
अगर आप बचत और निवेश करते हैं तो आपने साइकल यानी चक्र या साइक्लिकल यानी चक्रीय शब्द जरूर सुना होगा। अब तक नहीं सुना है तो आगे सुनेंगे। सुनने में यह शब्द काफी प्रभावशाली लगता है। निवेश से जुड़े दूसरे वजनदार शब्द की तरह। लेकिन इस शब्द का मतलब थोड़ा मिला जुला है। यह बहुत फायदेमंद हो सकता है। या हो सकता है कि इसका कोई मतलब न हो। यह बेकार से भी ज्यादा खराब हो सकता है। बेकार से भी खराब होने से मेरा मतलब यह है कि यह शब्द किसी निवेशक को गुमराह भी करने वाला हो सकता है। बाजार के प्रदर्शन के तकनीकी विश्लेषण को फॉलो करने वाले साइकल को कई तरह से इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह तब तक ठीक है जब तक आप इसके चक्कर में नहीं पड़ते हैं।
अगर आप गूगल पर यह जानने का प्रयास करें कि साइकल क्या है और इसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं तो कई कई तरह के साइकल दिखेंगे। बिजनेस साइकल, मार्केट साइकल और इकोनॉमिक साइकल। इसके अलावा सेक्टोरल और इंडस्ट्रियल साइकल भी हैं।
तो एक निवेशक इन सब से क्या समझ सकता है ? अगर आप कुछ सालों से बाजार में निवेश कर रहे हैं तो आप समझ सकते हैं कि मार्केट साइकल क्या होता है ? अगर परिभाषा की बात करें तो बेंचमार्क इंडेक्स के दो उच्चतम स्तर और दो निचले स्तर के बीच की अवधि को साइकल कहते हैं। उदाहरण के लिए जनवरी, 2008 के पहले सप्ताह में दो निफ्टी ने उच्चतम स्तर को छुआ और यह 6200 पर पहुंचा। इसके बाद वैश्विक वित्तीय संकट की वजह से निफ्टी में बड़ी गिरावट आई। और इसके बाद निफ्टी ने पहले के उच्चतम स्तर को 2010 के अंत में दोबार छुआ। यह एक साइकल है।
हालांकि मार्केट साइकल अपने आप में अहम नहीं बल्कि अहम निवेशक की मानसिक साइकल है। जैसे बाजार अपने साइकल के अलग अलग दौर से गुजरता है उसी तरह इसके जवाब में आपकी मानसिक स्थिति अलग- अलग दौर से गुजरती है। और अंत में आप पैसा बना पाएंगे या नहीं या आपने जीवन के वित्तीय लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे या नहीं। यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आपका व्यक्तिगत मानसिक साइकल किस चरण में है और आप इसे कैसे संभालते हैं।
अलग अलग समय पर अलग अलग तरह की मानसिक हालत मिल कर आपके साइक्लॉजिकल साइकल यानी मनो वैज्ञानिक चक्र को बनाती है। जैसे जब बाजार अपने पहले के निचले स्तर से चढ़ना शुरू होता है तो आप आशावाद, उत्साह, उल्लास, बहुत ज्यादा खुशी, चिंता, अनदेखा करना, डर, संताप, घबड़ाहट, हतोत्साहित, निराशा, उम्मीद, राहत और इसके बाद फिर से आशावाद से गुजरते हैं। इससे पत चलता है कि बाजार का कौन सा चरण किस तरह की भावनाओं को उभारता है।
साइकल यानी चक्र को लोग अच्छी तरह से जानते हैं और अगर आप गूगल करते हैं तो इसके बारे में कई पोस्टर्स और मीम्स मिलते हैं। आपको इस बारे में भी ज्ञान मिलेगा कि साइकल के किस बिंदु पर आपको निवेश करना चाहिए। आम तौर पर डायग्राम बताएगा कि बहुत ज्यादा खुशी का चरण ऐसा समय है जब लालच सबसे ज्यादा होता है और यह निवेश का सबसे खराब समय है। इसी तरह से आम तौर पर निराशा के चरण को निवेश का सबसे अच्छा समय बताया जाता है।
ये तो जाहिर सी बात है और निवेश के बारे में कई जाहिर सी बातों की तरह यह बेकार की चीज है। आप इसे एक ऐसे समझ सकते हैं। 2003 से 2008 के तक बाजार में जोरदार तेजी का दौर था। इस अवधि में ज्यादातर निवेशक बहुत ज्यादा खुशी वाले चरण में 2004 तक पहुंचे। उस समय सेंसेक्स 3,000 से बढ़ कर 6,000 से ऊपर पहुंच गया। यानी दोगुना तक बढ़ गया। हालांकि सेंसेक्स इसके बाद आगे भी लगभग दोबार दोगुना हुआ और 2008 की शुरूआत में 20,000 को पार कर अपने उच्चतम स्तर तक पहुंचा। इसी तरह से गिरावट के दौर में बहुत से निवेशक 15,000 तक पहुंचने पर निराशा के चरण में पहुंच गए लेकिन सेंसेक्स बहुत ज्यादा गिरा और महीनों तक गिरता रहा।
इसका मतलब है कि जब आप किसी चीज को अनुभव करते हैं तो चीजें काफी अलग लगती हैं। और मेरे हिसाब से यह सबसे अहम बात है कि समय और अनुभव सबकुछ बदल देता है। भावनाओं की लंबी सूची का मतलब तभी है जब आप निवेश करते हुए पहली बार मार्केट साइकल से गुजर रहे हैं। हममें से बहुत से लोग ऐसा करते हैं। 1990 की शुरूआत में मैंने भी ऐसा ही महसूस किया था। अंत में आप यह सीख जाते हैं कि गुणवत्ता पूर्ण निवेश के साथ बने रहना फायदेमंद होता है। और इसके बाद जब दोबारा साइकल शुरू होता है तो आप सामान्य रहते हैं। कई तरह की भावनाओं में बहने के बजाए आपमें एक या दो तरह की भावनाएं होती हैं जो आपके साथ स्थाई रूप से रहती हैं। ये सजग रहना और आत्मविश्वास। जब आप ऐसे बिंदु पर पहुंच जाते हैं तो आपके लिए मार्केट साइकल का कोई मतलब नही होता है। आपने निवेश के अनुभव से इसे बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

