स्टॉक एडवाइज़र

कुछ IT कंपनियां आगे निकलेंगी, बाक़ी वेल्थ डुबोएंगी

AI भारतीय IT सेक्टर को ख़त्म नहीं करेगा, बल्कि यह इस सेक्टर को दो हिस्सों में बांट देगा.

AI भारतीय IT सेक्टर को ख़त्म नहीं करेगा, बल्कि यह इस सेक्टर को दो हिस्सों में बांट देगा.Aditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः AI भारतीय IT सेक्टर को नया आकार दे रहा है, लेकिन उस तरह नहीं जिससे ज़्यादातर निवेशक डरते हैं. असली कहानी सुर्ख़ियों के पीछे छिपी है, जहां बिज़नेस मॉडल में बदलाव चुपचाप सेक्टर को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं. इस बदलाव को समझना, आगे आने वाली स्थितियों से निपटने की कुंजी हो सकता है.

फ़रवरी 2026 में एक Substack लेख और एक सॉफ़्टवेयर टूल के सामने आने के एक ही महीने के भीतर भारतीय IT स्टॉक से ₹5.6 लाख करोड़ साफ़ हो गए. निफ़्टी IT इंडेक्स 19.5% गिरा, जो सितंबर 2008 के बाद का सबसे बुरा महीना रहा. विदेशी निवेशकों ने सिर्फ़ फ़रवरी में सेक्टर से $1.85 अरब निकाल लिए.

घबराहट असली थी. लेकिन जो सवाल उठाया गया वो ग़लत था.

बाज़ार ने पूछा: क्या AI भारतीय IT को ख़त्म कर देगा? नहीं, ऐसा नहीं होगा. सही सवाल यह है: कौन सी IT कंपनियां पहले से ख़ुद को बदल रही हैं और कौन सी एक मरते हुए बिलिंग मॉडल की रखवाली कर रही हैं? अगले 5 साल में आपका रिटर्न पूरी तरह आपके जवाब पर निर्भर है.

जब एक लेख ने ₹5.6 लाख करोड़ डुबो दिए

बिक़वाली के चार कारण थे, हर एक ने अगले को और गहरा बनाया.

Citrini नाम की एक रिसर्च फ़र्म ने 2028 का एक काल्पनिक मेमो छापा जिसमें कल्पना की गई कि AI ने आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री को कैसे तबाह किया. यह एक सिनेरियो था, पूर्वानुमान नहीं. लेकिन बाज़ार को इसकी परवाह नहीं थी. निफ़्टी IT अगले दिन 5% से ज़्यादा गिरा, मार्च 2020 के बाद का सबसे बुरा एकल सत्र.

कुछ दिन बाद Jefferies ने 6 बड़े IT स्टॉक डाउनग्रेड किए और प्राइस टारगेट 33% तक घटा दिए. मुख्य तर्क था: AI मैनेज्ड सर्विसेज़ को कम करेगा जिसकी बड़ी IT फ़र्म के रेवेन्यू में 22% से 45% हिस्सेदारी है. सबसे बुरे हाल में वैल्यूएशन और 30% से 65% गिर सकते हैं.

India AI Impact Summit में वेंचर कैपिटलिस्ट विनोद खोसला ने कहा कि IT सर्विसेज़ और BPO "5 साल में लगभग पूरी तरह ग़ायब हो जाएंगे." Anthropic ने AI टूल जारी किए जो ठीक वही काम करते थे जिसके लिए भारतीय IT कंसल्टेंट ₹12,000 प्रति घंटे बिल करते हैं.

नैरेटिव बहुत भारी था. लेकिन नैरेटिव का फ़ायदा उठाने वाले होते हैं. Lead Edge Capital के Mitchell Green ने कहा, इन सभी वेंचर कैपिटलिस्ट को सॉफ़्टवेयर को मरता हुआ दिखाना है क्योंकि उन्हें यह जायज़ ठहराना है कि वो AI कंपनियों पर कितना ख़र्च कर रहे हैं. सबसे ज़ोर से तबाही की आवाज़ों AI वेंचर में अरबों निवेश कर रखे हैं. उनकी चेतावनियां निहित स्वार्थ से ज़्यादा प्रेरित हैं.

