AI-generated image
कैश ही किंग है. और फिर भी, ग्रोथ की तलाश में अक्सर इसे शतरंज के प्यादे की तरह बलिदान कर दिया जाता है. मगर ये समझ में आती है. तेज़ी से बढ़ने की क़ीमत चुकानी ही पड़ती है. लेकिन जो बिज़नस स्थायी होते हैं वो पहचानते हैं कि कैश बहुत ज़रूरी आधार है, और कैश की कमी को दूर करने की ज़रूरत होती है. हैवेल्स इंडिया इस बात को दूसरी कंपनियों से बेहतर समझती है. इस कहानी में, हम उस वक़्त पर नज़र डालते हैं जब कंज़्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की दिग्गज कंपनी गंभीर कैश संकट से जूझ रही थी और कैसे उसने ख़ुद को इस संकट से बाहर निकाला, जैसा कि CEO अनिल गुप्ता राय ने अपनी किताब 'हैवेल्स: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ कीमत राय गुप्ता' में बताया है.
ये भी पढ़िए - Havells: हिट बिज़नस छोड़कर खेला बड़ा जुआ, आपके लिए क्या संदेश है?
ग्रोथ का मोह
90 के दशक के आख़िर और 2000 के दशक की शुरुआत में, हैवेल्स ने एग्रेसिव एक्पैनशन की होड़ में हिस्सा लिया. अलवर में उनकी फ़ैक्ट्री मामूली पांच एकड़ से बढ़कर 100 एकड़ तक फैल गई. अधिग्रहण करने का सिलसिला जारी रहा. लेकिन, ज़्यादातर निवेश आंतरिक स्रोत से और क़र्ज़ से किए गए. गुप्ता ने किताब में लिखा है, "चूंकि हम 2002-03 तक बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा नहीं कमा रहे थे, इसलिए हैवेल्स के खातों में हमेशा एक बड़ा क़र्ज़ बना रहा."
2005 तक कंपनी ने ₹166 करोड़ का नेट क़र्ज़ इकट्ठा कर लिया, जिसका डेट-टू-इक्विटी रेशियो दो गुने से ज़्यादा था, जबकि 1995-2005 के बीच इसका रिसीवेबल औसतन 82 दिनों के आसपास था. इस दशक में, इसका मुफ़्त कैश फ़्लो लगातार नेगेटिव रहा.
जैसे-जैसे कंपनी का कारोबार बढ़ा, उसने पूंजी के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश की और अपना इक्विटी बेस बनाने की कोशिश की. लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. लोकप्रियता के बावजूद, संभावित निवेशकों ने कंपनी का मूल्यांकन कम किया, और क़र्ज़ बढ़ता रहा.
इस बीच, शाह नामक एक विश्लेषक के एक तीखे सवाल ने उस समय कंपनी पर भारी असर डाला: "पैसे का रंग कहां है?" (where is the colour of money?) शाह का सवाल, जो हैवेल्स के दशक भर के नेगेटिव कैश फ़्लो और भारी-भरकम क़र्ज़ से फ़ंड की गई ग्रोथ से उपजा था, काफ़ी तीखा रहा. गुप्ता याद करते हैं, "विश्लेषक ने हमारी ओर से इसे पॉज़िटिव बनाने की कोई कोशिश नहीं देखी." ये एक चेतावनी थी जिसने कंपनी को अपनी वित्तीय रणनीति का दोबारा मूल्यांकन करने के लिए मजबूर कर दिया.
इनोवेटिव समाधान
बिज़नस के स्वभाव की वजह से कैश की कमी को ठीक करने की बात कहना जितनी आसान थी, करनी उतनी आसान नहीं थी. जबकि हैवेल्स को कच्चे माल के लिए आपूर्तिकर्ताओं को एडवांस पेमेंट करना था, इसके ख़रीदार - तार और केबल के डीलर - कुछ महीनों के अंतराल के साथ पेमेंट करने के लिए बढ़ी क्रेडिट अवधि की मांग करते थे. जब भी ख़रीदारों की ओर से कोई छोटी सी भी बाधा आती थी, तो कैश फ़्लो बिगड़ जाता था. गुप्ता लिखते हैं, "ये एक क्लासिक कैश का जाल था."
