
यह स्टोरी मूल रूप से सितंबर, 2017 में पब्लिश हुई थी.
शायद मरा हुआ होना एक अच्छी निवेश स्ट्रैटेजी हो. कुछ साल पहले अमेरिका में Fidelity Investments ने एक स्टडी की, जिसमें यह जानने की कोशिश की गई कि किन निवेशकों के अकाउंट में सबसे ज़्यादा रिटर्न था. नतीजा चौंकाने वाला था: सबसे ज़्यादा रिटर्न उन निवेशकों का था जो अपने निवेश को सालों, यहां तक कि दशकों तक पूरी तरह भूल चुके थे. और बस यही नहीं, यह भी पता चला कि इनमें से काफ़ी निवेशक काफ़ी पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे. यानी अपने पोर्टफ़ोलियो को मैनेज करने का सबसे फ़ायदेमंद तरीक़ा वही हो सकता है जो एक मरा हुआ इंसान करता है, यानी कुछ भी नहीं.
भारत में भी ऐसी कहानियां हैं. कुछ दिन पहले एक स्टॉक मार्केट चैनल पर निवेशकों के सवाल-जवाब से जुड़े एक शो में एक कॉल आई जिसने मुझे Fidelity की उस स्टडी की याद दिला दी. उस शख़्स को इक्विटी मार्केट की ज़्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन उसने बताया कि क़रीब 25 साल पहले उसके एक अंकल ने MRF के 20,000 शेयर ख़रीदे थे. उसका सवाल था कि आज वो शेयर कितने के होंगे? अगर उसकी बात सच है तो वो शेयर आज क़रीब ₹130 करोड़ के होंगे. शेयरों की संख्या में थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन इतना तो तय है कि इन सालों में इस कंपनी के एक निवेशक ने अपनी रक़म क़रीब 200 गुना कर ली होती.
मैं एक ऐसे सोशल मीडिया ग्रुप का हिस्सा हूं जो कहने को तो लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए बना है. लेकिन उस ग्रुप में यही बहस चलती रहती है कि 'लॉन्ग टर्म' का मतलब आख़िर है क्या. किसी के लिए छह-सात महीने काफ़ी हैं, तो किसी के लिए जो डे-ट्रेडिंग नहीं है वो सब लॉन्ग टर्म है. तो असल में लॉन्ग-टर्म निवेश होता क्या है? यह कितना लंबा होना चाहिए?
इसका एक सरकारी जवाब भी है. भारत सरकार के रेवेन्यू विभाग के नज़रिए से, लिस्टेड स्टॉक और इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड को लॉन्ग टर्म तब माना जाता है जब होल्डिंग पीरियड एक साल से ज़्यादा हो. दूसरे निवेशों के लिए यह सीमा तीन साल है. यह टैक्स का क़ानून है, निवेश का नहीं. इसलिए निवेश के नज़रिए से इस पर ध्यान मत दीजिए. इक्विटी के लिए एक साल बहुत कम होता है.
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तो फिर 'लॉन्ग टर्म' के लिए सही समय क्या है? इसका जवाब पाने के लिए ज़रूरी है कि बुनियादी सवाल पूछा जाए: इक्विटी में निवेश लॉन्ग टर्म के लिए ही क्यों होना चाहिए? जवाब है: उतार-चढ़ाव यानी वॉलेटिलिटी. BSE Sensex का पिछले पांच साल का रिटर्न 12.77% सालाना या 79% कुल रहा है. लेकिन इन पांच सालों के अलग-अलग एक-एक साल के रिटर्न देखें तो वो थे: 9.0%, 41.8%, -8.9%, 16.2% और 9.5%. यही इक्विटी में लॉन्ग टर्म निवेश की सबसे बड़ी दलील है. रिटर्न शानदार हो सकता है, लेकिन उतार-चढ़ाव भी काफ़ी ज़्यादा है. किसी छोटी अवधि में आपको कम रिटर्न या नुक़सान भी हो सकता है, जिसकी भरपाई सिर्फ़ अच्छे दौर में होती है.
इसे एक और तरीक़े से समझ सकते हैं. शेयर बाज़ार साइकल में चलता है और अक्सर एक पूरी साइकल, यानी तेज़ उछाल, गिरावट, ठहराव और वापसी, में पांच से सात साल लग जाते हैं. सही रिटर्न पाने के लिए पूरी साइकल में निवेशित रहना ज़रूरी है. यह एक या दो साल में नहीं होता.
एक और नज़रिया है और इसके साथ ठोस सबूत भी हैं. Value Research ने इसी साल एक अनोखी स्टडी की. हमने पाया कि अगर कोई SIP के ज़रिए चार साल तक निवेश करे तो नुक़सान की गुंजाइश न के बराबर रह जाती है. एक ऐसे फ़ंड के लिए जिसकी कई दशकों की हिस्ट्री है, किसी भी एक साल की अवधि में अधिकतम रिटर्न 160% और न्यूनतम -57% रहा है. दो साल में यह 82% और -34% हो जाता है. तीन साल में 63% और -18%. पांच साल में 54% और 4%, यानी कभी कोई नुक़सान नहीं. 10 साल में अधिकतम 30% और न्यूनतम 13%. ये सभी आंकड़े सालाना हैं. यहां निष्कर्ष बिल्कुल साफ़ है: अवधि जितनी कम, संभावित फ़ायदा उतना ज़्यादा, लेकिन जोख़िम भी उतना ही बड़ा. इस सबूत के आधार पर, लॉन्ग टर्म का मतलब है पांच साल या उससे ज़्यादा.
तो जवाब मिल गया. इक्विटी निवेश में 'लॉन्ग टर्म' कोई अस्पष्ट शब्द नहीं है जिसे जो चाहे जैसे परिभाषित कर ले. इसका मतलब है पांच साल या उससे ज़्यादा, और बस.
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