फंड वायर

क्या बड़े फ़ंड हमेशा बेहतर होते हैं?

टॉप फ़ंड्स एसेट में तो भारी हैं, पर उनका लंबे समय का रिकॉर्ड कुछ और कहानी कहता है

टॉप फ़ंड्स एसेट में तो भारी हैं, पर उनका लंबे समय का रिकॉर्ड कुछ और कहानी कहता हैAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः बड़े म्यूचुअल फ़ंड्स दिखने में सुरक्षित और स्थिर लगते हैं, पर जब लंबे समय का रिकॉर्ड देखा जाता है तो तस्वीर बदल जाती है. हमारे डेटा में चार कैटेगरीज़ दिखाती हैं कि जिस स्केल ने कभी रिटर्न बढ़ाए, वही अब उन्हें धीमा करने लगा है. क्या निवेशक सहजता पर दांव लगा रहे हैं या असल प्रदर्शन पर? चलिए देखते हैं.

म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री में सफ़लता खुद अपनी खुराक खोज लेती है. कुछ सालों के अच्छे रिटर्न और पैसा अपने आप आने लगता है. फ़ंड बड़ा होता है, नाम फैलता है और निवेशक उसके साइज़ को भरोसे की निशानी मान लेते हैं. भारत के इक्विटी फ़ंड्स इसका सटीक उदाहरण हैं. आज 10 सबसे बड़े फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स कुल कैटेगरी का 78% एसेट संभालते हैं और 10 सबसे बड़े लार्ज-कैप फ़ंड्स लगभग 90%. जो निवेशक फ़ंड के साइज़ को सुरक्षा या  कुशलता का प्रतीक मानते हैं, उनके लिए तर्क साफ़ है - इतने लोग ग़लत नहीं हो सकते.

शॉर्ट-टर्म में ये सोच सही भी लगती है. पिछले एक साल में 10 में से 7 फ़्लेक्सी-कैप और 10 में से 8 लार्ज-कैप फ़ंड्स ने अपने बेंचमार्क और एवरेज से बेहतर रिटर्न दिए. बड़े फ़ंड्स का प्रदर्शन उनकी लोकप्रियता को सही ठहराता दिखा.

लेकिन आराम और प्रदर्शन शायद ही कभी लंबे समय तक साथ-साथ चलते हैं. वही स्केल जो शुरुआत में लिक्विडिटी और कम लागत का फ़ायदा देता है, धीरे-धीरे लचीलापन कम कर देता है और अल्फ़ा को मिटा देता है.

लार्ज-कैप और फ़्लेक्सी-कैप जैसी कैटेगरीज़ में, जहां ज़्यादातर बड़ी कंपनियों में निवेश किया जाता है, वहां साइज़ के चलते दक्षता बढ़ जाती है. मैनेजर मार्केट में हलचल पैदा हुए बिना बड़ी पोज़िशन ले सकते हैं. इससे पिछले साल के उनके दबदबे को समझने में मदद मिली है.

पर जैसे-जैसे कम साइज़ वाले फ़ंड्स पर ग़ौर करते हैं, कहानी बदल जाती है. मिड-कैप और स्मॉल-कैप फ़ंड्स ऐसे मार्केट में काम करते हैं जहां लिक्विडिटी कम होती है और हर ट्रेड का असर क़ीमतों पर पड़ता है. जब कोई फ़ंड ₹20,000–30,000 करोड़ संभालते हुए छोटी कंपनियों में ख़रीद या बिक्री करता है, तो दाम ऑर्डर पूरे होने से पहले ही बदल जाते हैं. पिछले साल, मिड-कैप में 10 में से कोई बड़ा फ़ंड बेंचमार्क नहीं हरा सका; स्मॉल-कैप में सिर्फ़ 3 ने ऐसा किया.

लेकिन शॉर्ट-टर्म डेटा पूरी सच्चाई नहीं बताता. ये जानने के लिए कि क्या साइज़ वाक़ई स्किल का संकेत है, लंबी अवधि देखनी पड़ती है.

क्या साइज़ सच में मायने रखता है?

लॉन्ग-टर्म नज़रिया ज़्यादा साफ़ जवाब देता है.

