
बर्नी मैडॉफ़ की धोखाधड़ी को एक अर्सा बीत चुका है, और अब तो मैडॉफ़ की मौत को भी साल भर से ज़्यादा हो चले हैं। अब ये सर्वमान्य और सर्व-स्वीकार्य है कि मैडॉफ़ इतिहास की सबसे बड़ी चार-सौ-बीसी का कर्ता-धर्ता था। दिसंबर 2008 में जब इसका पर्दाफ़ाश हुआ, तब इस धोखाधड़ी की क़ीमत 61 बिलियन यूएस डॉलर आंकी गई। और हां, जिन्होंने विस्तार से ये कहानी पढ़ी है-या नेटफ़्लिक्स की नई सीरीज़ ‘The Monster of Wall Street’ देखी है-वो जानते हैं कि मैडॉफ़ के रैकेट का शक़ काफ़ी पहले से था और काफ़ी पहले ही उसका पता भी लगा लिया गया था।
ये बात 1999 जितनी पुरानी है, जब फ़ाइनेंशियल फ़्रॉड के एक इन्वेस्टीगेटर, हैरी मार्कोपोलोस ने अपनी गणना से साबित किया था कि मैडॉफ़ जिस रिटर्न को कमाने का दावा करता है, वैसा कर पाना असंभव है। मार्कोपोलोस ने इसकी शिकायत SEC से भी की, पर किसी ने उनकी नहीं सुनी। बाद में मार्कोपोलोस ने इसी विषय पर एक क़िताब लिखी जिसका शीर्षक था ‘No One Would Listen’. कुछ लोग इसे बड़ा रहस्य समझते हैं, मगर कुछ और लोगों के लिए इसमें कुछ भी रहस्यमयी नहीं। क्योंकि जो सुनना नहीं चाहते--वो सुना नहीं करते। मैडॉफ़ एक स्टार हुआ करता था; उसने कई चैरिटी में बड़े-बड़े डोनेशन बांटे, उसके दोस्तों में ऐसे लोग शुमार थे जो नियम बनाने वाली संस्थाओं के शीर्ष पर बैठते थे, और हां, वो NASDAQ का चेयरमैन रह चुका था-मैडॉफ़, फ़ाइनेंस की दुनिया का एक बड़ा और मज़बूत स्तंभ माना जाता था।
नेटफ़्लिक्स की सीरीज़- जो देखने लायक़ है- उन मनोवैज्ञानिक कारणों की तलाश करती है जिनके चलते उसने अपना स्कैम शुरु किया। असल में, उसकी शुरुआत अपने क्लायंट्स का पैसा ईमानदारी से और अच्छे तरीक़े से मैनेज करने से हुई। ये शुरुआत अच्छी भी रही, और फिर, किसी एक समय पर-जो 1970 का शुरुआती दौर हो सकता है-उसे कुछ घाटा हुआ। अपनी हार स्वीकार करना उसके लिए बड़ा मुश्किल काम था, इसलिए उसने चुपचाप अपने निजी पैसों से घाटे की वजह से हुए नुक़सान की भरपाई कर दी। यही वो मोड़ था-जिसके बाद दूसरों से बहुत बेहतर दिखने की अपनी लालसा के जाल से वो कभी बाहर नहीं निकल पाया। जल्द ही, मैडॉफ़ एक ख़ालिस चार-सौ-बीसी की स्कीम का सर्वेसर्वा था। जिसके तहत न सिर्फ़ उसने ट्रेड किया बल्कि अपने क्लायंट्स के फ़ंड्स से लोगों में पैसे भी बांटे।
कोई भी धोखाधड़ी वाली स्कीम अपनी शुरुआत से अंत तक, पटरी पर दौड़ती एक बेक़ाबू ट्रेन होती है। जिसकी दौड़ का ख़ात्मा पटरी से उतरने के साथ होता है। ये पटरी से उतरना, तभी होता है जब मार्केट में कोई बड़ी गिरावट आती है, और इसलिए बहुत से लोग एक साथ अपने पैसे मांगने लगते हैं। मगर इस मांग को पूरा करने के लिए पैसे नहीं होते। इसी के चलते आख़िरकार मैडॉफ़ को अपना अपराध स्वीकार करना ही पड़ा। क्योंकि दिसंबर 2008 