
हम सब जानते हैं महिलाएं परिवार की सबसे अहम सदस्य हैं। इनके बिना परिवार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसके बावजूद सच यह है कि ज्यादातर परिवारों में महिलाओं की पैसे के मामले में नहीं चलती है। यानी पैसे का क्या करना है। इसे निवेश करना है तो कहां करना है। इन बातों पर फैसला आम तौर पर पुरूष ही करते हैं। अब ऐसा क्यों है। इसका जवाब कठिन नहीं है।
वैल्यू रिसर्च में हमारे पास हर साल हजारों सवाल आते हैं। साइट पर आने वाले विजिटर्स हमसे निवेश से जुड़े सवाल पूछते हैं। इनमें से कितने सवाल महिलाओं के हैं इसके बारे में हमारे पास कोई सटीक आंकड़ा नहीं है लेकिन एक मोटा अनुमान यह है कि सवाल पूछने वालों में महिलाओं की संख्या 1 फीसदी से भी कम है। साफ है कि यह संख्या बेहद कम है। लेकिन इससे भी बड़ी एक और समस्या है। वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर आने वाले कुल विजिटर्स में लगभग 30 फीसदी महिलाएं हैं। तो असली बात यह है कि महिलाएं पुरूषों की तुलना में बेहद कम सवाल पूछती हैं। ऐसा क्यों है ? इसका कारण समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है।
आम तौर पर महिलाएं फाइनेंशियल वेबसाइट का इस्तेमाल पुरूषों की तुलना में बेहद कम करती हैं। इसका अहम कारण यह है कि महिलाएं पुरूषों की तुलना में कम कमाती हैं। यहां तक कि अगर महिलाएं अच्छा पैसा कमा रहीं हैं और वे ऐसे परिवार से हैं जहां ज्यादा भेदभाव नहीं हैं तब भी इस बात की संभावना बेहद कम होती है कि वे अपने पैसे के बारे में खुद फैसला कर सकें। वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को अगर छोड़ दिया जाए तो ऐसा लगता है कि आम तौर पर महिलाएं निवेश नहीं करती हैं। कम से कम हमारे पास उपलबध आंकड़े तो यही बताते हैं।
इसका कारण जानना ज्यादा मुश्किल नहीं है। आम तौर पर ज्यादातर परिवारों में पुरूष बचत और निवेश करते हैं। यह समस्या का एक पहलू है। समस्या का दूसरा पहलू यह हो सकता है कि सार्वजनिक तौर पर सवाल पूछने को लेकर महिलाएं कितनी सहज हैं। कई लोग यह सोचते हैं कि उनका सवाल मूर्खतापूर्ण न लगे। इस वजह से वे सवाल नहीं पूछते हैं। हालांकि हजारों पुरूष लिख कर सवाल पूछते हैं और वे निवेश के बारे में दी गई सलाह से सीखते हैं। वे इस बात की ज्यादा परवाह नहीं करते कि उनके सवाल मूर्खतापूर्ण हैं या नहीं।
तो सवाल पूछने को लेकर महिलाओं के रवैये में बदलाव कैसे होगा। एक बड़ा सवाल यह है कि कौन कमा रहा है और पैसे पर किसका नियंत्रण है। मुझे नहीं लगता है कि इसका समाधान यह हो सकता है कि हम महिलाओं को कमजोर समझ कर उनकी मदद करें। मौजूदा समय में मार्केटिंग के लिए अपनाई जा रही कई तरह की रणनीति भी बदलाव लाने में खास मदद नहीं कर सकती है। जैसे बैंक और दूसरी कंपनियां महिलाओं के लिए विशेष तौर पर बैंक अकाउंट और क्रेडिट या डेबिट कार्ड की पेशकश करते हैं। इस तरह की मार्केटिंग रणनीति में दावा किया जाता है कि हमने महिलओं के लिए विशेष उत्पाद तैयार किया है और हमारे उत्पाद में ऐसी तमाम खूबियां हैं जो महिलाओं की जरूरतों को पूरा करती हैं। इस तर के ऑफर्स या उत्पादों से महिलाओं को कोई खास फायदा नहीं होता है।
याद रखने वाली सबसे अहम बात यह है कि पैसा पावर या ताकत का ही एक रूप है। यह ताकत पैसा कमाने में भी है और जो पैसे के बारे में फैसले करता है। मसलन कितनी बचत करनी है कितना खर्च करना और कितना निवेश करना है। निवेश कहां करना है। वही इस ताकत का असली मालिक होता है।
यह ऐसी ताकत है जिसे आप ऐसे ही किसी को नहीं दे सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति इस ताकत को हासिल करना चाहता है तो उसे प्रयास करके इसे हासिल करना होगा। यानी उनको पैसा कमाना होगा, निवेश करना होगा और पैसे पर नियंत्रण करना होगा।
आप पुरूष हैं और पर्सनल फाइनेंस के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं। या आप महिला हैं और पर्सनल फाइनेंस के बारे में कुछ खास नहीं जानते। इस बात में कोई अंतर नहीं है। पुरूष और महिलाएं दोनों वर्गों में ऐसे लोगों की सख्ंया अधिक है जो पर्सनल फाइनेंस के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं। तो इसका समाधान पुरूषों और महिलाओं के लिए अलग अलग नहीं है। महिलाओं के लिए अलग वित्तीय उत्पाद और सेवाएं भी कोई समाधान नहीं है। इसका समाधान सिर्फ यह है कि महिला हो या पुरूष पर्सनल फाइनेंस के बारे में पढ़े। अपने आप को शिक्षित करें और अपनी समझ को उस स्तर पर लाएं जो निवेश और पैसों के प्रबंधन में उनकी मदद कर सके।