Aditya Roy/AI-Generated Image
क्या आपको 90 के दशक की बॉलीवुड क्लासिक फिल्म करण अर्जुन याद है? दो असली वारिस, जिनके साथ ग़लत हुआ और उन्हें किनारे कर दिया गया, एक नाटकीय वापसी करके अपनी विरासत को एक खतरनाक विलेन से वापस छीन लेते हैं. ये कहानी लचीलेपन, धैर्य और हाइप पर कंसिस्टेंसी की आखिरी जीत की है.
भारतीय शेयर बाज़ार में भी ऐसे ही “करण अर्जुन” वाले मोमेंट्स देखने को मिले हैं. इंडस्ट्री के लीडर्स को महत्वाकांक्षी चैलेंजर्स ने सिंहासन से उतार दिया, जो तेज़ बदलाव का वादा करते थे. थोड़े समय के लिए लगा कि नया आने वाला नियमों को नए सिरे से लिख देगा. लेकिन समय के साथ, फ़ंडामेंटल्स - क्वालिटी, भरोसा, स्केल और एग्जीक्यूशन- पर जोर देने वाले पुराने खिलाड़ी अपनी जगह वापस हासिल कर लेते थे.
ये दमदार वापसी की कहानियां साबित करती हैं कि तथाकथित “फर्स्ट-मूवर एडवांटेज” शायद ही कभी स्थायी होता है. लंबे समय में, टिकाऊ लीडरशिप अनुशासन और डिलीवरी के सहारे बनती है. यहां भारत की लिस्टेड कंपनियों से पांच बेहतरीन उदाहरण सामने रखे गए हैं.
1. भारती एयरटेल बनाम रिलायंस जियो – टेलीकॉम का महा मुकाबला
2016 में, रिलायंस जियो ने फ़्री डेटा, बेहद कम टैरिफ़ और 4G टावरों की झड़ी लगा कर टेलीकॉम बाजार को उलट-पुलट कर दिया. कुछ महीनों में ही करोड़ों सब्सक्राइबर्स के जियो की तरफ शिफ़्ट होने से पुराने खिलाड़ी हिल गए. एयरटेल के प्रॉफिट्स गोता लगा गए, फ़ाइनेंशियल ईयर में ₹23,000 करोड़ से ज़्यादा का घाटा दर्ज किया. मार्केट शेयर फिसल गया और कई लोगों ने सवाल किया कि क्या कंपनी इस ‘जंग’ में बच पाएगी.
लेकिन एयरटेल ने एक लंबा रास्ता चुना. उसने नेटवर्क क्वालिटी में भारी निवेश किया, प्रीमियम ब्रांड पोजिशनिंग बनाई और हाई-वैल्यू कस्टमर्स को बनाए रखने पर फोकस किया. फ़्रीबीज़ का दौर खत्म होने और टैरिफ़ बढ़ने के साथ, ये निवेश रंग लाए. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 तक, एयरटेल का ARPU ₹245 पर पहुंच गया, जो इंडस्ट्री में सबसे ज़्यादा था और कंपनी ने लगातार 14 तिमाहियों में प्रॉफ़िट दर्ज किया. रेवेन्यू में इसका मार्केट शेयर अब 40 प्रतिशत के आसपास है और कंपनी जियो से कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है. स्पष्ट है कि प्राइसिंग से आप भीड़ जुटा सकते हैं, लेकिन क्वालिटी ही उसे बनाए रखती है.
2. डाबर बनाम पतंजलि - आयुर्वेद में जंग
च्यवनप्राश और शहद जैसे सेगमेंट्स में दबदबा रखते हुए, डाबर दशकों से भारत में आयुर्वेद का चेहरा थी. फिर 2015-16 में पतंजलि तूफान की तरह आई. उसके कम दाम, राष्ट्रवादी मार्केटिंग और आक्रामक डिस्ट्रीब्यूशन ने डाबर का शेयर तेज़ी से कम कर दिया. च्यवनप्राश में डाबर की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से घटकर 60 प्रतिशत से कम हो गई, जबकि पतंजलि ने शहद में डबल-डिजिट शेयर हथिया लिया.
