड़े विचारों में निवेशकों के पूंजी के ग़लत एलोकेशन पर बात की गई हैं. जिस तरह से अमेरिका के सबसे चमकदार टैलेंट असली बिज़नेस बनाने के बजाय वॉल स्ट्रीट पर जाकर और जटिल उत्पाद डिज़ाइन करने लगे, वैसे ही कई भारतीय निवेशक अब प्रोडक्टिव निवेश की बजाय फ़ाइनेंशियल इंजीनियरिंग का पीछा कर रहे हैं. चीन की टेक्नोलॉजी के साथ वेंबु जो समानांतर बात रखते हैं, उस पर विचार करें. चीन ने करेंसी ट्रेड्स या हेज-फ़ंड स्ट्रैटेजीज़ को परफेक्ट करके क्षमताएं विकसित नहीं कीं. उसने धैर्य के साथ एडवांस्ड मेटलर्जी, कंपोजिट्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे "बोरिंग" क्षेत्रों निवेश किया. इसके लिए जिसकी ज़रूरत थी, उसे "धैर्यपूर्ण पूंजी" (patient capital) कहते हैं और उसे तिमाहियों में नहीं, बल्कि दशकों में निवेश किया जाता है.

वही सिद्धांत व्यक्तिगत वेल्थ बिल्डिंग पर लागू होता है, जिसे हम भूलते जा रहे हैं. पिछले कुछ दशकों में भरपूर वेल्थ बनाने वाले निवेशकों ने साइकल्स का अनुमान (टाइमिंग) लगाकर या ग्लोबल जिओपॉलिटिक्स को डीकोड करके ऐसा नहीं किया. उन्होंने धैर्य के साथ पूंजी यानि डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो में नियमित निवेश, कई मार्केट साइकल्स के दौरान होल्ड करके, कंपाउंडिंग को भारी काम करने देकर ऐसा किया.

फिर भी हमारी चर्चा ने हमारे होरिजोन यानि समय को कम कर दिया है. वेंचर कैपिटल के सात-आठ साल के एक्ज़िट पहले से ही टेक्नोलॉजी पर पकड़ बनाने के लिहाज़ से बहुत छोटे हैं. रिटेल निवेशक अक्सर महीनों या हफ्तों में सोचते हैं. नतीजा वही ग़लत एलोकेशन है. वेंबु इसे राष्ट्रीय स्तर पर कुछ इस तरह चिह्नित करते हैं- संसाधन प्रोडक्टिव वेल्थ तैयार करने के बजाय वित्तीय तिकड़मों की ओर लगते हैं.

वेंबु का सुझाव - "डीप टेक में 5–10 साल के स्प्रिंट" और कुछ क्षेत्रों में "10–15 साल" - निवेश पर साफ़-साफ़ लागू होता है. असल में, आरएंडडी महंगा नहीं है, बल्कि इसमें ख़ासा समय लगता है. वेल्थ बनाने के लिए बड़ी रकम से शुरुआत करने की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि इसके लिए कंपाउंडिंग को वो समय देना होता है जिसकी उसे ज़रूरत होती है.

वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र के सब्सक्राइबर्स के लिए इसका मुख्य सबक़ अहम है:

  • सिस्टमैटिक रहें. SIP को साइकल्स के दौरान जारी रखें; डरकर पॉज करने के बजाय कमज़ोरी के दौर में ऐड करें.
  • डाइवर्सिफ़ाइड रहें और रीबैलेंस करें. अपने टारगेट एसेट मिक्स पर नज़र रखें और सुर्खियों को देखकर नहीं, बल्कि सही समय पर रीबैलेंस करें.
  • फ़ाइनेंशियल व्यस्तता से दूर रहें. तेज़ी से बदलाव, डेरिवेटिव पर दांव लगाने, महीने के थीम फ़ंड्स और लगातार स्ट्रैटेजी बदलने से बचें.
  • जो मायने रखता है, उसका आकलन करें. तिमाहियों के आधार पर नहीं, पांच साल की विंडो पर तेज़ी का आकलन करें; प्लान पर कायम रहें.

विडंबना ये है कि असल लंबे समय पर फोकस करके, राष्ट्र और व्यक्ति दोनों अक्सर शॉर्ट-टर्म के बेहतर नतीजों की उम्मीद करते हैं. फ़ाइनेंशियल इंजीनियरिंग की बजाय आरएंडडी में निवेश करने वाली कंपनियां बेहतर नतीजे देती हैं. "मार्केट्स को मात देने" की बजाय वेल्थ बनाने पर फोकस करने वाले निवेशक आमतौर पर बेहतर करते हैं. ये वाशिंगटन-कन्सेसस के बाद की दुनिया के लिए असली सबक़ हो सकता है: टिकाऊ समृद्धि-व्यक्तिगत और राष्ट्रीय-उस धैर्य की मांग करती है जिसे छोड़ने के लिए बाज़ार हमें लगातार ललचाते हैं. VRFA में हमारा काम आपको उस धैर्य के साथ जोड़े रखना और सुनिश्चित करना है कि आपका प्लान कंपाउंडिंग करता रहे.

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ये भी पढ़ेंः हम अपने फ़ंड विकल्पों को कैसे बेहतर बना रहे हैं

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