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सोशल मीडिया के इन्फ़्लुएंसर से जुड़े हिस्सों में एक दिलचस्प पैटर्न उभरा है. कुछ एडवाइज़र और फिनफ्लुएंसर - जिनमें से कई काफ़ी प्रसिद्ध हैं - ने नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के खिलाफ़ एक आक्रामक अभियान छेड़ दिया है. उनके पोस्ट हज़ारों बार शेयर होते हैं, वीडियो लाखों व्यूज़ पाते हैं और कमेंट सेक्शन चिंतित निवेशकों से भर जाते हैं - जो सोच रहे होते हैं कि कहीं उन्होंने कोई बड़ी गलती तो नहीं कर दी.
NPS के ख़िलाफ़ दलीलें लगभग एक जैसी होती हैं. वे विदड्रॉल पर प्रतिबंधों की ओर इशारा करते हैं, एन्युटी की अनिवार्यता पर नाराज़ होते हैं, ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट की बारीक़ कैलकुलेशन पेश करते हैं और नतीजा निकालते हैं कि निवेशकों को इससे दूर रहना चाहिए. कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि जिनका कॉर्पस छोटा है, वे शर्तें पूरी होने पर पैसे निकाल लें.
लेकिन इस पूरे अभियान की दिलचस्प बात ये है कि तकनीकी रूप से कई बिंदुओं पर सही होते हुए भी इसमें निवेश के मूल सिद्धांतों को ग़लत समझा गया है. आलोचक रिटर्न के हर दशमलव अंश को बेहतर बनाने में इतने मशगूल हैं कि उन्हें पूरी तस्वीर दिखाई ही नहीं देती.
मानव स्वभाव को लेकर एक साधारण अवलोकन इसे स्पष्ट करता है. जब कोई आपको कहता है कि कोई चीज़ “ठीक” है और करने लायक है, तो आप बस सिर हिलाकर आगे बढ़ जाते हैं. इसमें कोई नाटक नहीं है, कोई रहस्योद्घाटन नहीं है और न ही उस विषय-वस्तु को मित्रों के साथ साझा करने का कोई कारण है. पर जब कोई कैलकुलेशन और डरावनी भविष्यवाणियों के साथ ये चेतावनी देता है कि आप “भयंकर गलती” कर रहे हैं तो वो कंटेंट शेयर होने लायक बन जाता है. ख़ासकर अगर आप YouTube, Insta या X के खेल में अच्छी तरह से फंसते हैं तो नकारात्मकता जुड़ाव पैदा करती है, और जुड़ाव से पैसा बनता है.
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हम ये नहीं कह रहे हैं कि NPS की सारी आलोचना ग़लत है. इसमें कुछ सीमाएं हैं - एन्युटी की अनिवार्यता लचीलापन घटाती है, एग्ज़िट की बंदिशें असुविधाजनक हो सकती हैं और हां, इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न दे सकते हैं. ये वाजिब मुद्दे हैं. और सच ये भी है कि सरकार एन्युटी से जुड़े नियम पर फिर से विचार कर रही है, और मैं व्यक्तिगत रूप से इसकी पुष्टि कर सकता हूं.
हालांकि, आलोचक जिस चीज़ को लगातार भूल जाते हैं, वो ये कि रिटायरमेंट निवेश का लक्ष्य “सबसे ज़्यादा रिटर्न कमाना” नहीं, बल्कि “ऐसी व्यवस्था बनाना” है, जिससे आप बिना बार-बार अपनी रणनीति बदले 30-40 साल तक जुड़े रह सकें. जो निवेशक रिटायरमेंट के लिए हर कदम पर “ऑप्टिमाइज़” करने की कोशिश करते हैं, वे बार-बार फ़ंड बदलते रहते हैं. वो इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड से शुरू करते हैं, फिर कहीं पढ़ते हैं कि डायरेक्ट प्लान, रेगुलर प्लान से बेहतर हैं - वो स्विच कर जाता है. फिर उसे पता चलता है कि स्मॉल-कैप फ़ंड ने ऐतिहासिक रूप से बेहतर रिटर्न दिए हैं - वो फिर बदल देता है. कुछ महीनों बाद, कोई बताता है कि एक्टिव फ़ंड अपने इंडेक्स से कमतर प्रदर्शन करते हैं - एक और बदलाव. फिर अहसास होता है कि भारतीय बाज़ारों की तुलना में अमेरिकी बाज़ार बेहतर प्रदर्शन कर चुके हैं - और फिर बदलाव. इस पूरी यात्रा में वह एग्ज़िट लोड देता है, टैक्स इवेंट्स बनाता है और सबसे अहम - किसी भी रणनीति को काम करने के लिए पर्याप्त समय नहीं देता.
NPS इस अंतहीन छेड़छाड़ यानि बदलाव की प्रवृत्ति को समाप्त कर देता है. अगर आप सैलरीड कर्मचारी हैं, तो पैसा स्वतः ही पे-रोल कटौती के माध्यम से जाता है, विभिन्न एसेट क्लास में स्वतः निवेश होता है और रिटायरमेंट तक लॉक रहता है. ये उबाऊ है, ग्लैमरस नहीं है और लगातार इसमें बदलाव करना असंभव है. ये कमियां नहीं हैं - बल्कि यही इसकी ख़ूबियां हैं.
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जिस बात को आलोचक अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं, वो ये है कि ज़्यादातर लोगों के लिए उनका सबसे बड़ा रिटायरमेंट जोखिम ये नहीं है कि वे “सैद्धांतिक रूप से सबसे बेहतर” रिटर्न से एक प्रतिशत कम कमा लें - जो वैसे भी केवल बाद में दिखाई देता है. बल्कि ये है कि वे पर्याप्त बचत नहीं करते या अपने रिटायरमेंट कॉर्पस को किसी कार या घर की मरम्मत में ख़र्च कर देते हैं या बाज़ार में गिरावट के दौरान घबरा कर बेच देते हैं.
NPS इन वास्तविक दुनिया के जोखिमों को अपने स्ट्रक्चर से कम करता है. लॉक-इन पीरियड से पहले एग्ज़िट को रोकता है. ऑटोमैटिक निवेश व्यस्त महीनों में योगदान से बचने से रोकता है. इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज़ में डाइवर्सिफ़िकेशन, उन सब या कुछ नहीं वाले निवेशों को रोकती है जो निवेशक अक्सर अपनी मर्ज़ी से करते हैं.
क्या NPS परफ़ेक्ट है? बिल्कुल नहीं. क्या ये आपका एकमात्र रिटायरमेंट निवेश होना चाहिए? शायद नहीं. लेकिन इसे पूरी तरह से इसलिए खारिज कर देना, क्योंकि ये रिटर्न के हर संभावित प्रतिशत बिंदु को अधिकतम नहीं करता, एक ऐसी सलाह है जो बेहतर लगती है, लेकिन अक्सर इससे बुरे परिणाम सामने आते हैं. अगली बार जब आप NPS या किसी अन्य सरल और सीधी बचत योजना की आक्रामक आलोचना सुनें, तो खुद से ये पूछिए - क्या यह सलाह मुझे वेल्थ बनाने में मदद के लिए दी जा रही है, या एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए? ये फ़र्क़ शायद कैलुकेशन से कहीं ज़्यादा मायने रखता है.
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