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एक बिल्कुल सही शुरुआत

क्यों आपका पहला फ़ंड आपका बेस्ट फ़ंड नहीं होना चाहिए

बिल्कुल सही शुरुआत: क्यों शुरुआती बेस्ट फ़ंड एक दोयम दर्जे का हो सकता हैAnand Kumar

निवेश की दुनिया में एक अजीब-सी दीवानगी है, वो एक बिल्कुल सही फ़ंड खोजने की है. किसी भी फ़ाइनेंशियल फ़ोरम पर नज़र डालिए, तो वहां ऊंचे रिटर्न, कम उतार-चढ़ाव या सबसे स्मार्ट स्ट्रैटेजी पर अंतहीन बहस मिलेंगी. मानो गणितीय तौर पर सबसे सही विकल्प का चुनाव कर लेना ही सफलता की गारंटी हो. ये समझ में आने वाली सोच है, लेकिन इसमें लंबी अवधि की वेल्थ बनाने का सबसे अहम पहलू ग़ायब है, जो निवेश से जुड़े रहना है.

इस महीने की कवर स्टोरी एक ऐसे सवाल का जवाब देती है जो हमारे रिटर्न के प्रति सनक भरे कल्चर में काफ़ी हद तक ग़लत लगती है. ये सवाल है- क्या होगा अगर सबसे अच्छा स्टार्टर फ़ंड सबसे अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड वाला नहीं है? क्या होगा अगर नए निवेशकों के लिए ‘बेहतर’ चुनाव वास्तव में ‘कमज़ोर’ चुनाव हो? इसका जवाब इस बात को समझने में है कि निवेश सिर्फ़ पैसों का खेल नहीं है, बल्कि दिमाग़ी और मनोवैज्ञानिक खेल भी है.

इंसानी दिमाग़ बाज़ार की लय के लिए बना ही नहीं है. हम ख़तरे से भागने के लिए प्रोग्राम किए गए हैं और जब हमारा पोर्टफ़ोलियो 15% गिरता है तो वही डर जाग जाता है. ये कोई कमी नहीं, बल्कि विकास की देन है. हमारे पूर्वज जो पहले संकेत पर घबरा गए, वही ज़िंदा बचे.

लेकिन निवेश में यही प्रवृत्ति विनाशकारी साबित होती है. कंपाउंडिंग का सबसे बड़ा दुश्मन वोलैटिलिटी नहीं है, बल्कि वो निवेशक है जो बीच में ही हार मान लेता है.

एक नए इक्विटी निवेशक की यात्रा पर ग़ौर कीजिए. शुरुआत में उत्साह होता है, मार्केट के दिग्गजों की कहानियों और कंपाउंडिंग के चार्ट्स शामिल रहते हैं. फिर आती है पहली बड़ी गिरावट. अचानक, तर्क और घबराहट टकराते हैं क्योंकि महीनों की SIP का मूल्य घट जाता है. ये पहला ज़ख़्म गहरा होता है. कई निवेशक फिर कभी उभर ही नहीं पाते.

इसीलिए शुरुआती फ़ंड का सवाल ज़्यादा अहम है. बात अगले 10 साल में सबसे ऊंचे रिटर्न की नहीं है. बात उस निवेश की है, जो नए निवेशक को इक्विटी मार्केट के अलग-अलग साइकल्स से गुज़रने का अनुभव दे, लेकिन इक्विटी से डर पैदा न करे. इसे एक ‘वैक्सीन’ समझिए, ऑप्टिमाइज़ेशन (अनुकूलन) नहीं.

यही कारण है कि बैलेंस्ड एडवांटेज फ़ंड्स, भले ही मीडियम रिटर्न देते हों, लेकिन इक्विटी निवेश में शुरुआत करने के लिहाज़ से समझदारी भरे विकल्प हैं. ये वोलैटिलिटी ख़त्म नहीं करते, क्योंकि वही तो सिखाने का असली बिंदु है. लेकिन ये झटकों को इतना हल्का कर देते हैं कि गिरावट डरावनी न लगे, बल्कि सीख देने वाली बने. 15% की बजाय 6% की गिरावट भी वही सबक़ सिखा सकती है, बस इसमें उतनी घबराहट नहीं होती जो लंबे समय के लिए इक्विटी निवेश से दूर कर दे.

इस रणनीति की असली खूबसूरती समय के साथ नज़र आती है. जो निवेशक पहले मध्यम रिटर्न देने वाले फ़ंड से शुरुआत करता है और फिर धीरे-धीरे प्योर इक्विटी की तरफ़ बढ़ता है, वो बाज़ार की पूरी भावनात्मक यात्रा को जी चुका होता है. इसकी तुलना उस निवेशक से कीजिए जो सीधे एग्रेसिव इक्विटी से शुरू करता है. अगर उसकी शुरुआत बुल मार्केट में हुई, तो उसकी उम्मीदें अवास्तविक हो सकती हैं. अगर गिरावट के दौर में हुई, तो वो इक्विटी छोड़ भी सकता है. दोनों ही नतीजे लंबे समय के लिए अच्छे नहीं होते.

ये सबक़ सिर्फ़ फ़ंड चुनने तक सीमित नहीं है. एक ऐसी दुनिया में जहां हर कोई ऑप्टिमाइज़ेशन के पीछे भाग रहा है, हम अक्सर भूल जाते हैं कि सबसे अच्छा समाधान वो नहीं होता जो काग़ज़ पर सबसे अच्छा दिखे. कभी-कभी सबसे असरदार रास्ता वो होता है, जो इंसानी स्वभाव को ध्यान में रखे, उसके ख़िलाफ़ न जाए.

इन्वेस्टमेंट इंडस्ट्री तब ग़लती करती है, जब नए निवेशकों को जटिल रणनीतियां पेश करती है और बिना इस बात पर ग़ौर किए ऐसा किया जाता है कि उनके पास उन्हें निभाने की भावनात्मक बुनियाद है या नहीं. ये ठीक वैसा है जैसे किसी को बेसिक जोड़-घटाना सिखाए बिना एडवांस्ड कैलकुलस पढ़ाना. ज्ञान बहुमूल्य हो सकता है, लेकिन ये सही वक़्त से पहले की बात भी हो सकता है.

नए निवेशकों के लिए सबसे अहम बात परफ़ेक्ट फ़ंड खोजना नहीं है, बल्कि वो फ़ंड खोजना है जो उन्हें परफ़ेक्ट निवेशक बनने में मदद करे. असल में, परफ़ेक्ट शुरुआत वही है जो थोड़ी ‘इम्परफ़ेक्ट’ (आधी-अधूरी) हो.

सही सोच के साथ शुरुआत कीजिए

इस महीने की म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट की कवर स्टोरी इस मिथक को चुनौती देती है कि सबसे ऊंचा रिटर्न देने वाला फ़ंड ही शुरुआत के लिए सबसे अच्छा है. हम बताते हैं कि क्यों कुछ ‘कमज़ोर दिखने वाले’ फ़ंड नए निवेशकों के लिए वास्तव में बेहतर हो सकते हैं और कैसे ये आत्मविश्वास और भावनात्मक मज़बूती पैदा कर सकते हैं, ताकि वे लंबे समय तक निवेश से जुड़े रहें.

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