बड़े सवाल

‘मेरे पोर्टफ़ोलियो में 25 फ़ंड हैं. शुरुआत कहां से करूं?’

अपने पोर्टफ़ोलियो को साफ़ करने की एक आसान गाइड

अपने पोर्टफ़ोलियो को साफ़ करने की एक आसान गाइडMukul Ojha/AI-Generated Image

सारांशः पोर्टफ़ोलियो में बहुत ज़्यादा फ़ंड होना पहली नज़र में रिटर्न बढ़ाने का आसान तरीक़ा लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे वही बोझ बन जाते हैं. ये स्टोरी बताती है कि कैसे स्टेप-बाय-स्टेप अपने म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो को साफ़ किया जाए ताकि बेहतर नतीजे मिल सकें.

25 म्यूचुअल फ़ंड. कुछ निवेश की शुरुआती दिनों के, कुछ किसी दोस्त की सलाह पर लिए गए, कुछ NFO के समय उठाए गए. एक पाठक ने हमें लिखा, ये समझ नहीं पा रहा था कि कौन से फ़ंड काम कर रहे हैं, कौन से एक जैसे हैं और क्या ये सब उनके असल मक़सद से जुड़े भी हैं या नहीं.

ये कोई असामान्य स्थिति नहीं है. पोर्टफ़ोलियो एक दिन में उलझे नहीं बनते. ये धीरे-धीरे, हर बार एक “अच्छा आइडिया” जोड़ते-जोड़ते भर जाते हैं. और नतीजा लगभग हमेशा एक जैसा होता है: ज़्यादा फ़ंड, लेकिन ज़्यादा डाइवर्सिफ़िकेशन नहीं. ज़्यादा जटिलता, लेकिन ज़्यादा साफ़ समझ नहीं.

इसे ठीक करने का तरीक़ा ये है.

पहले आपके गोल, फिर फ़ंड

पोर्टफ़ोलियो को साफ़ करते समय सबसे आम ग़लती ये होती है कि लोग सबसे पहले अपने फ़ंड देखने लगते हैं.

इसके बजाय अपने गोल से शुरुआत करें. किस चीज़ के लिए बचत कर रहे हैं? पैसे की ज़रूरत कब पड़ेगी? कितना जोख़िम लिया जा सकता है? इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही सही एसेट एलोकेशन तय होगा, यानी आपकी रक़म का कितना हिस्सा इक्विटी, डेट और दूसरे एसेट्स में होना चाहिए.

इसके बाद ही अपना पोर्टफ़ोलियो स्टेटमेंट खोलें.

मान लीजिए दो गोल हैं: 20 साल बाद रिटायरमेंट, जिसके लिए 70% बचत चाहिए और दो साल बाद कार ख़रीदनी है, जिसके लिए 30% चाहिए. अगर आपके पोर्टफ़ोलियो का 60% शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड में एलोकेट किया गया है, तो ये ग़लत एलोकेशन है, चाहे वो फ़ंड कितने भी अच्छे क्यों न हों.

इसलिए, पहले एलोकेशन ठीक करें. बाक़ी सब अपने-आप ठीक होता है.

एक फ़ंड कई काम कर सकता है

जब आपका टारगेट एलोकेशन साफ़ हो जाए, तो हर फ़ंड को किसी गोल से जोड़ें.

इक्विटी फ़ंड लॉन्ग-टर्म गोल के लिए होते हैं. डेट या लिक्विड फ़ंड शॉर्ट-टर्म ज़रूरत के लिए. अगर किसी फ़ंड का कोई साफ़ मक़सद नहीं है, तो शायद उसे पोर्टफ़ोलियो में नहीं होना चाहिए.

एक बात याद रखने लायक है: हर गोल के लिए अलग फ़ंड की ज़रूरत नहीं होती. अगर 10 लॉन्ग-टर्म गोल हैं, तो तीन अच्छे इक्विटी फ़ंड सबको कवर कर सकते हैं. मायने फ़ंड की संख्या का नहीं, बल्कि कुल निवेश की रक़म का है जो सभी गोल पूरे कर सके.

5% से कम एलोकेशन मदद नहीं करता

हर फ़ंड को अपने कुल पोर्टफ़ोलियो के हिस्से के रूप में देखें. जो फ़ंड 5% से कम हैं, वो रिटर्न पर कोई असर नहीं डालते, लेकिन जटिलता बढ़ाते हैं. एक और स्टेटमेंट, एक और ट्रैकिंग, एक और टैक्स कैलकुलेशन.

ऐसे फ़ंड हटाएं और उन फ़ंड में जोड़ें जो पहले से ही पोर्टफ़ोलियो में अहम जगह रखते हैं.

एक अपवाद है: अगर किसी फ़ंड में धीरे-धीरे निवेश बढ़ाया जा रहा है और अभी वो 5% से कम है, तो उसे रखा जा सकता है.

