
एक संकट जीवन को कितना सरल बना सकता है। मार्च में जब कोरोना का प्रसार तेजी से शुरू हुआ तो इसका अनुभव हम सब ने किया। संकट के दौर में जीवन में बस बहुत ही बुनियादी जरूरतें रह गईं। ज्यादातर गतिविधियां या जीवन की जटिलताएं गायब हो गईं। भविष्य के लिए स्थगित कर दी गईं। सबके सामने फार्मूला बहुत सरल था। जितना संभव हो उतना अपना काम करते हुए खुद को सुरक्षित रखें।
निर्मला सीतारमन के पास बजट पेश करने का काम भी उतनी ही सरल था। बड़े पैमाने पर रकम खर्च करें और इसके लिए जरूरी रकम उधार लें। कुल मिला कर देखें तो यह सालों के दौरान आया अब तक का सबसे सरल बजट है। मैं अपनी याद्दाश्त के आधार पर यह कह रह हूं कि ऐसा पहली बार है जब राजकोषीय घाटे को लेकर हाय तौबा मचाने की जरूरत भी नहीं महसूस की जा रही है। 2020-21 का संशोधित बजट अनुमान 9.5 फीसदी है। यह ऐसा आंकड़ा है जिस पर ज्यादातर विश्लेषक एक साल पहले काफी शोर मचाते। लेकिन आज इस आंकड़े पर कोई गौर ही नहीं कर रहा है। वास्तव में बजट पेश होने के बाद पहले कुछ घंटो में मैंने इसके बारे में एक भी टिप्पणी नहीं सुनी।
अगले साल का बजट अनुमान 6 फीसदी से ऊपर है और इस बात की संभावना काफी अधिक है कि यह 6 फीसदी को भी पार कर जाएगा। लेकिन इसे भी सामान्य बात की तरह लिया जा रहा है। सरकार को अगले दो तीन साल तक राजकोषीय घाटे को लेकर ज्यादा आलोचना का सामना नहीं करना पड़ेगा। इस अवधि में सरकार आराम से उधार लेकर खर्च कर सकती है। निश्चित तौर पर राजकोषीय घाटे की आर्थिक कीमत चुकानी होगी लेकिन पिछले कुछ माह ने हमको सिखाया है कि कोई सटीक समाधान नहीं है। सिर्फ ट्रेड ऑफ यानी समझौता या लेन-देन काम करता है। इस समय आप सारी चीजों पर बात कर सकते हैं लेकिन वित्त मंत्री ने जो ट्रेड ऑफ चुने हैं वे व्यावहारिक हैं।
साफ है कि यह खर्च पर जोर देने वाला बजट है। अभी जो हुआ है वह सिर्फ शुरूआत है। बजट सिर्फ रकम मुहैया कराता और सरकार के सभी अंगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे इस रकम से जमीन पर काम करके दिखाएं। एक समय था जब ऐसा होना आसान नहीं था लेकिन आजकल भारत में नीतियों को लागू करने के मोर्चे पर काफी सुधार दिख रहा है। इस लिहाज से यह एक अवसर भी हो सकता है।
बजट के दिन को लेकर मेरा यही कहना है कि बजट में ज्यादा कुछ नहीं है। कुछ छोटे समझौतों के अलावा बचत और निवेश से जुड़े क्षेत्र में कुछ भी नहीं बदला है। यूनिक लिंक्ड प्रोडक्ट यानी यूलिप में एक दिलचस्प बदलाव हुआ है। इसके तहत सरकार ने टैक्स से जुड़े नियमों में कुछ कमियों की पहचान कर इसे दूर किया है।
बेहतर जानकारी और समझ रखने वाले बचतकर्ता यह बात सालों से जानते हैं कि इन्श्योरेंस इंडस्ट्री यूलिप के जरिए लोगों को महंगा और खराब प्रदर्शन करने वाला इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट बेच रही है। और यूलिप को लोगों के सामने ऐसे इन्श्योरेंस प्रोडक्ट के तौर पर पेश किया जा रहा है जिस पर आपको टैक्स बचाने का मौका भी मिलता है।
बजट में कहा गया है कि एक्ट के मौजूदा प्रावधानों के तहत पॉलिसी की अवधि में कोई भी व्यक्ति कितना भी प्रीमियम चुका सकता है। इसकी कोई अधिकतम सीमा नहीं है। ऐसे मामले देखे गए हैं जहां अमीर व्यक्ति यूलिप में प्रीमियम के तौर पर बड़ी रकम निवेश करते हुए इस क्लाज के तहत टैक्स छूट का दावा रहे हैं। बड़ी प्रीमियम वाली पॉलिसी को टैक्स छूट का फायदा देने से इस क्लाज का मकसद पूरा नहीं होता है। हालांकि यह भारतीय बीमा एवं विनियामक प्राधिकरण की ओर से नियामकीय विफलता भी है। लेकिन यह एक अलग कहानी है। जहां तक टैक्स के नियमों की बात है तो अब कोई भी व्यक्ति यूलिप में सालाना 2.5 लाख रुपए के प्रीमियम पर ही टैक्स छूट पा सकता है। यानी अब आप कितने ही यूलिप में निवेश करें आपको टैक्स छूट एक साल में 2.5 लाख रुपए तक के चुकाए गए प्रीमियम पर ही पड़ेगी। इसके अलावा यूलिप भुनाने पर इसे इक्विटी म्युचुअल फंड की तरह ही देखा जाएगा।
सभी बातों पर गौर करें तो वायरस एक संकट है जिसे कई क्षेत्रों में अवसर के तौर पर बदला जा सकता है। बजट यह दिखाता है कि सरकार ने माना है कि यह तरीका बेहतर है। क्या यह काम करेगा ? मुझे लगता है कि यह काम करेगा।