पुराना बिज़नेस मॉडल सच में कमज़ोर हो रहा है

बौद्धिक ईमानदारी इस बात की मांग करती है कि जो हक़ीक़त है, उसे स्वीकार किया जाए.

मैन-डे बिलिंग मॉडल मर रहा है. TCS का रेवेन्यू बढ़ा जबकि हेडकाउंट मुश्किल से हिला. BPO हायरिंग FY23 के 1.3 लाख से घटकर सालाना 17,000 से नीचे आ गई. Wipro ने ख़ुद एंट्री-लेवल IT सर्विसेज़ से 15-20% रेवेन्यू में कमी का अनुमान दिया. ये बाहरी लोगों के अनुमान नहीं हैं. यह मैनेजमेंट के अपने नंबर हैं.

मार्जिन का दबाव शुरू हो गया है. HSBC का अनुमान है कि AI से डील की वैल्यू घटने के चलते सेक्टर में 14-16% ग्रॉस रेवेन्यू की गिरावट आएगी. $220 अरब के सालाना एक्सपोर्ट पर लागू करें तो ₹2.5 से 2.9 लाख करोड़ की वैल्यू बस गायब हो जाती है.

और प्रोडक्टिविटी का विरोधाभास असली है. अगर AI एक इंजीनियर को पांच का काम करने देता है तो क्लायंट पांच के लिए भुगतान नहीं करेगा. भले ही क्षमता बढ़े, लेकिन प्रति प्रोजेक्ट रेवेन्यू गिरेगा. भारतीय IT ने कभी ऐसी टेक्नोलॉजी का सामना नहीं किया जो एक साथ डिलीवरी में बेहतर और बिलिंग में कमज़ोर बनाए.

भारतीय IT सेक्टर सुर्ख़ियों के साथ धड़ाम नहीं गिरेगा. यह चुपचाप कमज़ोर होता जाएगा, वही रेवेन्यू लेकिन कम हायरिंग, वही क्लायंट लेकिन तंग कॉन्ट्रैक्ट, वही गाइडेंस लेकिन कमज़ोर प्राइसिंग पावर. कोई घबराहट नहीं. बस धीरे-धीरे दबाव जो तब तक स्थिर लगता है जब तक नहीं लगता.

Blockbuster के ग्राहक थे. Nokia का डिस्ट्रीब्यूशन था. वो रातोरात नहीं डूबे. वो धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो गए.

जिसे तबाह करने वाला कहा जा रहा है, वो ख़ुद पार्टनर बन रहा है

तबाही का तर्क एक ऐसी धारणा पर टिका है जो क़रीब 15 साल पुरानी है: कि भारतीय IT की पूरी वैल्यू सस्ते लेबर पर बनी है. ऐसा नहीं है.

एंटरप्राइज़ IT कोडिंग की समस्या नहीं है. यह भरोसे और जवाबदेही की समस्या है. AI कोड लिख सकता है. रात 2 बजे सिस्टम फेल होने पर प्रोजेक्ट जवाबदेही नहीं ले सकता और एक रेगुलेटर जवाब मांगता है. जैसा Green ने कहा, किसी सॉफ़्टवेयर कंपनी का कॉम्पिटिटिव फ़ायदा कभी R&D के बारे में नहीं था. यह डिस्ट्रीब्यूशन, कस्टमर रिलेशनशिप और संस्थागत जानकारी के बारे में है.

Workday अपना 98-99% सालाना रेवेन्यू बनाए रखता है. उसके एंटरप्राइज़ क्लायंट ने सॉफ़्टवेयर लागू करने में 3-5 साल लगाए. अगर वे उसे उखाड़कर बाहर नहीं फेंकने वाले हैं, तो फिर वे TCS या Infosys को भी उतने ही गहरे तक जुड़े, मिशन-क्रिटिकल सिस्टम्स से क्यों बाहर निकालेंगे?

