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इंडेक्स फ़ंड्स उन निवेशकों के लिए पसंदीदा विकल्प हैं जो कम लागत और व्यापक बाज़ार में निवेश चाहते हैं. लेकिन इनका टैक्स ट्रीटमेंट पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि फ़ंड इक्विटी, डेट या इंटरनेशनल इंडेक्स किसको ट्रैक कर रहा है. भले ही ये तीनों पैसिव फ़ंड्स हैं, लेकिन इनके लिए टैक्स के नियम अलग-अलग हैं.
इक्विटी इंडेक्स फ़ंड्स: ख़ास टैक्स छूट
जो इंडेक्स फ़ंड मुख्य रूप से निफ़्टी 50, सेंसेक्स या निफ़्टी नेक्स्ट 50 जैसे भारतीय शेयरों में निवेश करते हैं, वे इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फ़ंड्स की कैटेगरी में आते हैं. इस कैटेगरी के दो फ़ायदे हैं: कम टैक्स रेट और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के लिए कम होल्डिंग पीरियड.
- अगर इन्हें एक साल से ज़्यादा समय तक होल्ड किया जाता है, तो गेन लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) माने जाते हैं.
- एक फ़ाइनेंशियल ईयर में ₹1.25 लाख तक का LTCG टैक्स-फ़्री है.
- इस सीमा से ऊपर के गेन पर 12.5% की दर से टैक्स लगता है.
- अगर एक साल से कम समय में रिडीम किया जाता है, तो शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) पर टैक्स की 20% की एकसमान दर लागू होती है.
निफ़्टी बैंक, निफ़्टी IT या निफ़्टी PSU इंडेक्स फ़ंड्स आदि सेक्टोरल या थीमैटिक इंडेक्स फंड्स की कैटेगरी में आते हैं. इसलिए इन पर भी यही टैक्स नियम लागू होते हैं.
डेट इंडेक्स फ़ंड: इनकम की तरह टैक्स
डेट इंडेक्स फ़ंड्स क्रिसिल कम्पोजिट बॉन्ड फ़ंड इंडेक्स या सरकारी सिक्योरिटीज़ इंडेक्स जैसे फिक्स्ड-इनकम बेंचमार्क को ट्रैक करते हैं. लेकिन ये इक्विटी-ओरिएंटेड फ़ंड्स की कैटेगरी में नहीं आते, इसलिए इन्हें कोई ख़ास टैक्स छूट नहीं मिलती.
- यहां लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है.
- होल्डिंग पीरियड चाहे जितना हो, पूरा गेन आपकी टैक्सेबल इनकम में जुड़ जाता है.
- फिर इन पर आप पर लागू इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है.
चाहे आप फ़ंड को छह महीने होल्ड करें या तीन साल, टैक्स ट्रीटमेंट एक जैसा रहता है. लंबे समय तक होल्ड करने पर न तो इंडेक्सेशन का फ़ायदा मिलता है और न ही कम टैक्स दर.
फिर भी, ये फ़ंड फ़िक्स्ड डिपॉजिट्स की तुलना में कुछ फ़ायदे देते हैं, जिनमें लिक्विडिटी, पारदर्शिता आदि शामिल हैं और साथ ही, टैक्स केवल रिडेम्शन के समय लगता है. वहीं, FDs के मामले में ब्याज पर हर साल टैक्स देना पड़ता है.
इंटरनेशनल इंडेक्स फ़ंड: हाइब्रिड जैसा टैक्स
US के S&P 500 या नैस्डैक 100 जैसे बेंचमार्क को ट्रैक करने वाले इंटरनेशनल इंडेक्स फ़ंड भले ही ग्लोबल इक्विटी में निवेश करते हों, लेकिन भारतीय टैक्स नियमों के तहत इन्हें इक्विटी फ़ंड्स नहीं माना जाता.
इनका टैक्स ट्रीटमेंट हाइब्रिड है:
- अगर दो साल से कम समय तक होल्ड किया जाता है, तो कैपिटल गेन पर आप पर लागू इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है.
- अगर दो साल से ज़्यादा समय तक होल्ड किया जाता है, तो गेन लॉन्ग-टर्म माने जाते हैं और 12.5% की एकसमान दर से टैक्स लगता है, बिना किसी छूट सीमा के.
