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सारांशः भले ही बड़े बाज़ारों को संघर्ष करना पड़ा, पर PSU स्टॉक मज़बूत बढ़त के साथ अलग दिखे. उनका प्रदर्शन एक ऐसे बदलाव को दर्शाता है जिसे पहचानने में निवेशकों को वक़्त लगा, लेकिन असली परीक्षा शायद अभी बाक़ी है. भारतीय शेयर बाज़ार के लिए यह साल भुलाने लायक़ रहा. सेंसेक्स 12 महीने पहले जहां था उससे थोड़ा ही ऊपर है. मिड और स्मॉल कैप में तेज़ गिरावट आई है. और फिर भी BSE PSU इंडेक्स ने उसी दौरान मज़बूत डबल-डिजिट रिटर्न दिए हैं. जो निवेशक सरकारी कंपनियों को धीमा, नौकरशाही और हमेशा निराश करने वाला मानते आए हैं, उनके लिए इसका जवाब चाहिए. छोटा जवाब यह है कि कुछ PSU बिज़नेस ख़ुद को पहले ही ठीक कर चुके थे. मार्केट को यह समझने में बस बहुत वक़्त लग गया. एक बैंकिंग सिस्टम जो फिर से पटरी पर आ गया इंडेक्स के प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ी ताक़त PSU बैंक हैं और यहां की कहानी छोटी नहीं है. लगभग एक दशक तक भारत के सरकारी बैंक असली संकट में थे. उन्होंने 2000 के दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को बेपरवाही से क़र्ज़ दिया जिनमें से कई धराशायी हो गए. बैड लोन जमा होते रहे, छुपाए जाते रहे और फिर आख़िरकार खुलकर सामने आ गए. बैंकों ने क़र्ज़ देना बंद कर दिया. मुनाफ़ा ग़ायब हो गया. सरकार ने उन संस्थानों को दोबारा कैपिटल देने में सैकड़ों करोड़ ख़र्च किए जिनका नुक़सान झेलने का जैसे कोई अंत नहीं था. जो इसके बाद हुआ वो धीमा और बेरौनक था: लोन रीस्ट्रक्चर या
ये लेख पहली बार अप्रैल 02, 2026 को पब्लिश हुआ.