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इतिहास की सबसे पुरानी बाधा

तेल की हर किल्लत उस समय स्थायी लगती है, लेकिन उनमें से कोई भी स्थायी नहीं रही है

तेल की हर किल्लत उस समय स्थायी लगती है, लेकिन उनमें से कोई भी स्थायी नहीं रही हैAditya Roy/AI-Generated Image

अगर कोई व्यक्ति इस कॉलम को नियमित रूप से पढ़ता रहा है, तो वह पहले से जानता होगा कि आगे क्या कहा जाने वाला है. पहले भी कई बार लिखा गया है कि ख़बरें निवेश पोर्टफ़ोलियो की दोस्त नहीं होतीं. किसी भी नाटकीय घटना पर बाज़ार की पहली प्रतिक्रिया शायद ही कभी सही होती है. जो लॉन्ग-टर्म निवेशक टीवी पर चल रहे शोर के बीच शांत बैठा रहता है, वही अक्सर सही साबित होता है. ये बात बार-बार कही गई है. और एक बार फिर वही बात दोहराई जा रही है.

भारतीय परिवारों के लिए इस समय किसी शेयर इंडेक्स से भी ज़्यादा अहम एक सीधी समस्या है: कुकिंग गैस की कमी उभरती दिखाई दे रही है और आगे चलकर और भी कमी आ सकती है. इसलिए सामान्य तर्क देने से पहले एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है. जो बाधा सामने आ रही है, वह असली है. यह कोई कल्पना नहीं है. लोगों को कमी का सामना करना पड़ेगा. आम परिवारों के लिए कुछ महीनों तक सचमुच कठिन समय रह सकता है. इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करने की सलाह नहीं दी जा रही है.

लेकिन अगर पिछले 50 वर्षों के तेल के झटकों को ध्यान से देखा जाए, तो उनसे एक अहम सबक मिलता है. अक्तूबर 1973 में अरब-इज़राइल युद्ध के दौरान अरब तेल उत्पादकों ने तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था. कुछ ही महीनों में तेल की क़ीमतें चार गुना तक बढ़ गईं. 1979 में ईरानी क्रांति ने सप्लाई को झटका दिया और एक नया ऑयल शॉक पैदा हुआ, जिसे बाद में ईरान-इराक युद्ध ने और बढ़ाया. 1990 में खाड़ी युद्ध के दौरान इराक द्वारा कुवैत पर हमले से तेल की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं और दुनिया भर के ऊर्जा बाज़ारों में लंबे समय तक अस्थिरता की भविष्यवाणियां होने लगीं. 2008 में तेल की क़ीमत कुछ समय के लिए $147 प्रति बैरल तक पहुंच गई थी और कई टिप्पणीकारों ने कहा कि सस्ती ऊर्जा का दौर हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है.

ऐसे हर दौर में सिर्फ़ बाज़ार में उतार-चढ़ाव नहीं हुआ, बल्कि असली कठिनाइयां भी सामने आईं. हर बार अख़बारों और चैनलों में यह कहा गया कि दुनिया हमेशा के लिए बदल गई है. लेकिन अंत में हर संकट को तकनीकी बदलाव, नई सप्लाई के स्रोत, मांग में बदलाव और वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनुकूलन क्षमता ने धीरे-धीरे संभाल लिया. स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को दुनिया का सबसे ख़तरनाक समुद्री रास्ता उस समय से कहा जा रहा है जब ज़्यादातर रिटेल निवेशकों का जन्म भी नहीं हुआ था. और संभव है कि इस संकट के हल निकल जाने के बाद भी उसे लंबे समय तक इसी तरह देखा जाता रहे.

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इसका मतलब यह नहीं है कि मौजूदा स्थिति को हल्के में लिया जाए. इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि चीज़ों को संतुलित नज़र से देखा जाए. 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान घबराकर जिसने इक्विटी बेच दी और “हालात शांत होने” का इंतज़ार करता रहा, उसने उस दशक के सबसे बड़े बुल मार्केट में हिस्सा ही नहीं लिया. 2008 में जब तेल $147 तक पहुंचा और जिसने बाज़ार से दूरी बना ली, उसे यह पता नहीं था-और पता हो भी नहीं सकता था-कि सिर्फ़ छह महीनों में तेल $40 से भी नीचे आ जाएगा. बाज़ार किसी के सहज महसूस करने का इंतज़ार नहीं करते.

बार-बार “ख़बरों को नज़रअंदाज़ करने” की बात इसलिए दोहराई जाती है क्योंकि नाटकीय घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का लालच कभी ख़त्म नहीं होता. कुछ वर्ष पहले कोविड संकट के दौरान कुछ पाठकों ने लिखा कि “बुनियादी बातों पर टिके रहने” वाली सलाह बहुत बार दोहराई जा रही है. जवाब में कहा गया कि वे पूरी तरह ग़लत हैं-यह बात कोविड की वजह से नहीं कही जा रही थी, बल्कि पिछले 25 वर्षों से लगातार कही जा रही थी. वह साल 2020 था. अब 2026 है, और वही बात अब भी दोहराई जा रही है, और इसे बंद करने का कोई इरादा नहीं है. हमारे स्वभाव में धैर्य से यह समझना शामिल नहीं है कि आज जो चीज़ बहुत अहम लग रही है, वही 10 साल बाद शायद सिर्फ़ एक फुटनोट बनकर रह जाएगी. जो निवेशक दो दशकों तक इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड के साथ टिके रहे हैं, वे इस बात को गहराई से समझते हैं. जो निवेश की दुनिया में नए हैं, वे अब धीरे-धीरे इसे अनुभव करने वाले हैं.

भारतीय रिटेल निवेशक के लिए एक और पहलू समझना ज़रूरी है. भारत ने अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को संभालने में हमेशा व्यावहारिक नीति अपनाई है, जो कई लोगों को उलझन में डाल देती है. जब पश्चिमी देश रूस से तेल नहीं ख़रीद रहे थे, तब भारत ने रूसी तेल खरीदा. भारत ने एक-दूसरे के विरोध में खड़े कई वैश्विक गुटों के साथ भी कामकाजी संबंध बनाए रखे हैं. इसे अच्छा या बुरा कहने की ज़रूरत नहीं है-यह बस एक बड़े और जटिल अर्थव्यवस्था का तरीक़ा है, जो उलझी हुई दुनिया में रास्ता बनाती है. इसका एक मतलब यह भी है कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति को लेकर जो सबसे डरावने अनुमान लगाए जाते हैं, वे अक्सर सबसे कम सच होते हैं.

तो हां, कुछ समय के लिए बाधा ज़रूर आएगी. कुकिंग गैस महंगी होगी. महंगाई के आंकड़े कुछ महीनों तक ख़राब दिखेंगे. टीवी न्यूज़ पहले से भी ज़्यादा शोर और सनसनी से भरी लगेगी. लेकिन लॉन्ग-टर्म निवेश पोर्टफ़ोलियो का क्या करना चाहिए? उसे वैसे ही रहने देना चाहिए. इस पुरानी कहानी का अंत हमेशा एक जैसा होता है-और यह अंत पहले से ही मालूम है.

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