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भ्रामक बाजार

भारत में मोबाइल सेवाओं के बाजार की हालत लगातार खराब होती जा रही है ऐसे में एक कदम पीछे हट कुछ बुनियादी चीजों पर गौर करना फायदेमंद हो सकता है

भारत में मोबाइल सेवाओं के बाजार की हालत लगातार खराब होती जा रही है ऐसे में एक कदम पीछे हट कुछ बुनियादी चीजों पर गौर करना फायदेमंद हो सकता है

जब मैं यह कॉलम लिख रहा हूं, उसी समय वोडाफोन के सीईओ ने लंदन में कहा है कि उनकी कंपनी भारत से कारोबार बंद कर सकती है। भातर में वोडाफोन का घाटा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में कंपनी भारत में मौजूद सारे असेट बेच कर देनदारियां चुकाना चाहती है। यह साफ है कि कुछ बड़ा बदलाव नहीं होता है तो वोडफोन के लिए यह सही कारोबारी फैसला होगा। यानी वोडफोन भी जल्‍द ही उन टेलीकॉम कंपनियों में शामिल हो सकती है जिनको भारत से अपना कारोबार समेटना पड़ा। इन कंपनियों में एटीएंडटी, टाटा टेलेनॉर, एयरसेल, आरकॉम, एमटीएस, डोकोमो और दूसरी कंपनियां शामिल हैं। थोड़ा जल्‍दी या दूर से शायद एयरटेल भी बंद हो जाए। इसके बाद जियो या बहुत ज्‍यादा कीमते बढ़ा देगी या वह भी बंद हो जाएगी। मैं यह बात पूरी गंभीरता से कह रहा हूं। भारत में टेलीकॉम सेवाओं पर ऊंची टैक्‍स दरों की वजह से ये सेवाएं कंपनियों के लिए आर्थिक तौर पर वहनीय नहीं रह गई हैं। कुछ सप्‍ताह पहले मैंने अपने कॉलम में लिखा था कि भारत में टेलीकॉम सेवाओं की बुरी हालत इसलिए है क्‍योंकि लाइसेंस फीस और स्‍पेक्‍ट्रम चार्जेज सेवाओं का उपयोग करने वालों पर टैक्‍स की तरह हैं। टेलीकॉम कंपनियां लाइसेंस फीस और स्‍पेक्‍ट्रज चार्जेज के तौर पर जो रकम सरकार को चुकाती हैं वह पैसा उनको यूजर्स से ही रिकवर करना होता है। एक तरह से यह रकम टेलीकॉम कंपनियां एडवांस के तौर पर जमा कराती हैं। जब तक हम यह नहीं स्‍वीकार करेंगे कि यही टेलीकॉम सेक्‍टर की बदलहाली की अहम वजह है तब तक समाधान का कोई रास्‍ता नजर नहीं आएगा। वास्‍तव में अगर भारत में अप्रत्‍यक्ष कर की मौजूदा प्रणाली का सही तरीके से पालन किया जाए तो लाइसेंस फीस को जीएसटी में मिला दिया जाए। एक तरह से देखें तो टेलीकॉम यूजर्स पर सेल्‍स टैक्‍स 50 फीसदी से लेकर 100 फीसदी से भी अधिक है। मौजूदा समय में मोबाइल यूजर्स से जो कीमतें ली जा रही हैं और जितना टैक्‍स वसूला जा रहा है उसको अगर मिला दिया जाए तो ज्‍यादातर भारतीय मोबाइल सेवाएं वहन नहीं कर पाएंगे। इस समीकरण के कुछ हिस्‍से को बदलना होगा। अगर कीमतों को बढ़ा कर उस स्‍तर पर लाया जाए जहां मोबाइल सेवाएं कंपनियों के लिए आर्थिक तौर पर वहनीय हो जाएं तो मोबाइल फोन का बाजार बुरी तरह से सिकुड़ जाएगा। हो सकता है कि यह घट कर एक चौथाई रह जाए। और इसके विकल्‍प के तौर पर अगर मोबाइल सेवाओं का इस्‍तेमाल करने वाला हर व्‍यक्ति इसकी पूरी लागत को वहन कर ले तो टैक्‍स में बड़े पैमाने पर कटौती की जानी चाहिए। हालांकि अगर हम इस मुद्दे को किनारे कर दें तो भी बुनियादी समस्‍या यह तय करना है कि विभिन्‍न उत्‍पादों और सेवाओं के बाजार का सही आकार क्‍या है। सिर्फ टेलीकॉम ही नहीं ज्‍यादातर वस्‍तुओं और खास कर टेक आधारित सेवाओं में हम यह भूल जाते हैं कि कीमतें बाजार का आकार तय करने में सबसे अहम भूमिका निभातीं हैं। भारत में मोबाइल सेवाओं के बाजार का आकार क्‍या है ? सही मायने में मोबाइल सेवओं के बाजार का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि मोबाइल सेवाओं की कीमत 30 रुपए महीना है या 500 रुपए महीना। एक शहर में हर साल कितने मझोले आकार के अपार्टमेंट बेचे जा सकते हैं ? