
अगर आप म्युचुअल फंड में थोड़ी भी दिलचस्पी रखते हैं तो एसआईपी के बारे में जरूर जानते होंगे। यह म्युचुअल फंड में निवेश का सबसे अच्छे तरीका है। एसआईपी में हर माह एक तय रकम निवेश की जाती है। इसके कई फायदे हैं। रिटर्न के हिसाब से देखें तो एसआईपी में जब आप हर माह नियमित तौर पर निवेश करते हैं तो सालों के दौरान आपकी खरीद कीमत औसत हो जाती है। इससे आपका रिटर्न बढ़ता है। जब शेयर की कीमत गिरती है तो आपका इसका फायदा मिलता है क्योंकि आपकी एसआईपी उतने ही पैसे से ज्यादा यूनिट खरीदती है। एसआईपी में हर माह थोडी थोड़ी रकम निवेश की जाती है तो यह निवेश का ऐसा तरीका है जिसे ज्यादातर लोग अपना सकते हैं।
लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि आपके पास एकमुश्त बड़ी रकम आ जाती है। जैसे 5 लाख रुपए आ गए या 10 लाख रुपए आ गए। तो आप इसे मासिक एसआईपी के जरिए निवेश नहीं कर सकते। अगर आप इस पैसे को लंबी अवधि के लिए निवेश कर सकते हैं तो आप इसे इक्विटी में निवेश करना चाहते हैं। तो एक तरीका तो यह है कि आप इसे एक बार में इक्विटी में निवेश कर दें। कोई भी फंड बेचने वाला आपको यही सलाह देगा। ऐसा करके वह आपको फंड बेच कर मोटा कमीशन कमा लेगा। लेकिन आपके लिए यह जोखिम भरा होगा। मान लोग कि आपने 5 लाख रुपए या 10 लाख रुपए एक बार में इक्विटी में निवेश कर दिए और बाजार जल्द ही 10 से 20 फीसदी तक गिर गया। ऐसे में आप अपनी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा गवां देंगे। हो सकता है कि नुकसान से घबरा जाएं और अपना पूरा पैसा निकाल लें। इस तरह से आपका नुकसान स्थाई हो जाएगा और आप इस नुकसान की भरपाई कभी नहीं कर पाएंगे।
इसका एक सरल सा समाधान है। लेकिन बहुत कम निवेशक ही एसआईपी के चचेरे भाई से परिचित हैं। यह एसआईपी की ही तरह ऊंचे रिटर्न देने की क्षमता रखता है। इसमें जोखिम एसआईपी की तरह ही कम होता है। इसमें निवेश एक बार ही करना होता है। इसे कहते हैं सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान यानी एसटीपी। एसटीपी का मतलब है नियमित तरीक़े से पैसे को एक फंड से दूसरे फंड में ट्रांसफर करना। ये एक तरह का एसआईपी है लेकिन इसमें पैसा आपकी मासिक इनकम से नहीं जाता है बल्कि दूसरे म्युचुअल फंड से जाता है। तो आपके दिमाग में सवाल उठ रहा होगा कि यह काम कैसे करता है।
आप इसे एक उदाहरण के जरिए समझ सकते हैं। मान लेते हैं कि आपको कहीं से 10 लाख रुपए मिले हैं और आप इसे इक्विटी फंड में निवेश करना चाहते हैं। अगर आप इसे एक बार निवेश करते हैं तो इसका मतलब है कि आप बहुत ज्यादा जोखिम उठा रहा हैं। अगर इक्विटी मार्केट में बड़ी गिरावट आ जाती है तो आपको ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा। अब ऐसे में आपको एक इक्विटी फंड लेना होगा इसके बाद उसी फंड हाउस का शार्ट टर्म डेट फंड लेना होगा। इसके बाद आपको पूरा पैसा एक बार में डेट फंड में लगाना होगा। साथ ही आपको फंड हाउस को कहना होगा कि वे हर माह एक लाख रुपए आपके चुने हुए इक्विटी फंड में ट्रांसफर करते रहें। तो इस तरह से 10 से 12 माह में आपका पूरा पैसा इक्विटी फंड में चला जाएगा। इस तरह आपकी खरीद कीमत औसत हो जाएगा और आप बाजार के उतार चढ़ाव के जोखिम से अपने निवेश को कुछ हद तक सुरक्षित रख पाएंगे। निवेश की इस प्रकिया को ही एसटीपी कहते हैं।
एसटीपी भी एसआईपी की तरह ही बाजार के जोखिम से आपको पूरी तरह से नहीं बचाता है। अगर आप पिछले एक दशक के दौरान बाजार के प्रदर्शन को चेक करें तो पाएंगे कि एसटीपी जोखिम को एक हद तक कम करता है लेकिन आपको नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा इसकी गारंटी नहीं देता है। अब अगर बाजार कई सालों तक बढ़ता ही रहता है और फिर अचानक गिरता है तो एसटीपी भी आपको नुकसान से नहीं बचा सकता है। 2003 में ऐसा ही हुआ था। उस समय 2003 से 2008 तक बाजार लगातार बढ़ता ही रहा और इसके बाद अचानक बाजार में तेज गिरावट का दौर आ गया। इक्विटी तो इक्विटी है। इक्विटी में निवेश करते हुए आपको जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना होगा। लेकिन अगर आप पिछले 20 सालों में बाजार के प्रदर्शन पर गौर करें तो आप पाएंगे कि आप अपने निवेश को 1 से 3 साल तक फैला कर जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
तो अब आप यह कैसे तय करेंगे कि आपको अपना पैसा कितनी अवधि में निवेश करना चाहिए। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि रकम कितनी है और आप इस रकम पर किस हद तक निर्भर है। उदाहरण के लिए आपको प्रॉपर्टी बेचने से एक बड़ी रकम मिली है और यह आपकी भविष्य की जरूरतों के लिए बहुत अहम है तो आप इस रकम को 3 या 4 साल में निवेश कर सकते हैं। वहीं अगर आपको बोनस मिला है जो आपकी कुछ महीनों की सैलरी के बराबर है तो आप इसे छह माह में निवेश कर सकते हैं। इसका कोई तय नियम नहीं है। सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि आप कितना जोखिम उठा सकते हैं।