इसका समाधान HDFC बैंक के साथ एक अभूतपूर्व साझेदारी से आया. हैवेल्स ने एक अनूठी प्रणाली तैयार की, जिसके तहत बैंक अपने कच्चे माल के आपूर्तिकर्ताओं को तुरंत पेमेंट कर देगा. हैवेल्स 90 दिनों के भीतर HDFC को पेमेंट कर देगा. "HDFC बैंक को रिस्क से बचाने के लिए, हमने आपूर्तिकर्ताओं को पेमेंट की गई रक़म के लिए पोस्ट-डेटेड चेक दिए."
इस सिस्टम से हैवेल्स को अपने आपूर्तिकर्ताओं को वक़्त पर पेमेंट करने और उनके साथ मज़बूत संबंध बनाने में मदद मिली. गुप्ता कहते हैं, "पिछले एक दशक में किसी भी विक्रेता को पेमेंट में देरी से परेशनी नहीं हुई है."
इसके अलावा, अपने खरीदारों से पेमेंट में देरी को दूर करने के लिए, हैवेल्स ने तत्काल कैश के बदले में बैंक को अपने बिक्री चालान बेचे. भुगतान न होने के बजाए बीमित चालानों ने बैंकों को यक़ीन दिलाया और हैवेल्स को कैश फ़्लो को पॉज़िटिव बनाने और बैलेंस शीट से वर्किंग कैपिटल के क़र्ज़ को ख़त्म करने में मदद की. गुप्ता लिखते हैं, "इस इनोवेशन की वजह से हमारी बैलेंस शीट की ज़्यादातर परेशानियां हल हो गईं."
क़र्ज़ के दबाव से फ़्री होकर, हैवेल्स उस चीज़ पर ध्यान लगा सकता था जो सबसे ज़्यादा मायने रखती थी - वो थी ग्रोथ. फ़ानांशियल रि-वैल्यूएशन से एक अहम फ़ायदा यह हुआ कि इसने डीलरों को ज़्यादा उदार क़र्ज़ की शर्तें ऑफ़र करने की क्षमता हासिल की, जिससे क़र्ज़ की अवधि 45 दिनों से दोगुनी होकर 90 दिन हो गई, इस लचीलेपन ने हैवेल्स को डीलरों की पसंदीदा कंपनी के तौर पर स्थापित किया. गुप्ता कहते हैं, "पॉज़िटिव कैश फ़्लो ने हमें ज़्यादा कुशलता से ख़र्च करने और आपूर्तिकर्ताओं के साथ बेहतरीन संबंध बनाए रखने की इजाज़त दी."
निष्कर्ष
कैश फ़्लो की परेशानियों से वित्तीय लचीलेपन तक हैवेल्स की यात्रा बिज़नस में अनुकूलनशीलता और रणनीतिक इनोवेशन के महत्व की एक शक्तिशाली याद दिलाती है. वित्तीय चुनौतियों के अनुकूल होने से स्थिरता और लगातार ग्रोथ का वादा किया जाता है. हैवेल्स के मामले में, इसके इनोवेटिव नज़रिए ने बिज़नस दक्षता को जन्म दिया, जिसका परिणाम बेहतर ऑप्रेशन मैनेजमेंट में हुआ और इसने क़र्ज़ के संकटों के आगे झुके बिना ग्रोथ के मौक़ों को ज़ब्त करने की इजाज़त दी.
ये भी पढ़िए - कौन हैं Joel Tillinghast? पीटर लिंच भी हैं जिनकी निवेश स्ट्रैटजी के मुरीद
ये लेख पहली बार अक्तूबर 10, 2024 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
शिकायतों के लिए संपर्क करें: [email protected]