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अपार्टमेंट की कीमत 1 करोड़ रुपए है या 3 करोड़ रुपए। यानी कीमतें घटने बढ़ने से बाजार का आकार घटता या बढ़ता है। अमेरिकी कहेंगे यह तो बेसिक इकोनॉमिक्‍स है। यह बेसिक बात तो है लेकिन फिर भी ज्‍यादातर लोग इसे समझ नहीं पाते हैं। मुझे वास्‍तव में ऐसा लगता है कि कुछ कंपनियां इसे भूल गई हैं। मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने गूगल किया बाजार का आकार कैसे तय करें और इसके बाद पहले पेज पर आए सारे नतीजों को पढ़ा। लेकिन मुझे यह जानकार झटका लगा कि किसी भी जवाब में कीमतों का जिक्र नहीं किया गया है। जवाब में तमाम चीजें बताई गई हैं। लेकिन बाजार का आकार तय करने में कीमतों की भी कोई भूमिका है इसका जिक्र नहीं किया गया है। उस पहले सिद्धांत का क्‍या हुआ जो कहता है कि किसी चीज को खरीदने की इच्‍छा और क्षमता मांग तय करती है ? हाईस्‍कूल की इकोनॉमिक्‍स भी यही बताती है। मुझे ऐसा लग रहा है कि कुछ कंपनियों को लगता है कि कीमतों को नजरअंदाज किया जा सकता है क्‍योंकि मुनाफे को भी नजरअंदाज किया जा सकता है। आज से तीस चालीस साल पहले जब नियंत्रित अर्थव्‍यवस्‍था का दौर था तो बाजार का आकर नई दिल्‍ली और मास्‍को जैसे शहरों के सरकारी कार्यालयों में तय किया जाता था और उसके बाद बजट आवंटित किया जाता था। वहीं आजकल बाजार का आकार वेंचर कैपिटल कंपनियां तय करती हैं और इसके बाद बजट का आवंटन किया जाता है। सॉफ्ट बैंक, सेक्‍युआ उनके द्वारा वित्‍त पोषित कंपनियों के फैसलों में मुक्‍त बाजार की बात बहुत कम है। यह कंपनियां भी उसी तरह से फैसले करती हैं जैसा 1970 के दशक में योजना आयोग करता था। आपको इसके बारे में सोचना होगा। अगर आप कोई चीज उसकी वास्‍तविक लागत से बहुत कम लागत पर वितरित कर रहे हैं तो आप उस चीज का बहुत बड़ा बाजार साबित कर सकते हैं। लेकिन यह बाजार का वास्‍तविक आकार नहीं है यह आकार भ्रामक है। अगर ग्राहकों को पूरी लागत का भुगतान करना पड़े तो भारत में फूड डिलिवरी, डिजिटल वॉलेट और कैब सेवाओं के बाजार का आकर क्‍या होगा ? इसका जवाब होगा कि यह कोई नहीं जानता है। अभी सेवाओं के बाजार का सही आकर पता नहीं चला है। यह तभी पता चलेगा जब इनके कारोबार में लगा पैसा खत्‍म हो जाएगा। टेलीकॉम कंपनियों का कारोबार बहुत बड़ा है और इसमें बहुत ज्‍यादा पैसा लगा हुआ है इसके बावजूद पैसा खत्‍म हो चुका है। लेकिन बुनियादी सवाल अब भी वही है। अगर भारत में मोबाइल सेवाएं पूरी लागत और टैक्‍स के बोझ के साथ दी जाएं तो कितने भारतीय सेवाओं के लिए भुगतान करना चाहेंगे और भुगतान करने में सक्षम होंगे ? भारत में पहली टेलीकॉम पॉलिसी 25 साल पहले घोषित की गई थी लेकिन आज भी इसका जवाब कोई नहीं जानता है।

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