डाबर ने तीन तरफा हमले से जवाब दिया: नए प्रोडक्ट्स इनोवेट किए (शुगर-फ्री च्यवनप्राश, प्रीमियम शहद), क्वालिटी को मज़बूत किया और अपनी मज़बूत डिस्ट्रीब्यूशन से भारत के हर कोने तक पहुंचा. जैसे ही पतंजलि की ग्रोथ क्वालिटी की चिंताओं और ऑपरेशनल ओवररीच से सुस्त पड़ी, डाबर ने मैदान वापस जीत लिया. 2024 के अंत तक च्यवनप्राश में उसका शेयर 61.6 प्रतिशत पर वापस आ गया और 2025 में इसने लीगल बैटल जीत ली जिससे पतंजलि को गुमराह करने वाले क्लेम करने से रोका गया. डाबर ने साबित किया कि गहरी जड़ें और ब्रांड पर भरोसे से सबसे तेज़ तूफानों का भी सामना किया जा सकता है.
3. रॉयल एनफील्ड (आयशर मोटर्स) बनाम जापानी बाइक मेकर्स – एक लीजेंड का पुनर्जन्म
1990 के दशक के अंत तक रॉयल एनफील्ड एक पुरानी याद बन चुकी थी. ऑयल लीक, पुरानी टेक्नोलॉजी और उम्रदराज कस्टमर बेस की वजह से, सेल्स बस 2,000 बाइक्स प्रति महीना पर गिर गई थीं. हीरो-होंडा, यामाहा जैसे जापानी मेकर्स और बजाज की पल्सर लाइन ने हल्की, तेज़ और ज़्यादा भरोसेमंद बाइक्स ऑफर कीं, जिससे एनफील्ड बंद होने की कगार पर पहुंच गई.
फिर आए सिद्धार्थ लाल, जिन्होंने बोर्ड को ब्रांड को एक आखिरी मौका देने के लिए मनाया. उन्होंने इंजन्स को मॉडर्न बनाया, पुराने मैकेनिकल फॉल्ट्स को खत्म किया और थंडरबर्ड, उसके बाद गेम-चेंजिंग क्लासिक 350 जैसे मॉडल्स पेश किए. रेट्रो को लेकर आकर्षण वैसा ही रहा, लेकिन एक्सपीरियंस भरोसेमंद हो गया.
2023 तक, रॉयल एनफील्ड सालाना 9,00,000 से ज़्यादा बाइक बेच रही थी और मिड-साइज मोटरसाइकल सेगमेंट में 90 प्रतिशत से ज़्यादा का दबदबा रखती थी. टर्नअराउंड इतना ज़बर्दस्त था कि वेटिंग पीरियड्स - जो कभी कम कैपेसिटी की वजह से शर्म की बात थे - अब भारी डिमांड की वजह से सम्मान की बात बन गई.
4. कोलगेट-पामोलिव बनाम नेचुरल्स ट्रेंड - हर्बल ख़तरे को नज़रंदाज़ करना
आधे से ज़्यादा बाज़ार पर कब्जे के साथ, कोलगेट दशकों से भारतीय टूथपेस्ट बाज़ार की निर्विवाद राजा थी. फिर 2016 में हर्बल/नेचुरल्स ट्रेंड फूट पड़ा. कोलगेट से शेयर छीनते हुए, पतंजलि का दंत कांति और डाबर का रेड पेस्ट पॉपुलर हो गए. बस तीन सालों में नेचुरल्स ने अपना मार्केट शेयर नौ प्रतिशत बढ़ा लिया.
कोलगेट ने तेज़ी से बदलाव किया. उसने अपनी आयुर्वेदिक लाइन वेदशक्ति लॉन्च की और पोर्टफ़ोलियो में हर्बल वैरिएंट्स लॉन्च किए. इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण, उसने कंज्यूमर्स को उस साइंस से जुड़ी सुरक्षा की याद दिलाई जो उसे इतने समय से टॉप पर रखे हुए था.
