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अगर आपने हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर ज़रा भी नज़र डाली हो, तो आपको लगेगा कि हम “चांदी के युग” में प्रवेश कर चुके हैं. ऐसे मीम्स बन रहे हैं कि अगले ओलंपिक में खिलाड़ी अब गोल्ड नहीं, सिल्वर मेडल जीतने की तैयारी कर रहे हैं. किसी ने मज़ाक में कहा कि गोल्ड फ़्लेक सिगरेट्स का नाम अब “सिल्वर फ़्लेक” रखा जाएगा. वहीं, फ़ाइनेंशियल इन्फ़्लुएंसर्स लगातार ऐसे चार्ट शेयर कर रहे हैं जो साबित करने पर तुले हैं कि चांदी अब “सोने को पीछे छोड़ने” वाली है.
ये सब तब तक मज़ेदार लगता है, जब तक यह एहसास न हो कि हर कमोडिटी क्रेज़ की शुरुआत इसी तरह होती है-जब भरोसा मज़ाक में बदल जाता है. अपने आप मज़बूत साइकल शुरू होता है: लोग कहते हैं कि दाम बढ़ रहे हैं, इसलिए दाम बढ़ते हैं; और दाम बढ़ते हैं इसलिए लोग कहते हैं कि दाम बढ़ रहे हैं. औद्योगिक मांग, सप्लाई की कमी और सोलर पैनल की कहानियां बस इस “मौक़े से चूकने” (FOMO) से जुड़ी मानसिकता पर लिपटी तर्कसंगत परतें हैं.
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हाल की सबसे समझदार टिप्पणी नसीम निकोलस तालेब ने की, जिन्होंने कहा-“यह सोचना ग़लत है कि चांदी और सोना एक ही एसेट क्लास में आते हैं.” ये दोहराने लायक बात है. सोना एक अनोखी जगह रखता है क्योंकि केंद्रीय बैंक इसे अपने रिजर्व एसेट्स के रूप में रखते हैं. यही संस्थागत मांग उसके मूल्य के लिए एक स्थायी आधार बनाती है. जब तक सरकारें सोना संचित करती रहेंगी, तब तक उसे सिर्फ़ एक ट्रेडिंग कमोडिटी नहीं माना जा सकता. लेकिन चांदी को यह दर्जा कभी नहीं मिला. कोई भी सरकार इसे रिज़र्व में नहीं रखती, न ही कोई केंद्रीय बैंकर इसकी क़ीमत को लेकर चिंतित होता है. इसका मूल्य पूरी तरह निजी भावना और अल्पकालिक औद्योगिक मांग पर निर्भर है-कह सकते हैं कि यह “कॉपर की तरह है, जिसे सोना जैसा मानने का भ्रम होता है.” सोना और चांदी सांस्कृतिक रूप से तो “सोना-चांदी” हैं, लेकिन वित्तीय रूप से कभी साथ नहीं चलते. सत्तर के दशक में “सोना चांदी” और “चांदी सोना” नाम की दो फ़िल्में बनी थीं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दोनों धातुएं एक साथ आगे बढ़की हैं.
चांदी के समर्थकों का पसंदीदा तर्क है कि इलेक्ट्रिक वाहनों और सोलर सेल्स के कारण औद्योगिक मांग तेज़ी से बढ़ रही है. लेकिन यह नई बात नहीं है. चांदी के रासायनिक और विद्युत से जुड़े गुण दशकों से जाने जाते हैं. यही कहानी 2011 की तेज़ी में भी थी, जब चांदी न्यूयॉर्क में 48 डॉलर प्रति औंस और भारत में 57,000 रुपये प्रति किलो पहुंच गई थी-और सिर्फ़ आठ दिनों में 25% गिर गई. 2011 से अब तक, चांदी ने लगभग 3% वार्षिक रिटर्न दिया है-यानी महंगाई के बराबर. एक ऐसे एसेट के लिए जिसे हमेशा “ब्रेकआउट के कगार” पर बताया जाता है, यह बहुत लंबा ठहराव है.
कुछ लोग मुद्रा के कमज़ोर होने को दोष देते हैं-कहते हैं कि रुपया गिरा है, इसलिए चांदी कमज़ोर लगती है. यह आंशिक रूप से सही है, लेकिन इसका तर्क निवेश के लिए नहीं बनता. दूसरे कहते हैं कि “छिपी ताकतें” चांदी को दबाकर रखे हुए हैं और अब “तेज़ उछाल” आने वाला है. ऐसे सिद्धांत हर दशक में आते हैं और अगली गिरावट के साथ गायब हो जाते हैं.
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तकनीकी बदलाव भी कभी-कभी उलटी दिशा दिखाते हैं. 20वीं सदी के अधिकांश समय, फ़ोटोग्राफ़िक फ़िल्म और पेपर वैश्विक चांदी उत्पादन का एक-तिहाई उपभोग करते थे. अब यह लगभग शून्य है. इसलिए यह मान लेना कि कोई नई टेक्नोलॉजी अचानक मांग बढ़ा देगी, तब तक व्यावहारिक नहीं जब तक ठोस आधार न हो.
कम से कम सोने की भूमिका तो स्पष्ट है-यह मौद्रिक अस्थिरता के खिलाफ़ बीमा पॉलिसी की तरह काम करता है. चांदी ऐसा अनुशासन नहीं देती. यह सोने के एक लीवरेज्ड संस्करण की तरह व्यवहार करती है-जहां फ़ायदा और नुक़सान दोनों बढ़ जाते हैं, लेकिन सुरक्षा नहीं मिलती. अगर सोना 10% बढ़ता है, तो चांदी 20% बढ़ सकती है; लेकिन अगर सोना 10% गिरता है, तो चांदी 40% गिर सकती है. यह डाइवर्सिफ़िकेशन नहीं, जोखिम का बढ़ना है. सट्टेबाज़ों को यह रोमांचक लग सकता है, लेकिन गंभीर निवेशकों को यह डरावना लगता है. हां, चांदी कुछ समय तक और बढ़ सकती है-मोमेंटम तर्क को कुछ समय के लिए मात दे सकता है. पर निवेशकों को यह समझना चाहिए कि वे किस चीज़ में निवेश कर रहे हैं. जब यह शोर थमेगा, चांदी फिर उसी जगह लौट आएगी. ये ट्रेडर्ल के लिए खिलौना साबित होगी, जिसे कभी-कभी निवेश समझ लिया जाता है.
इसलिए मीम्स और चुटकुले एंजॉय करें-वो इस पूरी “सिल्वर रश” का सबसे स्वस्थ हिस्सा हैं. बस याद रखिए-खेलों की तरह बाज़ारों में “सिल्वर मेडल” का पीछा करना शायद ही कभी अच्छा नतीजा देता है-क्योंकि ये हमेशा खेल ख़त्म होने के बाद दिए जाते हैं.
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