
कुछ दिन पहले ऑल इंडिया रेडियो पर मेरे वीकली शो में एक श्रोता ने एक सवाल पूछा। श्रोता का सवाल बहुत मुश्किल था और उनकी समस्या का समाधान भी लगभग नामुमकिन था। सवाल पूछने वाले दर्शक ने कई इक्विटी फंडों में निवेश किया हुआ था। लेकिन कोविड संकट शुरू होने के बाद अप्रैल माह में इक्विटी मार्केट में तेज गिरावट आई। इससे घबरा कर उन्होंने बाजार से निकलने का फैसला कर लिया और अपना ज्यादातर निवेश भुना लिया। उस समय उनको लगा था कि बाजार में अभी और भी बड़ी गिरावट आएगी ऐसे में यह सुरक्षित लगा कि अभी इंतजार किया जाए और बाद में किसी समय निवेश किया जाए। लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा। बाजार रिकवर हुआ और इक्विटी की वैल्यू लगभग उसी स्तर पर पहुंच गई जो फरवरी में थी। यानी बाजार में तेज गिरावट का दौर शुरू होने से पहले के स्तर पर।
हालांकि मुझसे सवाल पूछने वाले दोस्त अब भी उसी हालत में हैं। वे अब भी बाजार में गिरावट की चिंता से उबर नहीं पाए हैं। वे अब भी निवेश करने से हिचकिचा रहे हैं और अपनी रकम लिए हुए बैठे हैं। अब वे दोनों तरह की बुरी स्थितियों से गुजर चुके हैं। जब बाजार में तेज गिरावट का दौर आया तो उन्होंने निवेश किया हुआ था और जब बाजार ऊपर चढ़ रहा है तो उनका निवेश बाजार में नहीं है। फरवरी और मार्च में उनको हुआ नुकसान अब स्थाई बन गया है।
उस श्रोता की समस्या में मेरे दिमाग में कुछ समय तक छाई रही क्योंकि मुझे उसका जवाब सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर लाइव रेडियो शो में देना पड़ा था। हालांकि यह कोई अपनी तरह की इकलौती कहानी नहीं है। बाजार में निवेश का सही मौका तलाश करना बहुत से निवेशकों के दिमाग में बहुत गहरे तक बसा हुआ है। बाजार में निवेश के सही मौके का विचार बहुत ललचाने वाला है। कुछ निवेशकों को लगता है कि इस तरीके से वे अपने रिटर्न को बढ़ा सकते हैं या कम से कम कम बरबाद होने से बचा सकते हैं। बाजार गिर रहा है और आपको लगता है कि आपका रिटर्न बरबाद हो रहा है। ऐसे में चलो निवेश बेच लेते हैं और जब बाजार ऊपर चढ़ना शुरू होगा तो फिर से खरीद लेंगे।
एक तरह से आप इसके लिए लोगों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। निवेश को लेकर सोच यह है कि निवेश का मतलब है कि कम कीमत में खरीदो और ज्यादा कीमत में बेचो। और यही वह चीज है जो बचत करने वाला या निवेशक सबसे पहले सीखता है। वास्तव में एक पुरराना वाल स्ट्रटी जोक है। एक नया निवेशक अनुभवी निवेशक से पूछता है कि बाजार में आपने रकम कैसे बनाई। अनुभवी निवेशक ने जवाब दिया। इससे सरल कुछ भी नहीं हो सकता है। कम कीमत में खरीदो और ज्यादा कीमत में बेचो। नए निवेशक ने पूछा मैं यह कैसे सीख सकता हूं। जवाब मिला। इसे सीखने में पूरी जिंदगी लग जाती है। दुर्भाग्य से कम कीमत में खरीदो और ज्यादा कीमत पर बेच दो का मतलब लोगों ने यह लगाया कि जब स्टॉक की कीमत गिर जाए तो बेच दो और जब कीमत बढ़ जाए तो खरीद लो।
हालांकि सच यह है कि इक्विटी निवेश सही समय से ज्यादा लेना देना नहीं है। इसके बजाए निवेश की दिशा, गुणवत्ता और आप की च्वाइस ज्याद अहम है। वास्तव में इक्विटी निवेश में आप अर्थव्यवस्था की ग्रोथ और इस बात पर दांव लगाते हैं कि यह किस ओर जा रही है। अगर आपको लगता है कि भले ही कितनी बाधाएं आएं लोग समय के साथ समृद्ध होंगे और ज्यादा रकम बनाएंगे। तो आपके लिए समस्या बहुत आसान हो जाती है। आप ऐसी कंपनियों में निवेश करें जो दूसरों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन करने वाली हों। और अगर आपने म्युचुअल फंड के जरिए निवेश करना चुना है तो यह और ज्यादा आसान हो जाता है। खास कर वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन की मदद से।
कल की खबर का अनुमान लगाने का प्रयास करना किसी भी तरह से इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकता है। वास्तव में पिछले कुछ माह के दौरान एक और नाटक हो रहा है और वह है गोल्ड। पिछले काफी समय से गोल्ड का रिटर्न कुछ खास नहीं रहा है। और यह चौंकाने वाला भी नहीं है क्योंकि गोल्ड किसी काम का नहीं है। भले ही हम इसे कमोडिटी कहते हैं। लेकिन दूसरी लाभदायक जिंसो जैसे गेंहू, कॉपर या तेल जैसा गोल्ड में कुछ भी नहीं है। लेकिन जबसे कोरोना संकट शुरू हुआ है तब से गोल्ड की कीमतों में जबदर्स्त उछाल का दौर शुरू हो गया है और जब तक इस आर्टिकल को पढ़ेंगे तब तक शायद यह दौर खत्म भी हो चुका होगा। लेकिन फिर भी कुछ समझदार लोग सेफ हैवेल और इन्फ्लेटरी एक्सपेक्टेशन जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि यह एक ट्रेंड है जो शुरू हुआ है और यह अपने आप कमजोर भी पड़ जाएगा। अगर आप भविष्य के लिए निवेश कर रहे हैं तो गोल्ड खरीदने का कोई मतलब नहीं बनता है। उसी तरह से जिस तरह मेरे उस ऑल इंडिया रेडियो शो वाले दोस्त का इक्विटी फंड बेचने का कोई मतलब नहीं बनता था।





