
सैद्धांतिक तौर पर इक्विटी निवेशकों को अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए।
यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती है कि अर्थव्यवस्था के बड़े मसलों पर आपकी राय क्या है। मायने रखने वाली बात सिर्फ यह है कि आपने जिन स्टॉक्स में निवेश किया उसके मुनाफे और ग्रोथ को लेकर संभावनाएं कैसी हैं। हमने कई बाद देखा है कि अर्थव्यवस्था जब गहरे संकट में होती है तब भी बहुत सी कंपनियां होती हैं जो बढ़ती रहती हैं और शानदार मुनाफा दर्ज करती रहती हैं। ऐसा लगता है कि उनके आसपास के खराब माहौल को कोई असर ही नहीं है। आपके लिए यह सब बाते अहम हैं। क्या ऐसा नहीं है ?
हकीकत कहीं ज्यादा जटिल है। लेकिन इसके साथ चेतावनी यह है अगर अर्थव्यवस्था खराब दौर से गुजर रही है तो यह उम्मीद की जा सकती है कि आखिरकार इसका असर कंपनियों पर पड़ेगा। लेकिन असलियत में ऐसा नहीं होता है। पिछले कई दशकों के दौरान जब भी किसी तरह का संकट आया है तो इसका नतीजा यह देखने को मिला है कि बेहतर कंपनियां और और अच्छा प्रदर्शन करती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि संकट की प्रकृति चाहे कुछ भी हो लेकर बेहतर कंपनियों पर इस संकट का असर बहुत कम होता है और वे ज्यादा मजबूती से रिकवर करती है। एक बार संकट खत्म हो जाने के बाद इन कंपनियों की स्थिति अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनियों से काफी बेहतर हो जाती है। हमने 2000-2001 में बाजार में तेज गिरावट आने पर आईटी कंपनियों के साथ ऐसा ही देखा है। इसके अलावा 20007-2008 में सभी तरह की कंपनियों के साथ ऐसा ही हुआ था। और अब चीनी वायरस के दौर में भी ऐसा ही देख रहे हैं।
हालांकि एक और तरीका है जिससे खराब हालात निवेश से जुड़े फैसलों को प्रभावित करते हैं। ऐसा इक्विटी निवेशक के स्वाभाविक आशावादी नजरिए को दबा कर किया जाता है। बहुत कम लोग समझ पाते हैं कि लंबी अवधि के इक्विटी निवेशकों से दूसरी तरह के निवेशकों को एक ही चीज अलग करती है और वह है उनका आशावादी नजरिया।
इक्विटी निवेशक स्वभाव से ही आशावादी होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो हमने अपनी रकम पब्लिक सेक्टर बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट में लगाई होती। इसके बजाए हम, स्टॉक्स खरीदते हैं। इसका मतलब है कि बुनियादी तौर पर हम यह मानते हैं कि आने वाला कल आज से बहुत बेहतर हो सकता है। इसी के साथ, हम इक्विटी निवेशक मानते हैं कि बड़ा मुनाफा कमाने का मौका बनाने के लिए थोड़ा जोखिम उठाना लेना बेहतर है। सामान्य तौर पर इक्विटी इन्वेस्टिंग अर्थव्यवस्था की दिशा और ग्रोथ पर दांव लगाना है। अगर आप सोचते हैं कि बाधाओं के बीच लोगों की संपन्नता बढ़ेगी और कंपनियां आज की तुलना में ज्यादा रकम बनाएंगी तो आप इक्विटी निवेशक बनने के लिए सही व्यक्ति हैं।
जब हम 2007- 2009 या मौजूदा महामारी जैसे बड़े वित्तीय संकट का सामना करते हैं तो बहुत से लोग सवाल करने लगते हैं कि क्या हम किसी बड़े संकट में फंस गए हैं और सबके लिए आगे का रास्ता ढलान वाला ही होगा। लेकिन स्वभाव से आशावादी व्यक्ति ऐसा नहीं सोचता है। इस तरह की गहरी निराशा में ऐसा व्यक्ति नहीं फंसता है। वे महसूस करते हैं या जानते हैं कि चीजें सही होंगी और जीवन आगे बढ़ेगा। सेवाओं और वस्तुओं का उत्पादन होगा। रकम का भुगतान होगा और रकम बनाई जाएगी और कंपनियां फलेंगी फूलेंगी। अगर ऐसा है तो चीजें बेहतर होंगी और समस्या सिर्फ अच्छी कंपनियों को चुनने की होगी।
इस बात पर भरोसा करने वाले आप अकेले नहीं हैं। एक दिन मैंने अखबार में एक कॉलम पढ़ा। कॉलम में बताया गया था कि भारतीय स्टार्ट अप में विदेशी फंडिंग स्रोत से बड़े पैमाने पर रकम आ रही है। 2021 के पहले सात माह में ही इस स्रोत से 20 अरब डॉलर की रकम आई है। यह भारत की जीडीपी का 0. 7 फीसदी है और इसे कम अवधि में खर्च किया जाएगा। इस रकम का एक बड़ा हिस्सा तमाम तरह के खर्च के तौर पर जाएगा जो टेक कंपनियां करेंगी। और इसका एक बड़ा हिस्सा इंडीविजुअल्स की जेब में जाएगा। यह एक तरह का प्रोत्साहन है, जो अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा। अर्थव्यवस्था को इस समय इसकी बहुत जरूरत भी है।
वायरस संकट के दौरान पेशेवरों द्वारा खराब तस्वीर पेश करने के भरपूर प्रयासों के बावजूद कम अवधि के लिए कुछ खास सेक्टर्स को छोड़ दे तो निराशा का कोई आधार नहीं है। यह ऐसा विचार है, जिसके साथ इक्विटी निवेशक सहज हैं।