में, जब ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस लंबा चल गया, तब उसके पास पैसे निकालने की इतनी मांग आईं कि उसके पास अपराध स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं बचा था। हालांकि, रामलिंगा राजू का स्कैम इससे कुछ अलग था, मगर राजू को भी ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस के चलते ही अपना अपराध स्वीकार करना पड़ा था।
चार-सौ-बीसी की स्कीमों का एक पैटर्न होता है। जो लोग धोखाधड़ी करते हैं वो भी एक पैटर्न फ़ॉलो करते हैं। मैडॉफ़-जैसी ही एक ताज़ा मिसाल है भूतपूर्व क्रिप्टो के बादशाह सैम बैंकमैन-फ़्रीड की। उसने भी ऐसी ही स्कीम से शुरुआत की थी, जो इतिहास की सबसे महान स्कीम होने जा रही थी। पर जब क्रिप्टो मार्केट क्रैश करने लगे तो उसने कस्टमरों के फ़ंड में सेंध लगा दी, और अपनी सहयोगी ट्रेडिंग कंपनी में फ़ंड ट्रांसफ़र कर लिए, जो बड़े नुकसान में रही। और हां, क्योंकि क्रिप्टो में सब कुछ हाइपर-स्पीड पर होता है, बैंकमैन-फ़्रीड ने बड़ी तेज़ी से, क्रिप्टो-किंग से, स्कैम की पोल खुलने का सफ़र कुछ ही महीनों में पूरा कर लिया।
इनमें कुछ और भी समानताएं आपको देखने को मिल जाएंगी। बैंकमैन-फ़्रीड एक जीनियस समझा जाता था। वो राजनीतिज्ञों और दूसरे कई तरह के लोगों को बड़े-बड़े दान दिया करता, जिसमें मीडिया भी शुमार थी। यहां तक तो उसने अपना खेल मैडॉफ़ से बेहतर खेला, और ये बात FTX के पतन की शुरुआत में ही साफ़ हो गई थी। मैडॉफ़ कांड के आधार पर, आप ये मान सकते हैं कि कोई अगर दस बिलियन डॉलर से बड़ी धोखाधड़ी की स्कीम चला रहा है, तो उसे सभी की लानतों का शिकार होना पड़ेगा और उसके बचाव में कोई नहीं आएगा। मगर जो सैम बैंकमैन-फ़्रीड के साथ असल में हुआ वो काफ़ी अलग था। यूएस के पारंपरिक मीडिया में कई ऐसे लेख लिखे गए जिन्होंने इस आदमी के किए नुकसान को छोटा करके दिखाने की कोशिश की, और, असल में, बजाए सीधे-सीधे चोरी कहने के उसके कुकृत्यों को ग़लती या ग़लत फ़ैसलों की तरह पेश किया। कई लेख तो इस बात का भी शोर मचा रहे थे कि उसके तमाम डोनेशन, किस तरह साइंस रिसर्च में मदद कर रहे थे, और अब वो सब थम जाएगा। “FTX के पतन के पहले, फ़ाउंडरों ने पैनडेमिक की रोकथाम के लिए कई मिलियन बहाए। इनमें से ज़्यादातर का काम अब अचानक रुक गया है,” ये हिंदी अनुवाद है एक प्रभावशाली अमेरिकी अख़बार की असल हेडलाइन का।
ध्यान देने वाली बात है कि मैडॉफ़ और बैंकमैन-फ़्रीड ये कर पाए, क्योंकि असल कामकाज को कोई रेग्युलेट करने वाला नहीं था (क्रिप्टो के मामले में) या फिर ऐसा, रेग्युलेशन की कमी से हुआ (मैडॉफ़ के मामले में)। दूसरों के पैसे से काम करना दुनिया का सबसे बड़ा लालच पैदा करने वाला काम है; बहुत ज़्यादा कंप्लायंस और ऑडिटिंग का होना, उनके कम होने से कहीं बेहतर है।






