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IPO के जाल में फंसना बंद करें

महंगे IPO अब SEBI की नहीं, बल्कि आपकी समस्या है

महंगे IPO अब SEBI की नहीं, बल्कि आपकी समस्या है Aditya Roy/AI-Generated Image

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Lenskart के IPO ने सोशल मीडिया पर वही पुराना माहौल बना दिया. कंपनी ने जिस वैल्यूएशन पर पब्लिक ऑफ़र फ़ाइल किया, वो बहुत ज़्यादा ऊंचा लग रहा था. कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर लोगों ने तमाम सवाल उठाने शुरू कर दिए.

ख़बरों के अनुसार, प्रमोटर्स ने दो-तीन महीने पहले ही शेयर बहुत कम दाम- लगभग उस वैल्यूएशन के आठवें हिस्से पर- पर ख़रीदे थे, जिसे अब पब्लिक इन्वेस्टर्स से मांगा जा रहा है. कंपनी लगातार घाटे में चल रही थी, लेकिन इस साल एक गैर-कैश, एक-बार के अकाउंटिंग बदलाव से अचानक मुनाफ़े में दिखाई दी. नाराज़गी भारी थी और उम्मीद के बिल्कुल मुताबिक़ थी.

किसी भी सामान्य पैमाने से देखें तो IPO बहुत महंगा था. मेरी नज़र में ऐसे पब्लिक ऑफ़र आकर्षक नहीं होते और मैं आम निवेशकों को इनके बारे में हमेशा सावधान रहने की सलाह देता हूं. अंदरूनी लोगों ने हाल में जो दाम चुकाया और अब पब्लिक से जो दाम मांगा जा रहा है, उसमें फ़र्क़ सच में चुभने वाला है.

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जब इस बात को भी जोड़ दें कि ये बिज़नेस कभी स्थिर मुनाफ़े की क्षमता नहीं दिखा पाया, तो तस्वीर बिल्कुल साफ़ है - ये हालात सामान्य निवेशकों से स्मार्ट प्रमोटर्स और शुरुआती निवेशकों की तरफ़ वेल्थ के खिसकने जैसी लगती है. ये मामला सिर्फ़ Lenskart तक सीमित नहीं है; ऐसे कई IPO लाइन में खड़े हैं.

लेकिन यहां मैं बाक़ी टिप्पणियों से अलग राय रखता हूं: बहुत-सा गुस्सा SEBI की ओर मोड़ा गया कि उसने ऐसे IPO को क्यों मंज़ूरी दी. बार-बार कहा गया कि रेगुलेटर लापरवाही कर रहा है, उसे निवेशकों को ऐसे ऑफ़र से बचाना चाहिए और कंपनियों को अवास्तविक वैल्यूएशन पर लिस्ट होने से रोकना चाहिए.

इस तरह की सोच मूल रूप से ग़लत दिशा में ले जाती है. ये इस बात को लेकर गंभीर भ्रम पैदा करती है कि मार्केट रेगुलेशन का असली काम क्या है.

SEBI का काम पारदर्शिता बनाए रखना और क़ानूनी नियमों का पालन करवाना है. रेगुलेटर को ये सुनिश्चित करना होता है कि कंपनियां ज़रूरी जानकारी सही तरीक़े से दें, IPO की प्रक्रिया नियमों के अनुसार चले और कहीं कोई धोखाधड़ी न हो.

अगर Lenskart ने हाल की प्रमोटर डील्स का खुलासा किया, अपने वित्तीय आंकड़ों को प्रॉस्पेक्टस में सही तरह समझाया और सभी नियमों का पालन किया, तो SEBI का काम पूरा है. IPO अच्छा निवेश है या बुरा, ये रेगुलेटर की ज़िम्मेदारी नहीं है.

