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भस्मासुर का भ्रम

जल्दी रिटर्न के चक्कर में, निवेशक अपनी फ़ाइनेंशियल सिक्योरिटी को दांव पर लगा देते हैं

जल्दी रिटर्न के चक्कर में, निवेशक अपनी फ़ाइनेंशियल सिक्योरिटी को दांव पर लगा देते हैंAditya Roy/AI-Generated Image

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मैं हाल ही में अयोध्या में एक इनवेस्टमेंट कॉन्क्लेव में गया, जहां एक भाषण में आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण जी ने भस्मासुर की कथा सुनाई और इसे निवेशकों के व्यवहार के रूपक के तौर पर समझाया. यह एक अप्रत्याशित तुलना थी, लेकिन आज भारत भर में रिटेल निवेशकों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसका इससे बेहतर रूपक नहीं हो सकता. जो लोग इस कथा से परिचित नहीं हैं, उनके लिए भस्मासुर एक ऐसा राक्षस था जिसे दिव्य शक्तियों की बेहद चाह थी. धर्म के धीमे और कठिन रास्ते से अधीर होकर उसने एक शॉर्टकट अपनाने की कोशिश की और शिवजी की भक्ति की, जो अपने भक्तों को जल्दी वरदान देने के लिए जाने जाते हैं.

अपनी भक्ति दिखाने के लिए भस्मासुर ने कठोर तप किया. इस कथा का वह हिस्सा जो आज के निवेश माहौल से जुड़ जाता है, वह यह है: उसने अपने ही शरीर का मांस काटकर हवन-कुंड में अर्पित किया, और दिव्य कृपा पाने की कोशिश में खुद को लगातार नुकसान पहुंचाता गया. इस बलिदान से खुश होकर शिवजी ने उसे एक भयावह वरदान - किसी के सिर पर हाथ रखते ही उसे भस्म कर देने की शक्ति - दिया.

इसके बाद जो हुआ, वह सीख देने वाला है. भस्मासुर ने तुरंत इस शक्ति को शिवजी पर ही आज़माने की कोशिश की. तभी विष्णुजी मोहिनी रूप में प्रकट हुए और एक नृत्य के दौरान ऐसा भ्रम पैदा किया कि उसने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख दिया. वरदान पूरी तरह काम आया और भस्मासुर अपनी ही शक्ति से भस्म हो गया.

आज के निवेश परिदृश्य को ध्यान से देखिए, तो यही पुरानी कहानी आधुनिक रूप में दोहराई जा रही है. रिटेल निवेशक, जल्दी वेल्थ बनाने की चाह में, धीरे-धीरे अपनी वित्तीय सुरक्षा को कम कर रहे हैं. पहले इमरजेंसी फ़ंड जाता है, जिसे फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग में लगा दिया जाता है. फिर बच्चों की पढ़ाई का फ़ंड क्रिप्टोकरेंसी के सट्टे में भेज दिया जाता है. उसके बाद रिटायरमेंट सेविंग्स उन संदिग्ध योजनाओं में चली जाती हैं जो अविश्वसनीय ऊंचे रिटर्न का वादा करती हैं. बीमा पॉलिसियां सरेंडर होती हैं, सोना बेच दिया जाता है, लोन लिए जाते हैं - हर बलिदान उस दिव्य ‘तुरंत वेल्थ’ वाले वरदान की उम्मीद में किया जाता है.

हमारी कहानी के शिव की तरह, फ़ाइनेंशियल इंडस्ट्री भी ये वरदान देने में बहुत खुश रहती है. क्या थोड़े पैसे में बड़ी पोज़िशन का कंट्रोल चाहिए? अपनी ट्रेडिंग के लिए लीजिए भारी लीवरेज. मिनट-टू-मिनट क़ीमतों में उतार-चढ़ाव से कमाना चाहते हैं? यहां हैं डेरिवेटिव्स जिनसे हर मिनट ट्रेड कर सकते हैं. उद्योग ये विकल्प अनिच्छा से नहीं बनाता; ये उन्हें आक्रामक तरीक़े से बढ़ावा देता है, ट्रेडिंग घंटे बढ़ाता है और इंसेंटिव स्ट्रक्चर भी ऐसे बनाता है जो इन्हें और ज़्यादा आगे बढ़ाते हैं.

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लेकिन भस्मासुर के वरदान की तरह, ये साधन भी अक्सर अपने यूजर्स को ही नष्ट करते हैं. ज़्यादातर व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडर्स का पैसा खोना कोई अपवाद नहीं है - यह सिस्टम की गणितीय सच्चाई है. जिसने घर गिरवी रखकर ऑप्शन ट्रेडिंग की, जिस युवा प्रोफ़ेशनल ने अपने म्यूचुअल फ़ंड बेचकर क्रिप्टो आर्बिट्राज़ में हाथ आज़माया, वह रिटायर्ड व्यक्ति जिसने फ़िक्स्ड डिपॉज़िट छोड़कर हाई-रिटर्न स्कीमों में निवेश किया - सभी अपने आप उन्हीं साधनों से पैसे को बर्बाद करते हैं, जिन्हें उन्होंने वेल्थ पाने का रास्ता समझा था.

कथा सुनाते हुए आचार्य ने एक अहम बात पर ज़ोर दिया: जो प्रक्रिया और उसके परिणाम को समझ लेते हैं, उन्हें कोई डर नहीं रहता. समस्या निवेश में नहीं है - समस्या है अधीरता, समझ की कमी और ख़तरनाक साधनों की आसान उपलब्धता के इस ज़हरीले मेल में. जब कोई पूछता है कि बफ़े और मंगर तकनीकी उछाल से क्यों चूक गए, तो जवाब इसी सिद्धांत में मिलता है. उन्हें पता था कि किसी चीज़ को न समझना भी एक ज़रूरी जानकारी है. वे जानते थे कि वे क्या नहीं जानते, और यही ज्ञान उन्हें अपनी क्षमता से बाहर के क्षेत्रों में बड़ा फ़ायदा और भारी नुक़सान, दोनों से बचा ले गया.

इस प्राचीन कहानी में एक और सबक़ छिपा है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं. भस्मासुर किसी बाहरी दुश्मन या बुरी किस्मत से नहीं नष्ट हुआ. वह अपनी ही शक्ति से नष्ट हुआ, जिसे उसने बिना बुद्धि के इस्तेमाल किया. इसी तरह, लीवरेज निवेशकों को इसलिए नष्ट नहीं करता कि बाज़ार उनके ख़िलाफ़ है या नियामक सो रहे हैं. नुक़सान इसलिए होता है क्योंकि वे ख़तरनाक साधन उन तरीक़ों से इस्तेमाल करते हैं जिन्हें वे अच्छी तरह समझते ही नहीं हैं. वरदान और अभिशाप में फ़र्क कई बार साधन में नहीं होता, बल्कि उसे उपयोग करने वाले की समझ में होता है.

धैर्य से वेल्थ बनाना भस्मासुर की भयंकर तपस्या जैसी नाटकीयता नहीं देता. समझे हुए साधनों में व्यवस्थित निवेश, दशकों तक कंपाउंडिंग, सीमित जीवनशैली रखते हुए बचत बढ़ाना - ये सब सोशल मीडिया पर रोमांच नहीं पैदा करते. लेकिन भस्मासुर का तेज़ी से ऊपर उठना और तेज़ गिरावट के विपरीत, ये तरीक़ा काम करता है. इसमें आपका अस्तित्व बचा रहता है, आपका ‘मांस’ भी सुरक्षित रहता है और आग शांत होने पर भी आप मज़बूती से खड़े रहते हैं.

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