
लगभग 18 माह से दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में है और यह समय आपके निवेश के असेट अलॉकेशन को बनाए रखने के लिहाज से बहुत अच्छा समय नहीं रहा है। फरवरी 2021 से कोरोना का प्रकोप शुरू हुआ और इसकी वजह से बाजार में खतरनाक गिरावट देखी गई। बहुत से लोग अपना निवेश बेच कर इक्विटी से बाहर निकल गए। इसके बाद से तमाम सेक्टर्स और और हर तरह के आकार की कंपनियों के लिए सफर काफी टेढ़ा-मेढ़ा और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। निवेशक किसी ऐसे संकेत की तलाश में रहे कि जिससे यह पता चल सके कि कम अवधि और लंबी अवधि के लिहाज से वायरस का क्या असर होगा। यहां तक कि ऐसे दौर में भी जब स्टॉक कीमतें बढ़ रहीं थीं तब भी निवेशकों का भरोसा मजबूत नहीं था और उन्होंने अपने ज्यादातर फैसले कम अवधि के लिए अंदाजे और डर के आधार पर लिए।
तो इस टेढ़े मेढ़े और उतार-चढ़ाव भरे सफर का एक सबसे बड़ा असर यह रहा है कि असेट अलॉकेशन का संतुलन काफी हद तक बिगड़ गया है। कई ऐसे निवेशक हैं जो हड़बड़ी में बाहर निकल गए और फिर जल्दबाजी में वापस आ गए। पिछले साल के मध्य से मिड और स्मल कैप स्टॉक्स ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। यह हमेशा इस बात का संकेत होता है कि बाजार में तेजी का दौर आ रहा है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। छोटी कंपनियों के स्टॉक यही करते हैं और निवेशकों के लिए उनकी यही उपयोगिता है। हालांकि, इसकी वजह से बहुत से इक्विटी पोर्टफोलियो ऐसे स्टॉक्स की ओर झुक गए हैं और इससे कम अवधि में तेज उतार चढ़ाव और जोखिम बढ़ गया है।
इस समय असेट अलॉकेशन पर गौर करना और रीबैलेंसिंग का प्रयास करना बेवकूफी लग सकती है। क्योंकि असेट रीबैलेंसिंग का मतलब है कि अच्छा प्रदर्शन करने वाली असेट को बेचना और खराब प्रदर्शन करने वाली असेट में रकम लगाना है। यह निवेशक की सहज प्रवृत्ति के खिलाफ जाता है। इसीलिए अक्सर इसे तब तक नजरअंदाज किया जाता है जब कि बहुत देर न हो जाए।
कुछ पल के लिए हम रीबैलेंसिंग के बुनियादी विचार पर गौर करते हैं और सरल शब्दों में इसके तर्क पर विचार करते हैं।
1- बुनियादी तौर पर वित्तीय निवेश दो तरह के होते हैं। इक्विटी और फिक्स्ड इनकम । फिक्स्ड इनकम में डिपॉजिट और बांड आदि आते हैं।
2- इक्विटी में ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना होती है और यहां जोखिम भी अधिक रहता है। वहीं फिक्स्ड इनकम में कम रिटर्न मिलता है लेकिन यहां जोखिम भी कम होता है। अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के हिसाब से आप को इक्विटी और फिक्स्ड इनकम में एक तय अनुपात में निवेश करना चाहिए। इस अनुपात को असेट अलॉकेशन कहा जाता है।
3- समय के साथ इक्विटी और फिक्स्ड इनकम में अलग अलग दर से मुनाफा होता है। इसलिए असेट अलॉकेशन उस अनुपात से हट जाता है जो आप चाहते हैं। अलॉकेशन का जो अनुपात आप चाहते हैं उसी को बहाल करने के लिए रकम को एक असेट से निकाल कर दूसरी असेट में लगाने को असेट रीबैलेंसिंग कहा जाता है। असेट में ही जो कई सब टाइप होते हैं उनके लिए भी यही बात लाग होती है। उदाहरण के लिए, स्टॉक्स में, स्माल बनाम मिड बनाम लार्ज कैप्स या सेक्टर्स में भी इसे लागू किया जा सकता है।
हम बता रहे हैं क्यों यह काम करता है और क्यों निवेशक इस विचार के खिलाफ रहते हैं। जब ए बी की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है तो आप समय समय पर कुछ ए निवेश बेचते हैं और रकम बी में लगाते हैं जिससे संतुलन बहाल हो जाए। जब ए बी से पिछड़ने लगता है तो आप समय समय पर बी निवेश का कुछ हिस्सा बेच कर ए में निवेश करते हैं। यह मुनाफा वसूली और पिछड़ रही असेट में निवेश करने के विचार को शानदार तरीके से लागू करता है। इसका मतलब है कि जब आप पिछड़ना शुरू हो जाते हैं तो आपने दूसरी असेट से कुछ मुनाफा निकाल लेते हैं। किसी तरह का असेट क्लास या सब टाइप हो या ए व बी के लिए सब क्लास हो सिद्धांत यही है। साफ है कि ऐसा करना क्यों मुश्किल होता है। असेट रीबैलेंसिंग में हमेशा अच्छा प्रदर्शन करने वाली असेट को छोड़ना होता है।
हालांकि, निवेश में सफलता ऐसी चीजों से मिलती है जिसे करना मुश्किल होता है। बहुत से निवेशक कुछ खराब अनुभव से सीख पाते हैं। कुछ किस्मत वाले होते हैं जो बिना कीमत चुकाए ऐसा कर पाते हैं।


