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अपना अटेंशन एलोकेशन फ़िक्स करें

बहुत थोड़े के लिए बहुत ज़्यादा चिंता, शायद ही आपकी ज़िंदगी में कोई बदलाव लाए

अपना अटेंशन एलोकेशन फ़िक्स करें

'Mutual Fund Insight ' के अक्टूबर 2022 के अंक के लिए हमारे पास एक बेहतरीन स्टोरी है, जिसका शीर्षक है - Great and Useful. अक्सर जिस एसेट एलोकेशन को फ़ाइनांस पर सलाह देने वाले दुरूह कर देते हैं, ये लेख उसे समझना आसान कर देगा। एसेट एलोकेशन और एसेट रीबैलेंस करना बेहद ज़रूरी तो है, पर ऐसा करना बहुत मुश्किल होगा तो आप इससे दूर रहना ही पसंद करेंगे। और ये एक सच्चाई है।
हालांकि, इस पेज पर मैं जिस विषय पर बात करूंगा वो है: अटेंशन एलोकेशन (attention allocation). म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट मैग्ज़ीन का पाठक होने के नाते, आपको एसेट एलोकेशन तो पता ही होगा, मगर ‘अटेंशन एलोकेशन’ शायद आपके लिए नया हो। मैं इसे और खुल कर बताता हूं। एसेट एलोकेशन धन का वो अनुपात है, जो आपने अलग-अलग तरह के निवेश में लगाया है, जैसे - स्टॉक, फ़िक्स्ड डिपॉज़िट, गोल्ड, रियल एस्टेट, प्रॉविडेंट फ़ंड, आदि, और अटेंशन-एलोकेशन उन विचारों या चिंताओं का अनुपात है जो आप इनमें से हर निवेश के लिए करते हैं। जहां तक मैंने देखा है, ज़्यादातर भारतीयों का इक्विटी (इसमें स्टॉक्स और इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड शामिल हैं) में एसेट एलोकेशन कहीं कम होता है, पर उसे लेकर अटेंशन एलोकेशन कहीं ज़्यादा।
मेरे एक पुराने जानने वाले सज्जन कुछ साल में रिटायर होने वाले हैं और वो मेरे पास सलाह के लिए आए। उनका पूरा फ़ोकस अपने इक्विटी फ़ंड निवेश के सही चुनाव करने और उसे बेहतर बनाने पर था। और फिर, जब मैंने उनसे गहराई से सवाल पूछने शुरू किए तो पता चला कि उनके इन्वेस्टमेंट पोर्टफ़ोलियो का तीन-चौथाई, जो एक करोड़ रुपए से ज़्यादा था, फ़िक्स्ड इनकम में लगा था और प्रॉविडेंट फ़ंड के साथ-साथ दूसरे कई फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में बंटा हुआ था। और ये तब था, जब उनके कई अपार्टेमेंट्स के निवेश को नज़रअंदाज़ करते हुए, मैंने केवल उनके फ़ाइनेंशियल एसेट ही गिनने शुरू किए थे। अपने इक्विटी निवेश को बेहतर करने के लिए वो जो कुछ करते, उससे कोई बड़ी रक़म नहीं बन रही थी। वो चाहते, तो सबसे अच्छे फ़ंड्स से सबसे ख़राब फ़ंड्स में स्विच कर जाते (या इसका उलटा करते) मगर फिर भी इसका उनकी नेट-वर्थ पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला था।
आप सोच रहे होंगे कि ये उदाहरण अतिरेक पूर्ण है। पर मेरा अनुभव ऐसा नहीं है। चाहे कितना भी इक्विटी एक्सपोज़र हो, ज़्यादातर भारतीय यही कर रहे हैं। क्या आप भी?
ये बात कुछ हद तक, समझी जा सकती है। इक्विटी इन्वेस्टिंग में एक्टिविटी ज़्यादा होती है। इस रवैये की बुनियादी वजह है जानकारियों की लगातार आने वाली बाढ़, और लिक्विडिटी का हमेशा बने रहना। किसी भी सुबह - थ्योरी में - कोई जानकारी मिल सकती है, जो आपको अपना स्टॉक या म्यूचुअल फ़ंड होल्डिंग बेचने के लिए प्रेरित कर सकती है। और ये प्रेरणा जितनी तेज़ी से आपको मिलती है, बहुत संभव है, आप अपना पैसा किसी और तथाकथित बेहतर फ़ंड में उतनी ही तेज़ी से स्विच कर जाएंगे।
ज़ाहिर है, इस तरह की अति-संवेदनशीलता का स्तर, रियल-एस्टेट या फ़िक्स डिपॉज़िट में हासिल करना दूर-दूर तक संभव नहीं होगा। उनमें न सिर्फ़ असल एक्टिविटी, बल्कि जानकारी का फ़्लो भी इक्विटी के मुक़ाबले बहुत ही कम है। हालांकि, ऐसा सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि ऐसा किया जा सकता है। मगर इसका ये मतलब नहीं कि ये तर्कसंगत हो, ख़ासतौर पर जब ये आपकी नेट वर्थ में कोई बड़ा असर नहीं डाल रहा हो।
असल में, हममें से ज़्यादातर लोगों को एसेट और अटेंशन के इस असंतुलन को लेकर जो करना चाहिए, वो है, गंभीरता से एसेट एलोकेशन को जांचना-परखना, न कि ये मान लेना कि अटेंशन का स्तर फ़िक्स किए जाने की ज़रूरत है। हमारे देश में ज़्यादातर लोगों का इक्विटी में बहुत कम निवेश है। हालांकि, हम सब जानते हैं कि लंबे समय के दौरान, इक्विटी इन्वेसस्टिंग मंहगाई के ख़िलाफ़ एक असरदार हथियार है और अर्थव्यवस्था की ग्रोथ में भागीदारी का सबसे आसान तरीक़ा भी।
मगर, दिक़्क़त है कि इक्विटी को आपकी ज़िंदगी में मायने रखने वाला फ़र्क़ पैदा करना है, तो उसे एक अच्छी रक़म होना होगा। इक्विटी इन्वेस्टमेंट को मैनेज करने में काम ज़्यादा होता है, मगर आपका निवेश किया पैसा सिलसिलेवार तरीक़े से नहीं बढ़ता है, ख़ासतौर पर फ़ंड्स में। इसका मतलब है कि अपने निवेश के लिए दो या तीन अच्छे फ़ंड्स की पहचान कर लेते तो कम से कम इक्विटी में इतनी रक़म रखिए कि ये आपकी जिंदगी में कोई फर्क पैदा कर सके, अगर ऐसा नहीं है तो आपकी सारी कोशिश बेकार ही होगी।
ये एडिटोरियल अक्टूबर 2022 के अंक में म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट में छपा था। इस कवर स्टोरी को पढ़ने के लिए और अनालेसिस, कॉलम और लेखों को बेहतर तरीक़े से समझने के लिए सबस्क्राइब करें।

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