यह भी पढ़ेंः पोर्टफ़ोलियो में Mutual Funds की संख्या कैसे कम करें?

कमज़ोर फ़ंड हटाएं, महंगे ठीक करें

ख़राब फ़ंड वो होता है जो लंबे समय तक अपने बेंचमार्क से पीछे रहा हो. इसे देखने का एक आम तरीक़ा है पांच साल का डेली रोलिंग रिटर्न. अगर कोई फ़ंड लगातार पीछे रहा है, तो उसे ख़ुद को साबित करने का काफ़ी समय मिल चुका है.

अब क्या करें? बाहर निकलें.

इसके बाद देखें कि कहीं आपके पास रेगुलर प्लान तो नहीं हैं. रेगुलर प्लान में एक्सपेंस रेशियो ज़्यादा होता है क्योंकि इसमें डिस्ट्रीब्यूटर को कमीशन शामिल होता है. ये अंतर, अक्सर 0.5 से 1% सालाना, समय के साथ चुपचाप रिटर्न कम करता रहता है. अगर फ़ंड अच्छा है, तो उसका डायरेक्ट प्लान लें. वही फ़ंड, कम लागत.

ध्यान रखें कि अगर एक-दो साल में पैसे निकालने हैं, तो स्विच करने से होने वाली बचत बहुत कम होगी. यहां एक सवाल उठता है. अगर स्विच न करने की वजह सिर्फ़ टैक्स है, तो स्विच करना बेहतर है क्योंकि टैक्स से बचा नहीं जा रहा, सिर्फ़ टाला जा रहा है. लेकिन अगर झंझट से बचना है और समय कम बचा है, तो मौजूदा प्लान जारी रखा जा सकता है.

सेक्टोरल फ़ंड: तभी काम के जब सही तरह से इस्तेमाल हों

सेक्टोरल और थीमैटिक फ़ंड, जैसे फ़ार्मा, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर और कंजम्प्शन, में वो जोख़िम होता है जो डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड में नहीं होता. जब सेक्टर गिरता है, तो बचने की जगह नहीं होती. डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड सेक्टर बदल सकता है. सेक्टोरल फ़ंड नहीं.

इसका मतलब ये नहीं कि इन्हें पूरी तरह छोड़ देना चाहिए. लेकिन दो शर्तें ज़रूरी हैं. पहली, ये कभी कोर पोर्टफ़ोलियो का हिस्सा नहीं होने चाहिए. ये जोड़ होते हैं, आधार नहीं.

दूसरी, 5% से कम एलोकेशन इतना छोटा होता है कि रिटर्न पर असर नहीं डालता, लेकिन पोर्टफ़ोलियो को उलझा देता है. या तो इसे ठीक से बढ़ाएं या पूरी तरह निकाल दें.

यह भी पढ़ेंः एक और फ़ंड जोड़ने की छुपी क़ीमत: क्या आपकी निवेश गाड़ी बोझिल हो रही है?

बड़े पोर्टफ़ोलियो में AMC का फैलाव रखें

अगर पोर्टफ़ोलियो बड़ा है, जैसे ₹50 लाख से ज़्यादा, तो रक़म कम से कम चार AMC में फैली होनी चाहिए. हर AMC की अपनी स्ट्रैटेजी होती है और कभी-कभी वो लंबे समय तक काम नहीं करती.

मान लीजिए कोई AMC ग्रोथ स्ट्रैटेजी फॉलो करती है. अगर वो स्ट्रैटेजी कुछ समय के लिए काम न करे, तो उसके ज़्यादातर फ़ंड एक साथ कमज़ोर दिखेंगे, चाहे फ़ंड मैनेजर कितने भी अच्छे हों.

चार या उससे ज़्यादा AMC में फैलाव रखने से ये सुनिश्चित होता है कि एक ही स्टाइल पूरा पोर्टफ़ोलियो नीचे न खींचे.

अंत में एक सवाल

लेकिन एक सवाल हर निवेशक के लिए है, चाहे पोर्टफ़ोलियो छोटा हो या बड़ा: ये फ़ंड यहां क्यों है? अगर हर फ़ंड के लिए इसका जवाब नहीं है, तो समझ लीजिए कि शुरुआत कहां से करनी है.

अगर ये समझना हो कि किसी फ़ंड में निवेश करें, निकालें या बने रहें, तो Value Research Fund Advisor सब्सक्राइब करें. इसमें व्यक्तिगत सलाह, रियल-टाइम परफ़ॉर्मेंस एनालेसिस और एक्सपर्ट की रेकमंडेशन मिलती हैं.

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यह भी पढ़ेंः डायरेक्ट Vs रेगुलर म्यूचुअल फ़ंड: आपके लिए क्या सही है?

ये लेख पहली बार मार्च 17, 2026 को पब्लिश हुआ.

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