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क्या ‘टॉप 10 म्यूचुअल फ़ंड्स’ की रैंकिंग आपको गुमराह कर रही है?

लोग निवेश से पहले अक्सर सबसे अच्छे म्यूचुअल फ़ंड्स की लिस्ट पर भरोसा करते हैं. जानिए ये तरीक़ा क्यों ग़लत है और इसके बजाय क्या करना चाहिए.

‘टॉप 10 म्यूचुअल फ़ंड्स’ की रैंकिंग क्या ग़लत दिशा दिखा रही है?Aman Singhal/AI-Generated Image

सारांशः क्या म्यूचुअल फ़ंड्स में निवेश से पहले आप ‘बेस्ट फ़ंड्स’ या ‘टॉप 10 फ़ंड्स’ की लिस्ट बार-बार देखते हैं? यहां बताया गया है कि ये लिस्ट हर बार भरोसेमंद क्यों नहीं होती और फ़ंड्स को सही तरीक़े से कैसे शॉर्टलिस्ट करना चाहिए.

अगर आप सर्च बॉक्स में ‘भारत में टॉप 10 हाई-रिटर्न म्यूचुअल फ़ंड्स’ लिखते हैं, तो नतीजे पहली नज़र में काफ़ी साफ़ और भरोसेमंद लगते हैं. सलीके से सजी रैंकिंग टेबल. आत्मविश्वास से भरे नंबर. आमतौर पर एक साल या तीन साल के रिटर्न पर आधारित. लेकिन ये लिस्ट एक कहीं ज़्यादा अहम सवाल का जवाब नहीं देतीं. क्या हर साल वही फ़ंड्स बार-बार टॉप पर दिखते हैं या बाज़ार के साइकिल के साथ पूरी लाइन-अप बदलती रहती है?

असलियत ये है कि ज़्यादातर ‘टॉप 10’ फ़ंड्स जल्दी ही लिस्ट से बाहर हो जाते हैं. इसका मतलब ये नहीं कि फ़ंड मैनेजर ख़राब हैं. ये बस इस बात को दिखाता है कि बाज़ार कैसे काम करता है. फ़ंड परफ़ॉर्मेंस साइकिल में चलती है और पॉइंट-टू-पॉइंट रिटर्न पर बनी रैंकिंग, शुरुआत या अंत की तारीख़ में हल्के बदलाव से भी काफ़ी बदल सकती है.

इसलिए भारत में ‘टॉप 10 हाई-रिटर्न म्यूचुअल फ़ंड्स’ की ताज़ा लिस्ट को सीधे अपनी शॉर्टलिस्ट बनाने से पहले, एक क़दम पीछे हटकर एक अलग सवाल पूछना ज़्यादा मददगार होता है. वही सवाल है, म्यूचुअल फ़ंड्स में ‘बेस्ट’ का असली मतलब क्या है? ये स्टोरी उसी फ़र्क़ को समझने का एक व्यावहारिक तरीक़ा बताती है. इसे ध्यान में रखेंगे, तो आगे का एनालेसिस ज़्यादा साफ़ समझ आएगा.

क्यों ‘टॉप 10’ लिस्ट स्थिर दिखती हैं लेकिन व्यवहार में अनिश्चित रहती हैं

ज़्यादातर रैंकिंग ट्रेलिंग रिटर्न पर आधारित होती हैं. ट्रेलिंग रिटर्न, अपने मतलब में, दो NAV यानी नेट एसेट वैल्यू पॉइंट्स पर निर्भर करता है. एक शुरुआत की तारीख़ का NAV और दूसरा अंत की तारीख़ का NAV. इनमें से किसी एक तारीख़ को बदल दीजिए और अक्सर पूरी रैंकिंग बदल जाती है. इसी वजह से ईमानदार लिस्ट भी भटका सकती हैं. वे झूठ नहीं बोल रहीं. वे अधूरी हैं.

यही वजह है कि निवेशकों को झटका लगता है. वे पिछले साल का ‘टॉप’ फ़ंड ख़रीदते हैं और फिर उसे कैटेगरी के बीच में फिसलते देखते हैं. इसका मतलब ये नहीं कि फ़ंड ख़राब हो गया. हो सकता है साइकिल बस आगे बढ़ गया हो.