इसलिए ये फ़ंड न तो इक्विटी फ़ंड की तरह ₹1.25 लाख की LTCG छूट देते हैं और न ही पुराने डेट फ़ंड्स की तरह इंडेक्सेशन का फ़ायदा मिलता है.
इसका कारण नियम है: टैक्स के लिए इक्विटी-ओरिएंटेड माने जाने के लिए फ़ंड को कम से कम 65% भारतीय इक्विटी में निवेश करना ज़रूरी है. विदेशी शेयरों में निवेश, भले ही वे इक्विटी हों, इस कैटेगरी में नहीं गिने जाते.
इंडेक्स फ़ंडः टैक्स और निवेश से जुड़ी हर अहम बात
| इंंडेक्स फ़ंड का प्रकार | ये किसमें निवेश करता है | LTCG के लिए होल्डिंग पीरियड | LTCG टैक्स रेट | STCG टैक्स रेट |
|---|---|---|---|---|
| इक्विटी इंडेक्स फ़ंड | भारतीय स्टॉक्स | > 1 साल | ₹1.25 लाख से ज़्यादा के फ़ायदे पर 12.5% | 20% फ़्लैट |
| सेक्टोरल/थीमैटिक इंडेक्स फ़ंड | भारतीय स्टॉक्स (सेक्टर केंद्रित) | > 1 साल | ₹1.25 लाख से ज़्यादा के फ़ायदे पर 12.5% | 20% फ़्लैट |
| डेट इंडेक्स फ़ंड | भारतीय बॉन्ड/जी-सेक | लागू नहीं | आप पर लागू स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा | आपके इनकम स्लैब के अनुसार टैक्स लगाया जाएगा |
| इंटरनेशनल इंडेक्स फ़ंड | ग्लोबल स्टॉक्स | 2 साल | 12.50% | आपके इनकम स्लैब के अनुसार टैक्स लगाया जाएगा |
डिविडेंड का क्या?
अगर आपका इंडेक्स फ़ंड डिविडेंड देता है, तो वो रक़म आपकी इनकम में जुड़ती है और आपके स्लैब रेट के हिसाब से टैक्स लगता है. साथ ही, अगर म्यूचुअल फ़ंड से आपकी कुल डिविडेंड इनकम एक फ़ाइनेंशियल ईयर में ₹10,000 से ज़्यादा है, तो फ़ंड हाउस 10% TDS काट लेगा.
आखिरी बात
सिर्फ इसलिए कि दो फ़ंड्स को ‘इंडेक्स’ फ़ंड्स कहा जाता है, इसका मतलब ये नहीं कि उन पर एक जैसा टैक्स लगेगा. इसलिए, अपने फ़ंड में निवेश करने से पहले ये समझ लें कि वो किसमें निवेश करता है- न कि सिर्फ़ उसका नाम देखकर-ताकि टैक्स से जुड़े फै़सले सही हों.
निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फ़ंड की इनवेस्टर एजुकेशन और जागरूकता की पहल
म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के लिए ज़रूरी जानकारी: सभी म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों को एक बार KYC (नो योर कस्टमर) प्रोसेस पूरा करना होता है. निवेशकों को सिर्फ़ SEBI की वेबसाइट पर 'इंटरमीडियरीज़/मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशन' के तहत रजिस्टर्ड म्यूचुअल फ़ंड्स के साथ डील करना चाहिए. अपनी शिकायतों के समाधान के लिए, कृपया www.scores.gov.in पर जाएं. KYC, डिटेल में बदलाव और शिकायतों के निवारण के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए, mf.nipponindiaim.com/InvestorEducation/what-to-know-when-investing पर विज़िट करें.
म्यूचुअल फ़ंड निवेश मार्केट से जुड़े जोख़िमों के अधीन हैं. कृपया सभी स्कीम से जुड़े दस्तावेज़ों को ध्यान से पढ़ें.
ये भी पढ़ें: इंडेक्स फ़ंड बनाम ETF: क्या अंतर है?
ये लेख पहली बार जून 18, 2025 को पब्लिश हुआ.
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