
क़रीब दो हफ़्तों से, डेट फ़ंड टैक्स को लेकर काफ़ी गहमागहमी है. साथ ही, स्मॉल सेविंग स्कीम की ब्याज दरें भी 0.7 प्रतिशत बढ़ गई हैं. जैसा की होता ही है, छोटी बचत योजनाओं की लीडर है सीनियर सिटिज़न सेविंग स्कीम (SCSS), जो अब 8.2 प्रतिशत सालाना का चक्रवृद्धि ब्याज देगी. इन स्कीमों में सरकार द्वादार दिए जाने वाले ब्याज में जो बढ़ोतरी से, और डेट फ़ंड्स के टैक्स का रेट बढ़ने से कई निवेशकों के लिए फ़िक्स्ड इनकम में की बचत के मायने काफ़ी हद तक बदल गए हैं.
कहा जा रहा है कि डेट फ़ंड से मिलने वाले रिटर्न की कमाई पर टैक्स बढ़ जाएगा, पर ये बात हर किसी के लिए सच नहीं है. तकनीकी तौर पर देखेंगें, तो आपको पता चलेगा कि तीन साल से ज़्यादा इन निवेशों को बनाए रखने पर इनके मुनाफ़े पर कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं लगेगा, बल्कि मुनाफ़ा निवेशक की आमदनी में जुड़ भर जाएगा. पहले, इस निवेश पर इंडेक्सेशन के बाद 20 प्रतिशत टैक्स लगता था. अब, इस पर आमदनी के हिसाब से जो टैक्स रेट होगा, उसी मुताबिक़ टैक्स लगाया जाएगा.
ध्यान देने वाली बात है कि कई लोगों के लिए, इसका मायने होगा कि उनका टैक्स कम हो जाएगा. कितने लोगों पर ये बढ़ेगा या कितने लोगों के लिए ये घटेगा ये तो मैं नहीं बता सकता, हालांकि आमतौर पर, टैक्स स्लैब पिरामिड की तरह होते हैं. और ये ज़्यादा गहरा नहीं है. यानी ऐसे लोग जो कम टैक्स देने वालों में आते हैं, वो ऊंचा टैक्स देने वालों से कहीं ज़्यादा हैं. अब सवाल है कि कम टैक्स देने वालों पर इसका कितना असर होगा? आइए ₹10 लाख के निवेश की एक मिसाल लेते हैं, ऐसा निवेश जिसमें पिछले तीन साल में, 7.5 प्रतिशत सालाना का मुनाफ़ा हुआ है. यानी पिछले तीन साल में, इससे ₹2.42 लाख का मुनाफ़ा इकट्ठा हुआ होगा. चाहे आपकी आमदनी कुछ भी हो, पर इंडेक्सेशन के साथ 20 प्रतिशत के रेट पर का मतलब होगा ₹19,394 का टैक्स.
नई स्कीम के तहत, जो लोग ज़ीरो टैक्स ब्रैकेट में हैं, ज़ाहिर है वो कुछ भी नहीं अदा करेंगे, और उनके लिए डेट फ़ंड एक तरह से टैक्स-फ़्री हो जाएंगे. जो लोग 5 प्रतिशत टैक्स के ब्रैकेट में हैं, उनका टैक्स कम हो कर ₹12,100 हो जाएगा. यहां तक कि जो लोग 10 प्रतिशत के टैक्स दायरे में हैं, उनके टैक्स में मामूली इज़ाफ़ा होगा जो ₹5,000 सालाना का होगा. ये महत्वपूर्ण है, ख़ासतौर पर बहुत से ऐसे सीनियर सिटिज़न के लिए जो ऊंची कमाई वाले परिवारों से तो हैं, मगर कम टैक्स ब्रैकेट में हैं; सीनियर औऱ जूनियर सदस्यों के निवेश इस लिहाज़ से काफ़ी सतर्कता से मैनेज हुए हैं. पहले, हर कोई एक ही रेट पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गैन टैक्स देता था. अब, कम-से-कम कुछ लोगों के लिए टैक्स को कम करना संभव हो पाया है.
सैद्धांतिक तौर पर SCSS और डेट फ़ंड की तुलना सीधी-सीधी लगती है. मगर सब कुछ समझने के बाद, SCSS के रिटर्न क़रीब-क़रीब इतने ही हैं, शायद म्यूचुअल फ़ंड्स से 0.6-0.8 प्रतिशत ज़्यादा हों. हालांकि, टैक्स के पैटर्न (रेट नहीं) का फ़र्क़ म्यूचुअल फ़ंड के पक्ष में होगा. सभी डिपॉज़िट्स में, ब्याज की दरें हर साल आपकी आमदनी में जोड़ी जाएंगी, जबकि फ़ंड्स में, ये निवेश से बाहर निकलने तक इकट्ठा होती रहेगी.
फिर भी, सच तो ये है कि इन सभी बदलावों के बावजूद, आपको अपनी लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटजी नहीं बदलनी चाहिए. म्यूचुअल फ़ंड्स में कई फ़ायदे होते हैं जैसे लिक्विडिटी, टैक्स का बाद में लगना, और एक्टिव मैनेजमेंट. एक सीनियर सिटिज़न के लिए, सलाह होगी कि पहले वो SCSS की गारंटी वाली रेग्युलर इनकम की सीमा का पूरी तरह इस्तेमाल कर लें, और फिर शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड्स में इमर्जेंसी और लिक्विडिटी के साथ पोर्टफ़ोलियो री-बैलेंस करने के लिए कुछ फ़ंड एलोकेट करें.
जहां स्मॉल सेविंग स्कीम और डेट म्यूचुअल फ़ंड में हुए बदलावों ने काफ़ी ध्यान आकर्षित किया है, वहीं इनकी वजह से निवेश की स्ट्रैटजी में किसी बदलाव की ज़रूरत नज़र नहीं आती. टैक्स से रिटर्न, लिक्विडिटी, सुरक्षा और निवेश की दूसरी बुनियादी बातों में कोई फ़र्क़ नहीं आया है. इसका रोल सेकेंड्री है. इसके बजाए, हमेशा की तरह, फ़ोकस, लंबे-समय के निवेश के सिद्धांतों पर होना चाहिए और इस बात पर कि आपके फ़ाइनेंशियल गोल हासिल करने के लिए एक डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो हो.