फंड वायर

वो AMC जिसे कोई अपने पास नहीं रख सका

चार बार नाम बदला, कई परेशान पार्टनर आए-गए, लेकिन अब शायद PGIM India को एक टिकाऊ घर मिल गया है

चार बार नाम बदला, कई परेशान पार्टनर आए-गए, लेकिन अब शायद PGIM India को एक टिकाऊ घर मिल गया हैAman Singhal/AI-Generated Image

सारांशः पहले DLF. फिर DHFL जो डूब गई. फिर PGIM जो बढ़ नहीं पाई और अब TVS. एक ही म्यूचुअल फ़ंड हाउस, चार मालिक और परफ़ॉर्मेंस का एक ऐसा रिकॉर्ड जो बताता है कि हर बार पार्टनर ने आख़िरकार क्यों साथ छोड़ा. दिलचस्प सवाल यही है-अब आगे क्या होगा?

TVS Venu Group, Prudential Financial की PGIM India Asset Management में पूरी हिस्सेदारी ख़रीदेगा. 2 अप्रैल को घोषित यह डील रेगुलेटरी मंज़ूरी के बाद पूरी होगी और इसके साथ चेन्नई का यह कारोबारी समूह एक ऐसे म्यूचुअल फ़ंड हाउस का मालिक बन जाएगा जो 25 स्कीमों में ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा मैनेज करता है. अगर आप PGIM India के निवेशक हैं, तो यह चौथी बार होगा जब आपके फ़ंड हाउस का नाम बदलेगा.

नाम बदलने का सफ़र

अमेरिका की Prudential Financial (जो UK की Prudential plc से अलग है) 2007 में DLF के साथ ज्वाइंट वेंचर के ज़रिए भारत आई. यहां वो अपना नाम इस्तेमाल नहीं कर सकती थी क्योंकि ICICI Prudential पहले ही वो नाम ले चुकी थी, इसलिए भारतीय कंपनी का नाम "Pramerica" रखा गया. इस फंड को मई 2010 में SEBI का रजिस्ट्रेशन मिला, जिसमें Prudential Financial एकमात्र स्पॉन्सर था और इसे चुपचाप लॉन्च कर दिया गया. किसी ने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. एक बात जो ध्यान देने लायक है, वो यह है कि प्रूडेंशियल पहले दिन से ही स्पॉन्सर थी. DLF और बाद में DHFL JV पार्टनर थे, स्पॉन्सर नहीं. फ़ंड हाउस अलग-अलग मालिकों के बीच अनाथ नहीं हुआ था, जैसा कि नाम बदलने से लग सकता है.

2013-14 तक DLF मुश्किल में आ गई और उसने बाहर निकलने का रास्ता चुना. DHFL ने जगह ली. अक्तूबर 2015 में फ़ंड का नाम DHFL Pramerica Mutual Fund हो गया और लगभग उसी वक़्त इसने Deutsche Bank का भारतीय एसेट मैनेजमेंट कारोबार क़रीब ₹400 करोड़ में ख़रीद लिया. Deutsche के पास ₹25,000 करोड़ से ज़्यादा का AUM था, जो ज़्यादातर डेट में था. रातोंरात DHFL Pramerica सबसे छोटे AMC से ₹25,400 करोड़ मैनेज करने वाली कंपनी बन गई. ग्लोबल पैरेंट, लोकल पार्टनर और Deutsche का विरासत में मिला डेट पोर्टफ़ोलियो. यह कुछ ऐसा लगा जैसे यहां कुछ बड़ा बन सकता था.

फिर DHFL बिखर गई

2018 में IL&FS के पतन से NBFC क्षेत्र में लिक्विडिटी का संकट पैदा हो गया, जिसका असर अंततः DHFL पर भी पड़ा; फंड के गलत इस्तेमाल से जुड़ी समस्याओं ने इस संकट को और भी गहरा दिया. इसके आगे की कहानी तो सभी को पता ही है.

Prudential ने इसमें तेज़ी दिखाई. हालात और बिगड़ने से पहले ही दिसंबर 2018 में, उसने DHFL की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी ख़रीदने का ऐलान किया. जुलाई 2019 तक DHFL Pramerica का नाम PGIM India Mutual Fund हो गया. फ़ंड हाउस को एक ही तिमाही में AUM में 2,200 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, क्योंकि निवेशक DHFL के नाम से दूर भागने लगे थे; लेकिन AMC पर कभी कोई जोखिम नहीं था. म्यूचुअल फ़ंड की एसेट्स एक अलग ट्रस्ट में रखी जाती हैं।

सात साल, कोई ग्रोथ नहीं

पूरी तरह PGIM के मालिकाना हक़ में आने के बाद फ़ंड हाउस स्थिर तो हो गया, लेकिन बढ़ा नहीं. AUM ₹27,000-30,000 करोड़ के आसपास ही अटका रहा - यानी क़रीब वहीं जहां दोनों कारोबारों के मिलने के बाद एक दशक पहले था. मार्च 2025 तक टैक्स के बाद का घाटा ₹23 करोड़ से ज़्यादा हो गया. इस दौरान पूरी इंडस्ट्री ₹80 लाख करोड़ के पार निकल गई. PGIM India की रैंकिंग क़रीब 25वीं रही.