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जो दूसरा रास्ता लोग सोचते हैं, वह इससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है. अगर SEBI को निवेश सलाहकार की भूमिका निभानी पड़े - यानी सिर्फ़ "अच्छे" IPO पास करे और "ख़राब" IPO रोक दे - तो ये बाज़ार के फ़ैसले को अफ़सरशाही की सोच से बदलने जैसा होगा.

कौन तय करेगा कि कौन-सा वैल्यूएशन ठीक है? क्या SEBI को कोई प्राइस-टू-अर्निंग सीमा तय करनी चाहिए? क्या उसे मुनाफ़े का कोई तय रेशियो लागू करना चाहिए? ऐसे नियम बाज़ार को सुधारने के बजाय उसकी प्रक्रिया को रोकेंगे.

Lenskart के IPO को आंकने के लिए सारी ज़रूरी जानकारी उपलब्ध थी. प्रमोटर की हाल की डील्स बताई गई थीं. वित्तीय इतिहास प्रॉस्पेक्टस में था. बिज़नेस मॉडल बताया गया था. इन सबके बावजूद अगर कुछ निवेशकों को लगा कि इस IPO से कमाई हो सकती है, तो ये उनका फ़ैसला है. वे सही हों या ग़लत, ये भी उन्हीं का फ़ैसला होगा.

ये स्थिति पिछली तुलना में बहुत बड़ी प्रगति है. जिन्हें 1980-1990 के दशक की IPO लहर याद है, वे जानते हैं कि हालात कितने अलग थे. उस समय कंपनियां प्रॉस्पेक्टस में झूठ लिख देती थीं. प्रमोटर्स नक़ली वित्तीय आंकड़े बनाते, अवास्तविक वादे करते, पैसा इकट्ठा करते और ग़ायब हो जाते.

मसला सिर्फ़ बुरे निवेश का नहीं था; ये बड़े पैमाने पर खुला धोखाधड़ी था. संसद को उन "ग़ायब हो जाने वाली कंपनियों" की जांच के लिए कमेटी बनानी पड़ी. वो सचमुच रेगुलेटर की नाकामी थी.

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उन दिनों से अब हालात बहुत बदल चुके हैं. आज के IPO चाहे महंगे हों या न हों, लेकिन एक पारदर्शी ढांचे में चलते हैं. जानकारी दी जाती है, प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार चलती है और कंपनियां असली होती हैं, जो IPO के बाद भी मौजूद रहती हैं.

निवेशक देख सकते हैं कि वे क्या ख़रीद रहे हैं, चाहे वे ध्यान से देखें या नहीं. कुछ लोग SEBI से लगातार मार्गदर्शन की उम्मीद करते हैं. वे चाहते हैं कि रेगुलेटर उन्हें न सिर्फ़ धोखाधड़ी और अपारदर्शिता से बचाए बल्कि उनकी अपनी ग़लतियों से भी बचाए. ये न तो संभव है और न ही अच्छा है.

बाज़ार इसलिए चलते हैं क्योंकि लोग उपलब्ध जानकारी के आधार पर अपने फ़ैसले लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं. कुछ फैसले अच्छे होंगे, कुछ बुरे. यही प्रक्रिया क़ीमत तय करती है, बाज़ार को कुशल बनाती है और निवेशकों को सीखने का मौक़ा देती है.

अगर कोई IPO आकर्षक न लगे, तो उसमें निवेश न करें. मेरी राय में IPO अक्सर आम निवेशकों के लिए सही नहीं होते. लेकिन मैं ये उम्मीद नहीं करता कि रेगुलेटर उन निवेशों को रोक दे, जिन्हें मैं खुद नहीं चुनूंगा.

हमें पारदर्शी और ठीक तरह से काम करने वाले बाज़ार चाहिए - कोई ऐसा संरक्षक नहीं जो तय करे कि कौन-सा निवेश ठीक है और कौन-सा नहीं. अच्छे निवेश फ़ैसले लेने की आज़ादी तभी मायने रखती है जब बुरे फ़ैसले लेने की भी आज़ादी हो.

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