तीन वजहें जिनसे टॉप परफ़ॉर्मर जल्दी बाहर हो जाते हैं

  • बाज़ार के साइकल कल के विनर्स को सज़ा देते हैं: जो फ़ंड मोमेंटम वाले दौर में अच्छा करता है, वही फ़ंड तब जूझ सकता है जब बाज़ार वैल्यू की तरफ़ मुड़ जाए या लीडरशिप लार्ज-कैप से मिड और स्मॉल-कैप में जाए, या इसका उल्टा हो. रैंकिंग टेबल ये नहीं बताती कि रिटर्न किस स्टाइल या एक्सपोज़र से आया.
  • कई लिस्ट कैटेगरी को मिला देती हैं: ये एक बड़ी खामी है. स्मॉल-कैप फ़ंड और फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड दोनों इक्विटी फ़ंड हो सकते हैं, लेकिन उनका जोखिम व्यवहार एक-जैसा नहीं होता. जब स्मॉल-कैप चलते हैं, तो मिली-जुली लिस्ट स्मॉल-कैप जैसी दिखेगी. जब नहीं चलते, तो लिस्ट फिर बदल जाएगी. अगर आप पहले कैटेगरी तय नहीं कर रहे, तो आप फ़ंड्स की असली परफ़ॉर्मेंस की तुलना नहीं कर रहे, बल्कि कैटेगरी रोटेशन देख रहे हैं.
  • कंसिस्टेंसी उतनी आम नहीं होती जितना हेडलाइन रिटर्न दिखाते हैं: मज़बूत फ़ंड्स भी लंबे समय तक साधारण लग सकते हैं. यही वजह है कि वैल्यू रिसर्च, साधारण पॉइंट-टू-पॉइंट नंबरों की जगह रोलिंग रिटर्न पर ज़ोर देता है. रोलिंग रिटर्न एक ही शुरुआत और अंत नहीं, बल्कि कई ओवरलैपिंग पीरियड्स का इस्तेमाल करते हैं.

असली टेस्ट ‘टॉप 10’ नहीं, दोहराव है

अगर सवाल अब भी यही है कि क्या टॉप फ़ंड्स हमेशा टॉप पर रहते हैं, तो फ़्रेमवर्क को रैंकिंग से हटाकर रिपीटेबिलिटी पर लाना चाहिए.

नीचे एक सरल तरीक़ा है जिसे अपनाना चाहिए:

  • यूनिवर्स तय करें: सिर्फ़ एक ही कैटेगरी और एक ही प्लान टाइप के भीतर फ़ंड्स की तुलना करें.
  • ट्रेलिंग रिटर्न की जगह रोलिंग रिटर्न देखें: ऐसी परफ़ॉर्मेंस खोजें जो कई ओवरलैपिंग पीरियड्स में टिके.
  • रिस्क का नज़रिया जोड़ें: गिरावट, उतार-चढ़ाव और पोर्टफ़ोलियो व्यवहार के बिना सिर्फ़ रिटर्न पूरी कहानी नहीं बताते.

वैल्यू रिसर्च फ़ंड्स के लिए पॉइंट-टू-पॉइंट रिटर्न दिखाता है, जो एक शुरुआती झलक के तौर पर उपयोगी हैं. अहम बात ये है कि उस झलक को पहला क़दम मानें, फ़ैसला नहीं.

जब कोई फ़ंड टॉप 10 से बाहर हो जाए, तो क्या देखें

जब कोई फ़ंड ‘भारत में टॉप 10 हाई-रिटर्न म्यूचुअल फ़ंड्स’ की लिस्ट से बाहर होता है, तो ज़्यादातर निवेशक मान लेते हैं कि कुछ टूट गया है. अक्सर ऐसा नहीं होता.

इसके बजाय ये सवाल पूछिए:

क्या फ़ंड का व्यवहार बदला है? यानी पोर्टफ़ोलियो का झुकाव, टर्नओवर, कंसंट्रेशन और क्या फ़ंड अब भी वैसा ही है जैसा तब था जब उसने बेहतर परफ़ॉर्म किया था. मक़सद रोज़मर्रा के शोर में उलझना नहीं, बल्कि फ़ंड के व्यवहार को नतीजों से जोड़ना है. यही रिटर्न पढ़ने और फ़ंड पढ़ने का फ़र्क़ है.