पार्टनरशिप कहानी बताती हैं. Anthropic, जिस कंपनी के टूल के जारी होते ही बिक़वाली शुरू हो गई, ने अपने AI मॉडल एंटरप्राइज़ को उतारने के लिए Infosys के साथ पार्टनरशिप की. OpenAI ने TCS के साथ पार्टनरशिप की. AMD ने TCS के साथ AI इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए पार्टनरशिप की. Anthropic ने बेंगलुरु में अपना पहला भारतीय ऑफ़िस खोला और कहा कि अमेरिका के बाद भारत उसका दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार है. अगर भारतीय IT तबाह होने वाली होती तो तबाही के लिए ज़िम्मेदार माने जाने वाले पार्टनर पार्टनरशिप नहीं कर रहे होते. उन्हें एंटरप्राइज़ क्लायंट तक पहुंचने के लिए सर्विसेज़ फ़र्म चाहिए. AI लैब मॉडल बनाती हैं. भारतीय IT उन्हें जटिल और रेगुलेटेड माहौल में लागू करती है.

और एक ऐसी नज़ीर है जिसे कयामत का समर्थन करने वाले नज़रअंदाज़ करते हैं. 1999-2000 में हर एनालिस्ट ने कहा था कि बड़े रिटेल स्टोर ख़त्म हो जाएंगे. आज Amazon के बाद अमेरिका की टॉप ई-कॉमर्स कंपनियां? Walmart, Home Depot, Lowe's, Target. पुरानी कंपनियों ने टेक्नोलॉजी अपनाई और अपने डिस्ट्रीब्यूशन के फ़ायदे के सहारे राज किया. नई टेक्नोलॉजी द्वारा अच्छी तरह पूंजी लगाई और सक्रिय रूप से ढलने वाली कंपनियों को तबाह करने की दर असल में बहुत कम है.

Nasscom के श्रीकांत वेलमकन्नी ने 2026 लीडरशिप फ़ोरम में COBOL के ख़तरे को एक मौक़े के रूप में पेश किया: ₹170 प्रति लाइन के हिसाब से लीगेसी कोड की 800 अरब लाइनें ₹1.3 लाख करोड़ का सर्विसेज़ मौक़ा बनती हैं. AI यह काम ख़त्म नहीं करता. यह पहले व्यावसायिक रूप से असंभव मॉडर्नाइज़ेशन प्रोजेक्ट को मुमकिन बनाता है. काम ज़्यादा होगा, कम नहीं.

सेक्टर दो हिस्सों में बंट रहा है, आपको सही हिस्सा चुनना है

ईमानदार आकलन यह है: सेक्टर शून्य नहीं जाएगा. लेकिन पुराने मॉडल पर ₹25 लाख करोड़ भी नहीं पहुंचेगा.

जो असल में हो रहा है वो सेक्टर के भीतर वैल्यू का पलायन-लेबर आर्बिट्राज़ से AI से जुड़ी, नतीजों पर आधारित डिलीवरी की तरफ़- है. कुल बाज़ार शायद बढ़ता भी है. लेकिन जो कंपनियां बढ़े हुए मौक़े को भुनाएंगी वो कम होंगी और ज़्यादा अलग होंगी.

2-3 भारतीय IT कंपनियां 5 साल में नाटकीय रूप से ज़्यादा क़ीमती होंगी. बाक़ी धीरे-धीरे पिछड़ती जाएंगी. निफ़्टी IT इंडेक्स जीतने वालों को हारने वालों के साथ औसत करता है जो सेक्टर-लेवल ट्रेड को एक जाल बनाता है. यह स्टॉक-पिकिंग की समस्या है, सेक्टर-एलोकेशन की नहीं.

सही IT स्टॉक पहचानने से जुड़े 3 ज़रूरी सवाल

वो तीन बातें जो भविष्य के विनर्स को धीरे-धीरे पिछड़ने वालों से अलग करती हैं.

