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सारांशः अगर ₹1 करोड़ म्यूचुअल फ़ंड में निवेश किए जाएं और हर साल 20 प्रतिशत रिटर्न के साथ हर महीने ₹1 लाख इनकम चाहिए, तो पैसा कहां निवेश किया जाए? मेरी उम्र 80 साल से ज़्यादा है– एक पाठक
कभी-कभी हमें ऐसे सवाल मिलते हैं जो ये दिखाते हैं कि निवेशक बाज़ार से क्या उम्मीद रखते हैं और असल में बाज़ार क्या देता है, इनके बीच कितना फ़र्क होता है.
हाल ही में ऐसा ही एक सवाल हमारे इनबॉक्स में आया. निवेशक ने पूछा: “अगर मेरे पास म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने के लिए ₹1 करोड़ हों और मुझे हर साल 20 प्रतिशत रिटर्न के साथ हर महीने ₹1 लाख इनकम चाहिए, तो मुझे कहां निवेश करना चाहिए? मेरी उम्र 80 साल से ज़्यादा है.”
ये एक ईमानदार सवाल है, लेकिन काफ़ी कुछ बताने वाला भी है. इसके अंदर दो आम उम्मीदें छिपी हैं: पहली, कि बाज़ार लगातार बहुत ऊंचे रिटर्न दे सकता है. दूसरी, कि एक छोटा सा कॉर्पस भी बड़ी निकासी को आराम से संभाल सकता है. आइए दोनों को समझते हैं.
20 प्रतिशत से ज़्यादा रिटर्न की हक़ीक़त
निवेशक अक्सर मान लेते हैं कि अगर हाल के सालों में बाज़ार ने बहुत अच्छे रिटर्न दिए हैं, तो आगे भी लंबे समय तक ऐसा ही चलता रहेगा. कोविड क्रैश के बाद आई तेज़ी इसका अच्छा उदाहरण है.
9 मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक़, Nifty Midcap 150 TRI ने तीन साल में लगभग 22 प्रतिशत रिटर्न दिया, जबकि स्मॉल-कैप शेयरों ने क़रीब 19 प्रतिशत रिटर्न दिया. सात साल की अवधि में भी इनके रिटर्न लगभग 20 प्रतिशत और 17 प्रतिशत के आसपास रहे.
लेकिन बाज़ार हमेशा सीधी लाइन में नहीं चलता. इसलिए हर साल 20 प्रतिशत रिटर्न की उम्मीद करना सही नहीं है.
इसे समझने के लिए हमने पिछले 20 साल में लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप के रोलिंग रिटर्न देखे. ख़ास तौर पर ये देखा कि अलग-अलग समयावधि में कितनी बार रिटर्न 20 प्रतिशत से ज़्यादा रहे. नीचे दी गई टेबल इसका सार बताती है.
समय के साथ 20% रिटर्न मिलने की संभावना कम होती जाती है
पिछले 20 साल में लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप इंडेक्स में 20 प्रतिशत से ज़्यादा रिटर्न मिलने का प्रतिशत
| इंडेक्स | 1 साल | 3 साल | 5 साल | 7 साल | 10 साल |
|---|---|---|---|---|---|
| निफ़्टी 100 | 32.9 | 9.8 | 3.3 | 0 | 0 |
| निफ़्टी मिडकैप 150 | 43 | 46.6 | 38.3 | 14.1 | 20.8 |
| निफ़्टी स्मॉलकैप 250 | 41.7 | 41.2 | 28.3 | 4.5 | 5.8 |
| आंकड़े प्रतिशत में हैं. टोटल रिटर्न इंडेक्स (TRI) पर विचार किया गया है. | |||||
एक साल की अवधि में ख़ासकर मिड और स्मॉल-कैप में मज़बूत रिटर्न काफ़ी बार दिखते हैं. तीन साल से ज़्यादा की अवधि में भी इसकी संभावना काफ़ी हद तक बनी रहती है.