तीन सालों में बड़े फ़ंड्स का प्रदर्शन

लार्ज और फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स ने बढ़त बनाए रखी, पर मिड और स्मॉल-कैप के दिग्गज पीछे रहे

फ़ंड कैटेगरी टॉप 10 में से बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन करने वाले फ़ंड्स तीन साल पहले कैटेगरी एसेट में हिस्सा (%) टॉप 10 का औसत रिटर्न (%) बेंचमार्क रिटर्न (%)
लार्ज-कैप 5 36.0 16.6 13.5
फ़्लेक्सी-कैप 7 59.3 18.2 15.9
मिड-कैप 4 35.9 22.4 23.3
स्मॉल-कैप 4 48.2 22.5 23.9
फ़ंड्स की संख्या और रिटर्न अगस्त 2022 तक के औसत मासिक रोलिंग रिटर्न पर आधारित हैं. एसेट का आंकड़ा 30 अगस्त 2022 तक का है.

डेटा एक मिलीजुली तस्वीर देता है. लार्ज और फ़्लेक्सी-कैप कैटेगरी में साइज़ ताक़त के साथ चलता दिखा. लगभग आधे से दो-तिहाई बड़े फ़ंड्स ने तीन साल में बेहतर रिटर्न दिए - जिससे लगता है कि उनका प्रोसेस, एक्सेस और ब्रांड स्थिरता ने उन्हें एक साइकल से ज़्यादा टिकाऊ बनाया.

लेकिन जैसे ही नज़र मिड और स्मॉल-कैप पर जाती है, ये रिश्ता टूट जाता है. वहां बड़े फ़ंड्स अपनी कैटेगरी के दूसरे फ़ंड्स से पीछे रहे और बेंचमार्क को भी नहीं हरा सके. इन सेगमेंट के टॉप 10 फ़ंड्स कुल एसेट का 80% से ज़्यादा संभालते हैं - यानी इतना पैसा कि मार्केट के दाम खुद हिल जाएं, पर लगातार अल्फ़ा देना मुश्किल हो जाए. ज़्यादा साइज़ के चलते कई फ़ंड्स को पहले से महंगे स्टॉक्स ख़रीदने पड़ते हैं या बहुत सारे स्टॉक्स में थोड़ा-थोड़ा निवेश करना पड़ता है, जिससे रिटर्न कम हो जाता है.

पांच सालों में तस्वीर और साफ़

सबसे बड़े फ़ंड्स की बढ़त अब मामूली रह गई है - मिड और स्मॉल-कैप अब इंडेक्स से भी नीचे हैं

कैटेगरी टॉप 10 में से बेंचमार्क से बेहतर फ़ंड्स पांच साल पहले कैटेगरी एसेट में हिस्सा (%) टॉप 10 का औसत रिटर्न (%) बेंचमार्क रिटर्न (%)
लार्ज-कैप 6 48.0 19.8 18.5
फ़्लेक्सी-कैप 4 34.8 21.3 20.8
मिड-कैप 6 41.7 28.1 28.5
स्मॉल-कैप 4 41.8 29.5 30.0
नंबर और रिटर्न अगस्त 2020 तक के औसत मासिक रोलिंग रिटर्न पर आधारित हैं. एसेट की कैलकुलेशन 30 अगस्त 2020 की स्थिति में की गई है.

पांच साल का डेटा रुझान को पक्का कर देता है. हर कैटेगरी में आउटपरफ़ॉर्मेंस अब मामूली रह गया है. पांच साल पहले, 10 सबसे बड़े लार्ज-कैप फ़ंड्स (जो मिलकर 95% से ज़्यादा एसेट संभालते थे) ने 19.8% का औसत रिटर्न दिया - बेंचमार्क 18.5% से बस थोड़ा ज़्यादा.

फ़्लेक्सी-कैप दिग्गजों की बढ़त और भी कम - 21.3% बनाम 20.8%- रही. वहीं, मिड और स्मॉल-कैप में बड़े फ़ंड्स अब बेंचमार्क से नीचे हैं. मिड-कैप में सिर्फ़ 10 में से 6 और स्मॉल-कैप में 4 फ़ंड्स ही आगे रहे.