या क्या बाज़ार ने खेल के नियम बदल दिए हैं? कोई फ़ंड ठीक से काम कर सकता है, फिर भी पिछड़ सकता है अगर जिस सेगमेंट को वह पसंद करता है, वह फ़िलहाल चलन से बाहर हो. ‘टॉप 10’ टेबल ये नहीं बताती कि फ़ंड इसलिए पिछड़ा क्योंकि उसने ज़्यादा जोखिम लिया जो काम नहीं आया, या इसलिए क्योंकि उसने अनुशासन रखा और बाज़ार किसी और स्टाइल को इनाम दे रहा था.

रोलिंग रिटर्न इन दोनों कहानियों को अलग करने में मदद करते हैं, क्योंकि वे दिखाते हैं कि फ़ंड ने कितनी बार, कितनी अलग-अलग विंडो में मज़बूत नतीजे दिए.

एक लाइन में असली सवाल का साफ़ जवाब

तो क्या टॉप फ़ंड्स हमेशा टॉप पर रहते हैं?

अगर ‘टॉप’ का मतलब पिछले एक साल के रिटर्न के हिसाब से टॉप 10 है, तो जवाब आमतौर पर नहीं होगा. ये लिस्ट हाल में जो चला, उसी से भरी होती है, और जो हाल में चला, वह बदलता रहता है.

अगर ‘टॉप’ का मतलब ऐसे फ़ंड्स हैं जो साइकल के पार बार-बार मज़बूत नतीजे देते हैं, तो जवाब हां के क़रीब हो सकता है, लेकिन तभी जब आप रोलिंग रिटर्न, कैटेगरी अनुशासन और रिस्क व्यवहार से कंसिस्टेंसी ठीक से जांचें.

लिस्ट के पीछे भागने के बजाय क्या करें

ज़्यादातर निवेशकों को हर साल नया फ़ंड नहीं चाहिए. उन्हें अपने मौजूदा फ़ंड्स और अगले विकल्प को परखने का एक दोहराया जा सकने वाला तरीक़ा चाहिए.

‘टॉप 10’ लिस्ट को ख़रीदारी की लिस्ट न मानें. उसे सिर्फ़ एक स्क्रीनिंग इनपुट मानें. फिर उसे रोलिंग रिटर्न, कैटेगरी के भीतर तुलना और रिस्क की साफ़ समझ से जांचें.

इसके अलावा, निवेश के लिए फ़ंड्स चुनना सिर्फ़ ख़बरों या वेबसाइट की लिस्ट से नहीं होना चाहिए. इसके बजाय ये बातें देखें:

  • आपकी जोखिम सहने की क्षमता: क्या आप बाज़ार के उतार-चढ़ाव को बिना घबराए सह सकते हैं, या कम लेकिन स्थिर रिटर्न चाहते हैं?
  • आपके फ़ाइनेंशियल लक्ष्य: निवेश क्यों कर रहे हैं? कार, ज़मीन, घर, बच्चे की पढ़ाई या शादी, या रिटायरमेंट के लिए? लक्ष्य तय होंगे, तो सही फ़ंड्स चुनना आसान होगा.
  • आपका टाइम होराइज़न: आप कितने समय के लिए निवेश करना चाहते हैं? 2-3 साल या उससे ज़्यादा, कम से कम 5-10 साल?
  • लॉन्ग-टर्म परफ़ॉर्मेंस: सिर्फ़ एक साल के रिटर्न पर न जाएं. तीन, पांच और दस साल में फ़ंड ने कैसा किया है, ये देखें और बेंचमार्क से तुलना करें.

आख़िर में, एक्सपेंस रेशियो, रेटिंग, रिस्क, AUM, लॉक-इन पीरियड जैसे अहम पैमानों को भी नज़रअंदाज़ न करें.

आपके लिए सही म्यूचुअल फ़ंड्स कैसे खोजें

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डिस्क्लेमर: ये लेख सिर्फ़ जानकारी और शिक्षा के उद्देश्य से है. ये किसी म्यूचुअल फ़ंड की रिमेंडेशन या व्यक्तिगत निवेश सलाह नहीं है. म्यूचुअल फ़ंड रिटर्न में उतार-चढ़ाव हो सकता है और पिछली परफ़ॉर्मेंस आगे भी वैसी ही रहे, इसकी गारंटी नहीं होती. निवेश से पहले अपनी जोखिम क्षमता, समय और डाइवर्सिफ़िकेशन पर विचार करें.

ये भी पढ़ेंः 2026 के लिए बेस्ट म्यूचुअल फ़ंड कैसे चुनें?

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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