लेकिन जैसे-जैसे समयावधि बढ़ती है, संभावना तेज़ी से घट जाती है. 10 साल जैसी लंबी अवधि में 20 प्रतिशत से ज़्यादा रिटर्न मिलने के उदाहरण काफ़ी कम हो जाते हैं.
यहां एक सवाल उठ सकता है: अगर कम समय में ऊंचे रिटर्न की संभावना ज़्यादा है, तो फिर उसी पर ध्यान क्यों न दिया जाए? वजह यह है कि कम समय में ही अनिश्चितता सबसे ज़्यादा होती है.
कम समय के जोखिम के साथ कम समय का रोमांच
जब हम इन्हीं रोलिंग पीरियड में यह देखते हैं कि बाज़ार कितनी बार नेगेटिव रिटर्न देता है, तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है.
मार्केट कितनी बार नेगेटिव रिटर्न देते हैं?
एक साल की अवधि में नुक़सान में रहने की संभावना ज़्यादा रहती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बढ़ता है, इसकी आशंका कम हो जाती है या न के बराबर हो जाती है.
| इंडेक्स | 1 साल | 3 साल | 5 साल | 7 साल | 10 साल |
|---|---|---|---|---|---|
| निफ़्टी 100 | 19.3 | 2 | 0 | 0 | 0 |
| निफ़्टी मिडकैप 150 | 25 | 8.3 | 0.6 | 0 | 0 |
| निफ़्टी स्मॉलकैप 250 | 36.8 | 16.7 | 8.3 | 0 | 0 |
| आंकड़े प्रतिशत में हैं. टोटल रिटर्न इंडेक्स (TRI) पर विचार किया गया है. | |||||
ऊपर की तालिका दिखाती है कि एक साल की अवधि में लार्ज-कैप में लगभग 19 प्रतिशत समय नेगेटिव रिटर्न आए. मिड-कैप में ये लगभग 25 प्रतिशत और स्मॉल-कैप में लगभग 37 प्रतिशत रहा.
निवेशकों को जहां समझौता करना पड़ता है: कम अवधि में रिटर्न की संभावना ज़्यादा होती है, लेकिन जोखिम भी ज़्यादा होता है. लंबी अवधि जहां उतार-चढ़ाव को कुछ हद तक कम कर देती है, वहीं रिटर्न भी थोड़ा संतुलित हो जाता है.
इसलिए 20 प्रतिशत रिटर्न मिलना असंभव नहीं है, लेकिन हर बार इसकी उम्मीद करना वैसा ही है जैसे हर क्रिकेट मैच में शतक की उम्मीद करना. ऐसा कभी-कभी होता है, हर बार नहीं.
सवाल का दूसरा हिस्सा: हर महीने ₹1 लाख
पहली नज़र में गणित आसान लगता है: हर महीने ₹1 लाख यानी साल में ₹12 लाख. यानी ₹1 करोड़ के कॉर्पस पर 12 प्रतिशत निकासी दर. यहीं से असली चुनौती शुरू होती है.
आंकड़ों पर जाने से पहले एक बात समझना ज़रूरी है. रिटायर हो चुके लोगों के लिए पूरा पोर्टफ़ोलियो अगर सिर्फ़ इक्विटी फ़ंड में हो, तो उससे नियमित निकासी करना सही नहीं माना जाता. क्योंकि बाज़ार गिरने पर पोर्टफ़ोलियो की वैल्यू कुछ समय के लिए कम हो सकती है.
एक संतुलित तरीका ये होता है कि कॉर्पस को इक्विटी और डेट में बांटा जाए. आम तौर पर इक्विटी 30 से 60 प्रतिशत और डेट 40 से 70 प्रतिशत के बीच रखा जाता है. निकासी डेट हिस्से से की जा सकती है और समय-समय पर इक्विटी से उसे फिर से भरा जा सकता है.
मान लें कि ऐसा पोर्टफ़ोलियो सालाना लगभग 10 प्रतिशत रिटर्न देता है. ऐसे में कॉर्पस कितने समय तक चलेगा, ये मुख्य रूप से निकासी दर पर निर्भर करता है. नीचे दी गई टेबल अलग-अलग स्थितियों में इसकी अवधि दिखाती है.
