
‘डाइवर्सिफ़िकेशन के ख़तरे’ के बजाए मैं इस लेख का टाइटल, ‘कॉनसन्ट्रेशन की ख़ुशी’ भी रख सकता था, तब एंगल अलग होता, मगर बात वही होती. ज़्यादातर लोगों को लगेगा कि ये बात उलटी लग रही है. इसमें ज़रूर कोई ग़लती हुई है. क्या ये बात स्वयंसिद्ध नहीं कि किसी भी निवेशक को डाइवर्सिफ़िकेशन नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए क्योंकि एक यही बात हमारे निवेश को न जाने कितने ख़तरों से बचाती है? ये बात सोलह आने सच है, मगर डाइवर्सिफ़िकेशन के साथ कई दिखाई न देने वाली परेशानियां भी हैं जिन्हें निवेशक अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं.
अगर आप एक आदर्श निवेश पोर्टफ़ोलियो बनाते – तब, जब आपको भविष्य का पता होता – तो क्या उसमें सिर्फ़ एक ही स्टॉक नहीं होता? ये वही स्टॉक होता जो अधिकतम मुनाफ़ा देता. आख़िर, अगर आपको पता होता कि क्या होने वाला है, तो आप एक रुपया भी किसी दूसरे स्टॉक में क्यों निवेश करते? आप पूरे के पूरे पैसे पर ज़्यादा-से-ज़्यादा मुनाफ़ा क्यों नहीं बनाते, जो नंबर वन स्टॉक से मिलता? फिर डाइवर्सिफ़ाई करने का सवाल ही क्यों उठता?
हालांकि, असल दुनिया की हक़ीक़त है कि आपको भविष्य के बारे में कोई जानकारी नहीं है. जो आपके पास है (उम्मीद है), वो एक प्रक्रिया है. जिसके ज़रिए आप वो स्टॉक को चुन सकते हैं जो अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं. ये अनुमान आपकी अपनी अपनी रिसर्च से लग सकता है, या ये हमारी रेकमेंडेशन से भी आपको पता चल सकता है, या ये इसका नतीजा हो सकता है कि कोई टेक्निकल एनेलिस्ट आपके निवेश से कोई छेड़छाड़ न करे, या फिर आपके निवेश का चुनाव महज़ अंधेरे में चलाया तीर हो सकता है. वैसे, आख़िरी के दोनों विकल्प एक ही हैं, मगर ये कहानी फिर कभी.
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ज़ाहिर है, इक्विटी निवेश का ये काम रिस्की है. स्टॉक अच्छा कर भी सकते हैं और नहीं भी. इस रिस्क का हल डाइवर्सिफ़िकेशन को समझा जाता है. और ये कमोबेश, आपके स्टॉक के चुनाव की प्रक्रिया की क्वालिटी पर निर्भर करता है. हालांकि, ये ज़ाहिर सी बात है कि आपके पास जितने ज्यादा स्टॉक होंगे आपका रिस्क उतना ही कम होगा.
सरसरी तौर पर देखने पर तो ऐसा लग सकता है कि अगर आपके पास बहुत से स्टॉक हैं, तो सब-के-सब ख़राब नहीं निकलेंगे या सारे एक साथ क्रैश हो कर ख़ाक तो नहीं हो जाएंगे, कम-से-कम एक साथ तो नहीं ही होंगे. और ये बात कुछ हद तक सही है, पर अब मुझे पिछला वाक्य एक बार और दूसरे नज़रिए से कहने दीजिए. ‘अगर आपके पास बहुत से स्टॉक हैं, तो कम-से-कम उनमें से कुछ तो ग़लत होंगे ही, और इनमें से कुछ तो ज़रूर ही क्रैश करेंगे, और कभी-न-कभी तो ख़ाक होंगे ही.’
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अब ये बात उतनी अच्छी नहीं लग रही न? डाइवर्सिफ़िकेशन दो-तरफ़ा असर करता है. अगर सबसे ख़राब प्रदर्शन की बात करें, तो ये मुनाफ़े को बढ़ाता है. वहीं आप अगर सबसे अच्छे मुनाफ़े के तुलना करेंगे, तो ये मुनाफ़े को कम करता है.
इस मुश्किल का एक और पहलू है कि असलियत में, अच्छे और ख़राब स्टॉक का बैलेंस होना सामान्य है, एक औसत है, और ये आपको कहीं नहीं लेकर जाएगा. जिस चीज़ की आपको ज़रूरत है, वो शायद एक या दो शानदार स्टॉक हैं. ज़िन्दगी में कभी भी, अगर आप ठीक-ठाक निवेशक भी हैं, तो आपको 1982 के एशियन पेंट्स के जैसा या 1995 के HDFC बैंक जैसा या 1995 के टाइटन जैसा कुछ मिल ही जाएगा, और आपके पास ये समझदारी होगी कि आप उसे होल्ड किए रहें. एक इक्विटी निवेशक के तौर पर यही बात आपको अमीर बनाएगी. मगर तब नहीं, जब आप बहुत अच्छी तरह से डाइवर्सिफ़ाइड हैं और आपने सिर्फ़ 2 से 5 प्रतिशत ही इन निवेशों में लगाया है.
ज़्यादातर मशहूर निवेशक जिन्होंने किसी-न-किसी समय ज़बरदस्त मुनाफ़ा कमाया, उन्होंने कुछ मुठ्ठी भर स्टॉक से ही ऐसा किया. उनके ये कुछ स्टॉक ऐसे थे जिनपर उनको भरोसा था और इसीलिए उन्होंने बड़े और मायने रखने वाले निवेश उनमें किए. अब चाहे वो वॉरेन बफ़े का कोका कोला हो या हमारे अपने राकेश झुनझुनवाला का टाइटन और क्रिसिल, उनके डाइवर्सिफ़िकेशन का अनुपात सही था. अगर डाइवर्सिफ़िकेशन ज़्यादा हो जाए, तो एक इक्विटी निवेशक के लिए निवेश का कोई ख़ास मतलब नहीं रह जाता.
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आप एक इक्विटी निवेशक हैं. आप ज़िन्दगी में एक बार मिलने वाला बोनांज़ा तलाश रहे हैं. इसके बजाए, अगर आप एक इंडेक्स फ़ंड की तरह निवेश करेंगे, तो फिर एक इंडेक्स फ़ंड ही ख़रीद लीजिए और ख़ुद को तमाम परेशानियों से बचा ही लीजिए.