
मैंने एक बार ‘मानसून, भारत का वास्तविक वित्त मंत्री’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। यह बारिश की अहमियत पर था। यह लेख कई अलग अलग हेडलाइन से प्रकाशित हुआ था। लेकिन हर साल पतझड़ खत्म होने के साथ दिन का तापमान बढ़ने के साथ लोग मानसून के बारे में बात करने लगते हैं। आजादी के इतने दिनों बाद भी बारिश की मात्रा और गुणवत्ता इकोनॉमी के लिए सबसे अहम फैक्टर्स में से एक बनी हुई है। देश भर में रात के खाने के समय जब आम का सीजन आने के बारे में बात होने लगती है तो इकोनॉमी पर नजर रखने वाले मानसून के बारे में मौसम विभाग के अनुमान को ट्रैक करने लगते हैं। क्योंकि खरीदारी, बिक्री, निवेश और खर्च के फैसलों पर इसका सबसे अहम असर होता है।
हर साल मुझे एक या दो ऐसी कहानियां सुनने को मिलती हैं जो मानसून पर हमारी निर्भरता को उजागर करती हैं। स्कूल के एक फ्रेंड ने, जो इलेक्ट्रॉनिक एप्लॉयंस कंपनी का सेल्स हेड है, ने कुछ साल पहले मुझे बताया था कि क्यों उसे और उसके ग्लोबल बॉस को इंडिया ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा नहीं है। मानसून आने में एक दो सप्ताह की देरी एयर कंडीशनर की बिक्री के लिए अच्छे साल और बुरे साल के बीच अंतर पैदा कर देती है। मेरी टीम की कड़ी मेहनत या नए मॉडल के लॉंच से ज्यादा असर मानसून का होता है। जाड़े के मौसम में बारिश की कहानी भी ऐसी ही है। एक बार मैंने उससे फोन पर पूछा क्या हो रहा है ? उसका जवाब था “प्रयास कर रहा हूं कि साउथ दिल्ली के आसपास कुछ टायर न जलाना पड़े”। राष्ट्रीय राजधानी का यह हिस्सा इनडोर एयर प्यूरी फायर के मार्केट के बड़े हिस्से में अहम योगदान करता है और उसके सालाना बोनस पर बड़ा असर डाल सकता है जो उसके सेल्स परफॉर्मेस से जुड़ा हुआ है। जाड़े में बारिश दिल्ली में आसमान के लिए अच्छी साबित हुई है और इससे प्रदूषण का स्तर थोड़ा कम हुआ है लेकिन एयर प्यूरीफायर की मांग में संभावित उछाल को सीमित करने के लिए काफी है। ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि भारत में ऐसे उत्पादों के लिए बाजार बहुत छोटा है। साल भी वायु प्रदूषण का स्तर ऊंचा रहता है लेकिन एयर प्यूरीफायर की बिक्री सर्दियों में बढ़ती है जब प्रदूषण का स्तर कुछ दिनों के लिए खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। ऐसी कैटेगरीज के कंज्यूमर गुड्स पर खर्च का फैसला काफी संवेदनशील होता है। सर्दियों में अगर कुछ दिनों के लिए हवा की गुणवत्ता बेहतर हो जाती है तो एयर प्यूरीफायर खरीदने का खर्च टाल दिया जाता है।
एक आम धारणा है कि अच्छा मानसून इसलिए अहम है क्योंकि भारत में खेती का बड़ा हिस्सा सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर है और सिंचाई की सुविधाएं बहुत कम किसानों को उपलब्ध है। यह सच है कि किसानों की इनकम और जीवन की गुणवत्ता काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। लेकिन मानसून के साथ इकोनॉमी का जुड़ाव यहीं खत्म नहीं होता है। अच्छा बारिश कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय बढ़ाती है और इससे ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ती है। कंसट्रक्शन में काम आने वाले मैटेरियल्स, एफएमसीजी उत्पाद, ट्रैक्टर, कार, टू व्हीलर्स और सोने चांदी की बिक्री में उछाल आता है। अगर अच्छा मानसून मांग को बढ़ाता है तो खराब मानसून मांग को सीमित करता है। किसी भी तरह से देखें तो मानसून गैर कृषि इकोनॉमी पर बड़ा असर डालता है।
