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अगर आप म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने का प्लान कर रहे हैं, तो सिर्फ़ बड़े-बड़े रिटर्न के आंकड़ों पर ध्यान न दें. क्योंकि, असली समझदारी CAGR और एब्सोल्यूट रिटर्न को समझने में है. ये शब्द सुनने में थोड़े पेचीदा लग सकते हैं, लेकिन इन्हें समझना बेहद आसान है. ताकि, अगली बार जब कोई कहे, "इस फ़ंड ने 50% रिटर्न दिया," तो आप तुरंत पूछ सकें, "CAGR में या एब्सोल्यूट रिटर्न में?"
चलिए, इन दोनों को विस्तार से समझते हैं.
CAGR क्या है? आपके लॉन्ग-टर्म निवेश का साथी
CAGR यानी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट एक ऐसा तरीक़ा है, जो ये बताता है कि आपका निवेश हर साल औसतन कितने प्रतिशत की दर से बढ़ा. ये लॉन्ग-टर्म निवेश की परफ़ॉर्मेंस को समझने और दो या ज़्यादा फ़ंड्स की तुलना करने के लिए सबसे अच्छा है.
उदाहरण: मान लीजिए आपने किसी म्यूचुअल फ़ंड में ₹50,000 का निवेश किया. तीन साल बाद ये रक़म बढ़कर ₹70,000 हो गई. अब आप जानना चाहते हैं कि हर साल आपका निवेश औसतन कितने प्रतिशत बढ़ा. इसके लिए CAGR का फ़ॉर्मूला है:
CAGR = [(अंतिम रक़म / शुरुआती रक़म)^(1/सालों की संख्या) - 1] × 100
उदाहरण:
- अंतिम रक़म = ₹70,000
- शुरुआती रक़म = ₹50,000
- साल = 3
CAGR = [(70,000/50,000)^(1/3) - 1] × 100 = 11.86%
यानी, आपका निवेश हर साल औसतन 11.86% की दर से बढ़ा. ये तरीक़ा तब सही है, जब आप लंबे समय के लिए निवेश कर रहे हैं और अलग-अलग फ़ंड्स की तुलना करना चाहते हैं.
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एब्सोल्यूट रिटर्न: शॉर्ट-टर्म निवेश की कैलकुलेशन
एब्सोल्यूट रिटर्न आपके निवेश से कुल मिलाकर कितना मुनाफ़ा या नुक़सान हुआ, ये दिखाता है, बिना टाइमफ़्रेम को ध्यान में रखे. ये शॉर्ट-टर्म निवेश की परफ़ॉर्मेंस को समझने के लिए सबसे आसान और असरदार तरीक़ा है.
उदाहरण: मान लीजिए आपने ₹1,00,000 किसी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश किए. आठ महीने बाद ये रक़म ₹1,30,000 हो गई. इसके लिए एब्सोल्यूट रिटर्न निकालने का फ़ॉर्मला है:
[(अंतिम रक़म / शुरुआती रक़म) - 1] × 100
तो: [(1,30,000/1,00,000) - 1] × 100 = 30%
यानी, आठ महीने में आपके निवेश ने कुल 30% रिटर्न दिया. ये तरीक़ा तब सही है, जब आप ये देखना चाहते हैं कि किसी तय समय में आपका पैसा कितना बढ़ा.
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CAGR और एब्सोल्यूट रिटर्न में क्या अंतर है?
इन दोनों की तुलना करके समझते हैं:
- समय का असर:
- CAGR: ये हर साल की एवरेज ग्रोथ को ध्यान में रखता है. ये लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए सही है.
- एब्सोल्यूट रिटर्न: ये टाइमफ़्रेम को नज़रअंदाज करता है और सिर्फ़ कुल मुनाफे़ पर फ़ोकस करता है, चाहे वो 6 महीने हो या 6 साल.
- ख़ासियत:
- CAGR: लॉन्ग-टर्म निवेश और अलग-अलग फ़ंड्स की तुलना के लिए बेहतर है.
- एब्सोल्यूट रिटर्न: कम समय में निवेश की परफ़ॉर्मेंस को समझने के लिए सही है.
- कौन ज़्यादा सटीक?:
- CAGR: अलग-अलग समय सीमा वाले निवेशों की तुलना करने में ज़्यादा सटीक.
- एब्सोल्यूट रिटर्न: अगर समय सीमा अलग-अलग हो, तो ये कम सटीक हो सकता है.
उदाहरण: मान लीजिए फ़ंड A ने 3 साल में 40% एब्सोल्यूट रिटर्न दिया, और फ़ंड B ने 1 साल में 20%. एब्सोल्यूट रिटर्न के आधार पर फ़ंड A बेहतर लगेगा, लेकिन CAGR की कैलकुलेशन करने पर फ़ंड B का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है, क्योंकि इसने कम समय में रिटर्न दिया.
म्यूचुअल फ़ंड में कौन सा बेहतर है?
CAGR और एब्सोल्यूट रिटर्न दोनों ही अपने-अपने तरीके़ से ख़ास हैं. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप इनका इस्तेमाल कब और कैसे करते हैं.
- लॉन्ग-टर्म निवेश: अगर आप फ्यूचर के लिए, जैसे नया घर, फ़ॉरेन ट्रिप, या रिटायरमेंट के लिए निवेश कर रहे हैं, तो CAGR आपके लिए बेहतर है. ये आपके निवेश की साल-दर-साल एवरेज ग्रोथ को दर्शाता है.
- शॉर्ट-टर्म गोल: अगर आप अगले 6-12 महीनों में कोई नया गैजेट या कोई दूसरे शॉर्ट-टर्म गोल के लिए पैसा बढ़ाना चाहते हैं, तो एब्सोल्यूट रिटर्न का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये आपको कुल मुनाफे़ की मुक़म्मल तस्वीर देगा.
अगला क़दम क्या है?
अब जब आपने CAGR और एब्सोल्यूट रिटर्न को अच्छी तरह समझ लिया है, तो समय है स्मार्ट निवेश शुरू करने का. आपका पैसा आपकी मेहनत का नतीजा है. इसे सही जगह लगाएं और अपने सपनों को साकार करें.
वैल्यू रिसर्च हिन्दी, AMFI और दूसरी कई वेबसाइट्स पर उपलब्ध फ़ंड की तुलना के टूल्स का इस्तेमाल करके आप कई फ़ंड्स के प्रदर्शन और दूसरे बडे़ पैरामीटर की तुलना कर सकते हैं. ये टूल्स आपकी निवेश यात्रा को आसान और सटीक बनाने में मदद करते हैं.
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ये लेख पहली बार मई 28, 2025 को पब्लिश हुआ.
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