आपके रिटायरमेंट कॉर्पस पर अलग-अलग विड्रॉल स्ट्रैटेजी का असर
अलग-अलग विड्रॉल नियमों और रिटर्न के अनुमानों के तहत ₹1 करोड़ के पोर्टफ़ोलियो की अनुमानित लाइफ़
| परिदृश्य | शुरुआती मंथली विड्रॉल | विड्रॉल का नियम | कॉर्पस कब तक चलेगा (अनुमानित) |
|---|---|---|---|
| फ़िक्स्ड विड्रॉल | ₹1 लाख | कोई बढ़ोतरी नहीं | 15 साल |
| महंगाई के साथ एडजस्टेड | ₹1 लाख | 6% | 10 साल |
| टिकाऊ विड्रॉल | लगभग ₹50,000 | 6% विड्रॉल रेट से शुरू करें; हर साल 6% बढ़ाएं | 25 साल |
| माना जाता है कि कॉर्पस हर साल 10% की दर से बढ़ेगा और सालाना महंगाई दर 6% होगी. पहले साल की शुरुआत में और हर अगले साल की शुरुआत में पैसे निकालने का अनुमान है। | |||
जैसा कि टेबल में दिखता है, हर महीने ₹1 लाख निकालने से कॉर्पस तेज़ी से कम होने लगता है. अगर निकासी स्थिर रहे, तो पैसा लगभग 15 साल तक चलता है. लेकिन अगर निकासी महंगाई के साथ बढ़ती रहे, जो कि ज़्यादा वास्तविक स्थिति है, तो कॉर्पस लगभग 10 साल में ही ख़त्म हो सकता है.
असल समस्या कम रिटर्न नहीं है, बल्कि बहुत ऊंची निकासी दर है. ज़्यादा टिकाऊ तरीका ये हो सकता है कि शुरुआत में लगभग 6 प्रतिशत निकासी दर रखी जाए और हर साल इसे 6 प्रतिशत बढ़ाया जाए. इसका मतलब होगा कि शुरुआती साल में लगभग ₹6 लाख सालाना (हर महीने ₹50,000) निकाले जाएं, जो समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ सकते हैं.
लंबे समय में इसका फ़र्क साफ़ दिखता है: 12 प्रतिशत निकासी दर कॉर्पस को धीरे-धीरे ख़त्म कर देती है, जबकि संतुलित निकासी दर उसे काफ़ी लंबे समय तक बनाए रख सकती है.
आपके लिए सबक़
मज़बूत बुल मार्केट अक्सर निवेशकों को ये मानने पर मजबूर कर देते हैं कि 20 प्रतिशत रिटर्न सामान्य बात है. मज़बूत बुल मार्केट में अक्सर इन्वेस्टर 20 प्रतिशत रिटर्न की उम्मीद करते हैं, जबकि कई लोग इस बात की अनदेखी करते हैं कि बड़ी रक़म निकालने से कितनी जल्दी पैसा खत्म हो सकता है।
सबक़ सरल है: सफल निवेश का मतलब असाधारण रिटर्न के पीछे भागना नहीं, बल्कि उम्मीदों को हक़ीक़त के क़रीब रखना और निकासी में अनुशासन बनाए रखना है. ताकि रिटायरमेंट के सालों में कॉर्पस ख़त्म न हो जाए.
और अगर पोर्टफ़ोलियो को कैसे स्ट्रक्चर करना है या रिटायरमेंट के लिए कहां निवेश करना है, इस पर और गाइडैंस चाहिए, तो Value Research Fund Advisor को सब्सक्राइब किया जा सकता है. यहां जोखिम क्षमता, वित्तीय लक्ष्य और समयावधि के आधार पर निवेश के बारे में ज़्यादा स्पष्ट समझ मिलती है.
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ये लेख पहली बार मार्च 12, 2026 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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