इकोनॉमिक सर्वे का अनुमान है कि जब किसी साल बारिश का स्तर औसत से 100 मिलीमीटर कम रहता है तो खरीफ सीजन में किसानों की इनकम 15 फीसदी और रबी सीजन में 7 फीसदी तक कम हो जाती है। खराब बारिश फसलों के उत्पादन को कम करती है और इसकी वजह से खाने पीने की चीजों की कीमतें बढ़ती हैं। जलाशय में पानी कम हो जाता है, बिजली कटौती आम हो जाती है,जिससे फैक्ट्री प्रोडक्शन शेड्यूल पर असर पड़ता है। इसके अलावा जैसा मेरे फ्रेंड ने बताया, सर्दी और गर्मी में बारिश शहरी आबादी के खर्च के फैसलों को भी प्रभावित करती है।
एक अच्छा मानसून इकोनॉमी में उसी तरह से काम करता है जैसा टैक्स में कटौती या मांग बढ़ाने के लिए दिया गया प्रोत्साहन पैकेज करेगा। वहीं दूसरी तरफ, कमजोर मानसून महंगाई बढ़ाता हैं। क्योंकि इसकी वजह से कृषि जिंसों की कमी हो जाती है और साथ ही इनकम कम होने से मांग घटती है। इसीलिए भले ही कृषि का जीडीपी में योगदान लगातार कम हो रहा है लेकिन रेटिंग एजेंसियां मानसून अच्छा रहेगा या कमजोर रहेगा के आधार पर ग्रोथ के अनुमान को डाउनग्रेड या अपग्रेड करती हैं। इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर की सेल्स टीम और बैंक में कर्ज की वसूली करने ही नहीं बल्कि टैक्समैन और बजट बनाने वाले भारतीय मौसम विभाग के आधिकारिक मौसम पूर्वानुमान निजी क्षेत्र के मौसम पूर्वानुमान, जैसे स्काईमेट वेदर को ट्रैक करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक में मैक्रोइकोनॉमिस्ट भी ऐसा ही करते हैं।
भारत अब खाद्यान का आयात नहीं करना पड़ता। आजादी के बाद अगले कई कई दशकों तक हम आयात पर निर्भर थे लेकिन हरित क्रांति के बाद देश को खाद्य सुरक्षा हासिल करने में मदद मिली है। इकोनॉमी के मोर्चे पर भी तेजी से तरक्की हुई है। खास कर 1990 के बाद। इकोनॉमी का आकार, संरचना और चरित्र बदल गया है। लेकिन बारिश कम होने से सूखा अब भी पड़ता है और इससे किसानों की मदद के लिए सरकार का बिल और किसी कृषि उत्पाद के आयात का बिल बढ़ जाता है। राजकोषीय घाटा भी बढ़ता है। जीडीपी का एक चौथाई से कम हिस्सा कृषि से आता है लेकिन बारिश नीति बनाने में और बजट के गणित में अहम भूमिका निभाती है। मानसून अब भी काफी हद तक यह तय करता है कि वित्त मंत्री एक वित्त वर्ष में क्या कर सकता है या क्या नहीं कर सकता है। जैसा मानसून गांव में किसान के लिए या एक कॉरपोरेट सीईओ के लिए करता है। बारिश अब भी भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियों को प्रभावित करती है।
यह कोई रहस्य नहीं है कि मानसून भारत की कला, साहित्य और संगीत को हमेशा से प्रभावित करता रहा है। हालांकि यह बात साफ नहीं है कि इकोनॉमी अब भी प्राकृतिक और नमी वाली हवाओं पर कितना निर्भर है। आर्थिक मजबूती सुनिश्चित करने में बारिश की अहमियत ने जलवायु परिवर्तन की चुनौती को और गंभीर बना दिया है। इसीलिए आज के समय में भी सदियों पुराने रस्मो रिवाज जीवित हैं। राज्य सरकारों के विभाग मंदिरों को आधिकारिक निर्देश जारी करते हैं कि बारिश के भगवान को प्रसन्न करने के लिए प्रचलित रस्मो रिवाज पर अमल किया जाए। बारिश के देवता को जागृत करने के लिए मेढ़क या गधे के जोड़े की शादी कराई जाती है और यह आम बात है।
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ये लेख पहली बार जनवरी 04, 2022 को पब्लिश हुआ.
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