मैं इस फ़ंड हाउस को सालों से ट्रैक कर रहा हूं. Value Research पर हम उनकी 25 स्कीमों में से सिर्फ़ एक -लिक्विड फ़ंड-को ही 5-स्टार देते हैं, जो 32 में से तीसरे नंबर पर है. हमारे एनालिस्ट पांच फ़ंड्स को "Sell" की सलाह देते हैं - इनमें लार्ज कैप (तीन साल में 67 में से 63वां), ELSS टैक्स सेवर (34 में से 33वां) और 1-स्टार वाला स्मॉल कैप  शामिल हैं. अब देखिए कि असल पैसा कहां है. मिडकैप फ़ंड में ₹10,877 करोड़ है, जो तीन साल में 35 में से 34वें नंबर पर है. फ़्लेक्सी कैप में ₹6,004 करोड़ है, जो 59 में से 51वें नंबर पर है. इन दो फ़ंड्स में इक्विटी का दो-तिहाई पैसा है और दोनों बॉटम क्वार्टाइल में हैं. अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन फ़ंड का 10 साल में 11 में से पहला नंबर और फ़्लेक्सी कैप का 10 साल में 29 में से छठा नंबर यह ज़रूर बताते हैं कि लंबे समय का रिकॉर्ड बेहतर रहा है, लेकिन हाल के साल उसे कमज़ोर कर चुके हैं. बड़ी तस्वीर यही है कि यह एक ऐसा फ़ंड हाउस है जहां न डिस्ट्रीब्यूशन कभी मज़बूत हो पाया और न इक्विटी परफ़ॉर्मेंस ने निवेशकों को रुकने की वजह दी.

सच कहूं तो, इक्विटी AUM की कहानी पूरी तरह से निराशाजनक नहीं है. इक्विटी एसेट्स मार्च 2020 में सिर्फ़ 958 करोड़ रुपये से बढ़कर अप्रैल 2026 तक 23,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा हो गए. निवेशक आए ज़रूर. समस्या यह है कि उस पैसे का ज़्यादातर हिस्सा मिडकैप और फ़्लेक्सी कैप में चला गया, जो अब अपनी कैटेगरी के सबसे निचले हिस्से में हैं. इन कैटेगरीज़ को खुद भी एक मुश्किल दौर से गुज़रना पड़ा है. फ़ंड हाउस ने तेज़ी के दौर में पूंजी जुटाई. लेकिन उसने अभी तक यह साबित नहीं किया है कि वह मुश्किल दौर में भी उस पूंजी को बनाए रख सकता है.

कोई हैरानी नहीं कि Prudential ने जनवरी 2026 में EY को ख़रीदार खोजने की ज़िम्मेदारी दी. Groww और Edelweiss भी बोली लगाने वालों में थे.

एक अलग तरह का मालिक

TVS Venu Group, वेणु श्रीनिवासन का कारोबारी समूह है. ग्रुप की TVS Motor Company भारत की तीसरी सबसे बड़ी टू-व्हीलर बनाने वाली कंपनी है. TVS Credit Services, पहले से एक बड़ी NBFC है. एसेट मैनेजमेंट का लाइसेंस इसी सिलसिले की अगली कड़ी है. मेरे लिए अहम बात यह है कि TVS कुछ ऐसा लेकर आ रही है जो PGIM India के पिछले किसी भी पार्टनर ने नहीं दिया, वो है स्थायित्व. यह एक सौ साल पुराना कारोबरी घराना है. Venu Srinivasan, Tata Sons के बोर्ड में हैं और Tata Trusts के वाइस-चेयरमैन हैं. यह वो पार्टनर नहीं है जो अपने बॉन्ड पर डिफ़ॉल्ट करे या क़र्ज़ चुकाने के लिए घर का सोना बेच दे.

आपको क्या करना चाहिए?

अगर आप PGIM India के फ़ंड होल्ड करते हैं, तो अभी कुछ नहीं बदला है. आपकी यूनिट्स, NAV, फ़ोलियो - सब वैसे ही रहेंगे. SEBI की मंज़ूरी मिलने के बाद TVS स्पॉन्सर बन जाएगी और स्कीमों के नाम फिर से बदल जाएंगे.

क्या नए ओनर डिस्ट्रीब्यूशन में पैसा लगाएंगे? क्या वो इन्वेस्टमेंट टीम को बनाए रखेंगे? क्या उनके पास वो धैर्य होगा जो चारों पिछले मालिकों के पास नहीं था? मुझे नहीं पता. इन सवालों के जवाब तीन से पांच साल में मिलते हैं, किसी एक प्रेस रिलीज़ में नहीं. लेकिन इस फ़ंड हाउस की पूरी कहानी में पहली बार नया मालिक न कोई मजबूरी में आया पार्टनर है, न कोई दबाव में बेचने वाला और न कोई ऐसा ग्लोबल दिग्गज जिसका एक पांव पहले से बाहर हो. यही बात मायने रखती है.

म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री तेज़ी से बदलती है - मालिकाना हक़ बदलते हैं, रेटिंग बदलती है, फ़ंड मैनेजर जाते हैं. इस सबका आपके पोर्टफ़ोलियो पर क्या असर पड़ता है, यह समझने के लिए सिर्फ़ ख़बरें पढ़ना काफ़ी नहीं होता. ऐसी जानकारी के लिए जो सीधे काम की हो, Value Research Online पढ़ते रहें.

यह भी पढ़ेंः फ़ंड का मैनेजर बदल जाए, तो निवेशक क्या करें?

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