पहली, क्या रेवेन्यू हेडकाउंट से अलग हो रहा है? अगर हेडकाउंट रेवेन्यू का मुख्य ड्राइवर नहीं रहा तो इसका मतलब हो सकता है कि मॉडल बदल रहा है. पारंपरिक भारतीय IT मॉडल हेडकाउंट के साथ बढ़ता है और उस पर पूरी तरह निर्भर है. अगर यह निर्भरता जारी रहे तो यह चेतावनी होनी चाहिए.

दूसरी, क्या वैल्यूएशन में सुरक्षा की गुंजाइश है? निफ़्टी IT इंडेक्स 20.6 गुना अर्निंग्स पर ट्रेड कर रहा है, अपने 5 साल के औसत 29.2 से काफ़ी नीचे और जुलाई 2020 के बाद सबसे सस्ता है. वेटेड रिटर्न ऑन इक्विटी 26% है. फ़्री कैश-फ़्लो यील्ड 5% है. डिविडेंड यील्ड 3.5% है. यह उस इंडस्ट्री के लिए वैल्यू-ग्रेड नंबर हैं जिसने 24 साल में कभी सालाना गिरावट नहीं देखी. लेकिन सिर्फ़ सस्ता होना काफ़ी नहीं. कंपनी सस्ती भी होनी चाहिए और बदलने वाली भी.

तीसरी, क्या कंपनी पहले से नतीजों के लिए बिलिंग कर रही है? क्या AI से होने वाली कमाई का कोई मापने लायक़ हिस्सा है? क्या AI आधारित सर्विस लाइन प्रोडक्शन में हैं या सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ में? क्या AI सिर्फ़ उनके कोर प्रोडक्ट पर एक ऊपरी परत है या इसका बड़ा असर है? क्या कंपनी हेडकाउंट की बजाय दिए गए नतीजों के इर्द-गिर्द बने कॉन्ट्रैक्ट जीत रही है? इस सवाल का जवाब असली बदलाव को मार्केटिंग से अलग करता है.

निराशावाद के इस दौर में छुपा है एक बड़ा मौक़ा

आख़िरी बार भारतीय IT सेक्टर इतना सस्ता जुलाई 2020 में था. तब सेक्टर में निवेश करने वाले निवेशकों ने अगले 18 महीनों में 80% से ज़्यादा कमाया. आज निराशावाद गहरा है, वैल्यूएशन कम और ढलने वाली कंपनियों के लिए बुनियादी तर्क शायद ज़्यादा मज़बूत.

जैसा DSP म्यूचुअल फ़ंड के पार्थ शाह ने कहा, कम वैल्यूएशन, ज़्यादा रिटर्न ऑन इक्विटी, ज़्यादा फ़्री कैश-फ़्लो यील्ड और ज़्यादा डिविडेंड यील्ड सब IT कंपनियों के पक्ष में हैं. जो पक्ष में नहीं है वो सिर्फ़ कहानी है. और अच्छे बिज़नेस इन वैल्यूएशन पर तभी मिलते हैं जब उनके ख़िलाफ़ गहरा निराशावाद हो. नैरेटिव के ख़िलाफ़ जाने का हौसला दुर्लभ होता है.

वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र में हमने हर बड़ी भारतीय IT कंपनी पर यह तीन-हिस्सों वाला फ़्रेमवर्क लागू किया है. हमें एक मिली है, एक मिड-कैप, कोई मेगा-कैप नहीं, जो तीनों परीक्षाओं पर खरी उतरती है. यह पहले से घंटों के नहीं, नतीजों के लिए बिल कर रही है. इसका रेवेन्यू हेडकाउंट से अलग हो रहा है. और यह उस वैल्यूएशन पर ट्रेड करती है जिसमें उससे जुड़ी मुश्किलें शामिल हैं लेकिन आगे के मौक़े को नहीं.

हम इसे शनिवार 11 अप्रैल 2026 को दोपहर 12:30 बजे होने वाले Stock Advisor Live सेशन में बताएंगे.

आज ही स्टॉक एडवाइज़र देखें!

यह भी पढ़ें: टॉप 5 म्यूचुअल फ़ंड्स का IT शेयरों में है कितना एक्सपोज़र?

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