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सारांशः फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड ने अब तक का सबसे बड़ा मंथली इनफ़्लो दर्ज किया. SIP कंट्रीब्यूशन ₹32,087 करोड़ पर पहुंचा. सेंसेक्स 11.5% गिरा. मार्च 2026 में एक उलटी बात सामने आई जो आपको इस बारे में कुछ ज़रूरी बातें बताती है कि भारतीय निवेश कहां पहुंच चुका है.
BSE सेंसेक्स मार्च 2026 में 11.5% गिरा. मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स भी इसी अंदाज़ में नीचे आए. और फिर भी इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में ₹40,450 करोड़ का नेट इनफ़्लो आया, जुलाई 2025 के बाद सबसे ज़्यादा मंथली इनफ़्लो. निवेशक अब पहले की तरह गिरावट से नहीं घबराते, यही लगता है.
मार्च की गिरावट को निवेशकों ने मौक़े की तरह देखा
इक्विटी फ़ंड में फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड आगे रहे, ₹10,000 करोड़ से ज़्यादा के इनफ़्लो के साथ, जो किसी एक महीने में इस कैटेगरी का अब तक का सबसे बड़ा इनफ़्लो है. यह पसंद कुछ बताती है: जब बाज़ार अनिश्चित हो तो निवेशक तेज़ी से ख़ुद फ़ैसले करने की जगह एलोकेशन के फ़ैसले फ़ंड मैनेजर पर छोड़ना पसंद करते हैं.
मिड-कैप और स्मॉल-कैप फ़ंड भी टिके रहे, क्रमशः ₹6,063 करोड़ और ₹6,263 करोड़ का इनफ़्लो, महीने-दर-महीने 51% और 61% ऊपर. मिराए एसेट इन्वेस्टमेंट मैनेजरों की डिस्ट्रीब्यूशन एंड स्ट्रैटेजिक अलायंसेज़ की हेड सुरंजना बोर्थाकुर ने साफ़ कहा: "निवेशक मिड और स्मॉल-कैप स्पेस में हर गिरावट को ख़रीदारी का मौक़ा मान रहे हैं. पिछले दो साल की निरंतरता लम्पसम की होड़ नहीं, SIP अनुशासन की तरफ़ इशारा करती है."
दूसरे शब्दों में, घरेलू निवेशक अब सिर्फ़ विदेशी बिकवाली के ख़िलाफ़ एक बफ़र नहीं रहे. वो उथल-पुथल भरे सत्रों में सक्रिय रूप से एक ज़मीन तैयार कर रहे हैं.
हाइब्रिड फ़ंड के आउटफ़्लो की पूरी कहानी कुछ और है
हाइब्रिड फ़ंड ने ऊपर से अलग कहानी कही. 11 लगातार महीनों के नेट इनफ़्लो के बाद, मार्च में कैटेगरी ₹16,538 करोड़ के आउटफ़्लो में चली गई. लेकिन डिटेल मायने रखती है. यह पलटाव लगभग पूरी तरह आर्बिट्राज फ़ंड की वजह से था जिनमें ₹21,113 करोड़ का आउटफ़्लो हुआ. इन्हें निकाल दें तो हाइब्रिड की तस्वीर बहुत कम चिंताजनक दिखती है. मल्टी-एसेट एलोकेशन फ़ंड में तो इनफ़्लो जारी रहा.
असल गिरावट डेट में थी, इक्विटी में नहीं
इंडस्ट्री लेवल पर, डेट कैटेगरी, ख़ासकर लिक्विड और ओवरनाइट फ़ंड, से बड़े आउटफ़्लो ने कुल नेट फ़्लो को महीने में -₹2.94 लाख करोड़ पर धकेल दिया.
SIP: कहानी के पीछे की कहानी
मंथली SIP कंट्रीब्यूशन मार्च में ₹32,087 करोड़ पर पहुंचा, एक नंबर जो भारतीय रिटेल निवेश की कहानी को लगातार नए सिरे से लिख रहा है. व्यवस्थित, आदत-आधारित निवेश भारतीय पर्सनल फ़ाइनेंस में सबसे टिकाऊ बदलावों में से एक बन गया है, जो शॉर्ट-टर्म मार्केट के शोर से काफ़ी हद तक बेपरवाह है.
कमोडिटी में भी निवेशकों की पसंद साफ़ दिखी
गोल्ड फ़ंड में ₹2,265 करोड़ का नेट इनफ़्लो आया. हालांकि सिल्वर ETF में एसेट में तेज़ गिरावट के साथ ₹683 करोड़ का आउटफ़्लो रहा, एक संकेत कि ज़्यादातर निवेशक अभी भी चांदी को पोर्टफ़ोलियो की बुनियाद नहीं बल्कि एक सामयिक दांव मानते हैं.
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