2023 तक हर्बल टूथपेस्ट की लहर थम गई थी और कोलगेट का शेयर फिर चढ़ने लगा. आज भी बाज़ार में इसकी हिस्सेदारी क़रीब 50 प्रतिशत है. चमक भले ही फीकी पड़ गई, लेकिन भरोसेमंद ब्रांड टिका रहा.
5. ट्रेंट (वेस्टसाइड और ज्यूडियो) बनाम ई-कॉमर्स – ब्रिक-एंड-मोर्टार का जवाबी हमला
2010 के दशक के अंत में वैश्विक स्तर पर बदलते फैशन ब्रैंड्स और ई-कॉमर्स जायंट्स ने भारतीयों के कपड़े ख़रीदने के तरीक़े को बदल दिया. ट्रेंट की फ्लैगशिप रिटेल चेन वेस्टसाइड ग्रोथ सुस्त होने का सामना कर रही थी क्योंकि ऑनलाइन डिस्काउंट्स और इंटरनेशनल लेबल्स कस्टमर्स को खींच रहे थे.
ट्रेंट का जवाब? ज्यूडियो को लॉन्च किया, जो ट्रेंडी, बेहद किफायती फैशन स्टोर्स की चेन है जो तेज़ी से स्केल करने में सक्षम थी. इसने तेज़ी से बदलते फैशन को टाटा रिटेल के भरोसे और फुटप्रिंट से जोड़ा. वेस्टसाइड ने अपनी पोजिशनिंग को बेहतर बनाया जबकि ज्यूडियो ने मास मार्केट में तूफान ला दिया.
फ़ाइनेंशियल ईयर 25 तक ट्रेंट के रेवेन्यू ₹17,135 करोड़ पर पहुंच गए, अकेले ज्यूडियो की सेल्स 1 बिलियन डॉलर से ज़्यादा हो गई. अब 1,000 से ज़्यादा स्टोर्स सालाना 100 मिलियन से ज्यादा कस्टमर्स को सेवाएं देते हैं. सक्रिय रहकर और भारतीय कंज्यूमर को समझकर, ट्रेंट ने कथित नुक़सान को मार्केट लीडरशिप में बदल दिया.
क्या है कॉमन
इंडस्ट्रीज़ से इतर, बाज़ार में उथल-पुथल मचाने वाली कंपनियों ने सुर्खियां हासिल कीं, लेकिन कमबैक्स यानी दमदार वापसी करने वाली कंपनियों ने बड़ी वैल्थ बनाई. चाहे टेलीकॉम हो, आयुर्वेद, मोटरबाइक्स, टूथपेस्ट या फैशन रिटेल हो - विनर्स ने फ़ंडामेंटल्स पर टिके रहकर, स्मार्ट तरीक़े से बदलाव किए और ब्रांड पर भरोसे का फ़ायदा उठाकर अपने चैलेंजर्स को पीछे छोड़ दिया.
और हमारे अपने स्टॉक एडवाइज़र यूनिवर्स में, हम दो ऐसी शानदार कमबैक स्टोरीज़ अभी चमकते हुए देख रहे हैं. दो कंपनियां जिन्हें एक उभरते सेगमेंट में एक चमकदार नई कंपनी ने सिंहासन से उतार दिया था, लेकिन अब वो व्यवस्थित तरीक़े से अपनी जगह वापस हासिल कर रही हैं.
बिल्कुल ‘करण अर्जुन’ के असली वारिसों की तरह, ये बिज़नस साबित कर रहे हैं कि धैर्य, क्वालिटी और अनुशासन कम समय की सुर्खियों पर जीत हासिल कर सकते हैं.
आप इन दो कंपनियों के नाम अनलॉक कर सकते हैं, जो आज हमारे वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र रेकमेंडेशंस के हिस्से के तौर पर निवेश के लायक हैं.
इन स्टॉक्स को अभी एक्सप्लोर करें
ये भी पढ़ेंः कम मार्जिन = ख़राब बिज़नस? डीमार्ट का 6 गुना रिटर्न दूसरी कहानी ही कहता है
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
शिकायतों के लिए संपर्क करें: [email protected]






