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सारांशः निवेशकों की सबसे बड़ी ग़लती ये मानना है कि कुछ लोग शेयर की दिशा पहले से जानते हैं और वही असली राज़ है. ‘टिप’ और ‘ऑपरेटर’ मॉडल इसी सोच पर टिके हैं, जबकि असली रास्ता कंपनियों की कमाई और भविष्य को समझने में है, न कि अफ़वाहों में.
निवेश की दुनिया में एक चुटकुला बहुत मशहूर है. वैल्यू इन्वेस्टिंग के जनक बेंजामिन ग्राहम अक्सर ये कहानी अपने छात्रों को सुनाते थे और स्टॉक मार्केट के सट्टेबाज़ों के व्यवहार से इसकी तुलना करते थे.
तो हुआ यूं कि एक तेल खोजने वाला इंसान मर जाता है और स्वर्ग चला जाता है. दरवाज़े पर सेंट पीटर उसकी जीवन-गाथा पढ़ते हैं और कहते हैं कि वो स्वर्ग में आने के लायक़ है, लेकिन एक समस्या है. “देखो, वहां जो भीड़ है? वे सब तेल खोजने वाले लोग हैं जो तुमसे पहले यहां आ चुके हैं. और यहां काम ऐसे चलता है कि तुम तब तक अंदर नहीं जा सकते जब तक वे सब नहीं चले जाते. तो मुझे डर है कि तुम्हें बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा.”
“कोई समस्या नहीं”, वो व्यक्ति जवाब देता है, “मुझे पता है उन्हें कैसे भगाया जा सकता है.” फिर वो उस भीड़ की ओर मुड़कर चिल्लाता है, “अरे सुना क्या? नर्क में तेल निकल आया है.” और जैसे ही उन्होंने ये सुना, वहां मौजूद हर एक आदमी नर्क की ओर दौड़ पड़ा. ये देखकर सेंट पीटर ने अनमने मन से कहा, “ठीक है, लगता है अब तुम्हारा रास्ता साफ़ है. तुम स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हो.” लेकिन उस तेल खोजने वाले को भी शक होने लगा. “जानते हो क्या? मैं भी उन्हीं के पीछे जाता हूं. अफ़वाह सही भी हो सकती है.”
जैसा कि ग्राहम बताया करते थे, उस तेल खोजने वाले का व्यवहार आजकल निवेश रिसर्च के तौर-तरीक़ों से काफ़ी मेल खाता है. जटिल विश्लेषक कहेंगे कि उनका मानसिक ढांचा ये मानता है कि अगर बहुत सारे लोग किसी बात को सच मानते हैं, तो वो सच ही होगी. किसी चीज़ का मानसिक ढांचा असल में हमारी वो समझ है कि भीतर से वो चीज़ कैसे काम करती है.
एक ग़लत मानसिक ढांचा समस्या बन सकता है. मिसाल के तौर पर, ईमेल के शुरुआती दिनों में, मेरा एक दोस्त मानता था कि अगर आप ईमेल का फ़ॉन्ट छोटा कर दें, तो संदेश का आकार छोटा हो जाएगा और उसे भेजना आसान हो जाएगा. ये एक ग़लत मानसिक ढांचा था, या यूं कहें कि फ़ैक्स वाले मानसिक ढांचे को ईमेल पर लागू कर दिया गया था.
मेरा मानना है कि बहुत से लोगों को शेयर बाज़ार में निवेश करने में जो मुश्किलें आती हैं, उसकी एक बुनियादी वजह ये है कि उनके पास इस बारे में बेहद ग़लत मानसिक ढांचा है कि किसी शेयर की क़ीमत को क्या तय करता है. शेयर बाज़ार कैसे काम करता है, इसके कई मानसिक ढांचे हैं, लेकिन कुछ दूसरों से ज़्यादा आम हैं. यहां सबसे आम है: “कुछ लोग जानते हैं कि कब किसी शेयर की क़ीमत बढ़ने वाली है. अगर उनमें से कोई मुझे बता दे, तो मैं पैसा कमा सकता हूं.”
ये है शेयर बाज़ार का ‘टिप’ मॉडल. यह मानसिक ढांचा कम और मानसिक ढांचे की कमी ज़्यादा है. दुर्भाग्य से, ये बहुत आम है. बहुत से लोग मानते हैं कि कहीं न कहीं कोई ऐसा है जिसे पता है कि चीज़ें किस दिशा में जाएंगी और सबकुछ इस बात पर निर्भर है कि किसी तरह ये राज़ हमें भी पता चल जाए.
‘टिप’ मॉडल से थोड़ा व्यापक है ‘ऑपरेटर’ मॉडल. इस मॉडल में लोग मानते हैं कि कुछ लोग (“ऑपरेटर”) शेयरों में हेरफेर करते हैं और ज़रूरत सिर्फ़ ये है कि ऑपरेटर क्या कर रहे हैं, ये पता लगा लिया जाए और किसी तरह, शेयर में सवार हो लिया जाए जब तक ऑपरेटर उसे ऊपर धकेल रहे हैं. ये मॉडल हक़ीक़त से काफ़ी मेल खाता है. बड़े और भारी-भरकम शेयरों के बाहर, बहुत से शेयरों में अक्सर तथाकथित ‘ऑपरेटरों’ द्वारा हेरफेर की जाती है, कम-से-कम शॉर्ट-टर्म में तो ज़रूर.
हालांकि, ये मॉडल सिर्फ़ ऑपरेटरों के लिए ही उपयोगी है. कामयाब होने के लिए ऑपरेटरों को और-और बड़े मूर्ख चाहिए होते हैं जो उस शेयर को ख़रीदें जिसमें वे खेल कर रहे हैं. सीधी बात है, अगर आप ख़ुद ऑपरेटर नहीं हैं, तो आपके लिए ये काफ़ी ख़तरे की बात है कि आप अपना पैसा ऑपरेटर को सौंप देंगे. बेशक़, एक और मॉडल भी है. ये इस पर आधारित है कि कंपनियां कितना कमा रही हैं और भविष्य में कितना कमाएंगी, वे कैसे प्रतिस्पर्धा करेंगी और ऐसी ही दूसरी बातें. लेकिन बाक़ी दो मॉडलों की तुलना में, इस पर विश्वास करने वाले बहुत कम हैं, तो लगता है ये इतना महत्वपूर्ण नहीं होगा.