साइज़ के दो पहलू

बड़े साइज़ का कैलकुलेशन मुश्किल है. ₹40,000 करोड़ का फ़ंड ₹4,000 करोड़ वाले की तरह काम नहीं कर सकता. हर नया इनफ़्लो फोकस कम करता है; हर रीबैलेंस धीरे करना पड़ता है ताकि दाम न हिलें. धीरे-धीरे वही लचीलापन ख़त्म हो जाता है जिससे अल्फ़ा बनता है.

मिड और स्मॉल-कैप फ़ंड्स में ये असर ज़्यादा दिखता है, जहां लिक्विडिटी कम होती है. टॉप फ़ंड्स अक्सर उन्हीं कुछ कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं, जिससे पूरा सेगमेंट भीड़भाड़ वाला हो जाता है. जब कोई बड़ा फ़ंड पोर्टफ़ोलियो बदलता है, बाक़ी को भी साथ चलना पड़ता है और दाम झूलने लगते हैं.

लार्ज-कैप फ़ंड्स को इसके उलट स्ट्रक्चरल फ़ायदे मिलते हैं. बड़ी कंपनियों में निवेश से लिक्विडिटी बनी रहती है और साइज़ बढ़ाना मुश्किल नहीं होता.

फिर भी, ऐसे फ़ंड्स बहुत कम हैं जो बड़े भी हैं और लगातार अच्छा प्रदर्शन भी करते हैं - जैसे Nippon Small Cap, Mirae Asset Midcap, Parag Parikh Flexi Cap और HDFC Flexi Cap. इन फ़ंड्स ने साइज़ बढ़ने पर भी अपनी सोच और प्रोसेस नहीं छोड़ा.

आख़िरी बात

निवेशकों के लिए संदेश साफ़ है - बड़ा साइज़ कुछ फ़ायदे देता है, पर गारंटी नहीं. स्केल स्थिरता और कम ख़र्च लाता है, लेकिन ये बचाव की ताक़तें हैं, जीत की नहीं.

लार्ज-कैप जैसी लिक्विड कैटेगरीज़ में बड़े फ़ंड्स संतुलित रिटर्न दे सकते हैं. पर जहां लिक्विडिटी कम है, वहां साइज़ बढ़ने के साथ लचीलापन घटता है और आख़िर में रिटर्न भी.

बड़े फ़ंड्स की अपील भावनात्मक भी होती है - लोग लोकप्रियता को सुरक्षा और सुरक्षा को भरोसे से जोड़ लेते हैं. पर मार्केट में आरामदेह रास्ता शायद ही कभी सबसे लाभदायक होता है. साइज़ टिके रहने की गारंटी देता है, सफ़लता की नहीं.

निष्कर्ष साफ़ है - म्यूचुअल फ़ंड्स में साइज़ बीते प्रदर्शन को दिखाता है, आने वाले को नहीं. बड़ा फ़ंड बस ये साबित करता है कि वो कभी अच्छा था, आगे भी रहेगा - इसकी गारंटी नहीं.

सबसे बड़े नामों के पीछे भागना समझदारी लग सकती है, पर असली रणनीति सिर्फ़ आकार को नहीं, बल्कि स्थिरता को प्राथमिकता देना है. बड़े फ़ंड्स मानसिक सुकून देते हैं, पर असली शांति वही फ़ंड्स देते हैं जो प्रोसेस पर टिके हों - चाहे वो बड़े हों या छोटे.

साइज़ और स्किल एक नहीं

सबसे बड़े फ़ंड्स सुरक्षित लगते हैं, पर इतिहास बताता है - वे ज़्यादा दिन टॉप पर नहीं टिकते.

वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र इस भ्रम को तोड़ता है. फ़ंड एडवाइज़र के ज़रिए निवेशक सिर्फ़ साइज़ नहीं, बल्कि टिकाऊ प्रोसेस वाले फ़ंड चुन सकते हैं. यहां आप अपने फ़ाइनेंशियल गोल के हिसाब से सही फ़ंड खोज सकते हैं, पोर्टफ़ोलियो को रियल टाइम में ट्रैक कर सकते हैं और जान सकते हैं कि कब किसी फ़ंड में निवेश बढ़ाना या घटाना ठीक रहेगा.

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