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6 दिसंबर को हुए Fund Advisor Live सेशन में मैं जो बात समझाने की कोशिश कर रहा था, उसी का ये एक छोटा सा फ़ॉलो-अप है: लंबे समय में, ख़र्च में छोटा सा अंतर छोटा नहीं रहता.
एक दर्शक, वेंकिया ने एक उपयोगी सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि 12 प्रतिशत बनाम 11 प्रतिशत के काल्पनिक उदाहरण की जगह, क्यों न जनवरी 2013 से उसी फ़ंड के डायरेक्ट और रेगुलर प्लान की असली तुलना दिखाई जाए, जब डायरेक्ट प्लान शुरू हुए थे.
इसलिए हमने ठीक यही अभ्यास किया. कई फ़ंड्स के बड़े सेट में, ₹25,000 की SIP को 10 साल के लिए लिया गया (26 नवंबर 2025 तक के डेटा के साथ).
अब नतीजा, बिल्कुल आसान भाषा में आपके सामने है. मीडियन फ़ंड के लिए, 10 साल बाद डायरेक्ट प्लान लगभग 6.5 प्रतिशत आगे निकल जाता है. यानी उसी SIP पर, उसी स्कीम में, करीब ₹4.5 लाख ज़्यादा कॉर्पस, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हर साल कम ख़र्च चुकाया गया.
औसत फ़ंड से इतर देखें को ये आंकड़ा और भी बड़ा हो जाता है. आइए, टाटा डिजिटल इंडिया फ़ंड को देखते हैं. उसी 10 साल की अवधि में, डायरेक्ट प्लान रेगुलर प्लान से लगभग 10.6 प्रतिशत आगे रहा. ये अंतर करीब ₹8.4 लाख का है. इसमें कुछ भी असाधारण नहीं हुआ. न बाज़ार बदला, न फ़ंड बदला. सिर्फ़ ख़र्च बदला.
अब मान लीजिए कि वही SIP रिटर्न 30 साल तक बने रहते हैं. जो अंतर 10 साल में मामूली लगता है, वही पूरे निवेश जीवन में करोड़ों में बदल सकता है. टाटा डिजिटल इंडिया के उदाहरण में, उसी SIP पर ये फ़र्क़ क़रीब ₹26 करोड़ तक पहुंच सकता है.
यही बात ज़्यादातर निवेशक चूक जाते हैं. रिटर्न में छोटा सा लीकेज यानि रिसाव एक बार असर नहीं डालता. वो हर किस्त पर असर डालता है और कंपाउंडिंग बाक़ी काम कर देती है. असली नुक़सान बाद के वर्षों में साफ़ दिखता है.
एक अहम बारीक़ी यहां समझना ज़रूरी है: ये सलाह के ख़िलाफ़ तर्क नहीं है. अच्छी सलाह कोई ‘ख़र्च’ नहीं होती. अगर वो सही फ़ंड चुनने में मदद करे, सही एलोकेशन तय करे और सबसे मुश्किल समय में उस पर टिके रहने में मदद करे, तो वो वैल्यू जोड़ती है.
इसी वजह से वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र का डिफ़ॉल्ट तरीका है: सलाह + कम ख़र्च वाले डायरेक्ट प्लान. हम ‘डायरेक्ट बनाम रेगुलर’ को किसी दार्शनिक बहस की तरह नहीं देखते. हम इसे एक सीधा-सा निवेशक का फ़ायदा मानते हैं, जिसे डिफ़ॉल्ट रूप से हासिल किया जाना चाहिए, जब तक कि ऐसा न करने की कोई बहुत ख़ास वजह न हो.
निष्कर्ष सीधा है: अगर डिस्ट्रीब्यूशन या सलाह के लिए भुगतान किया जा रहा है, तो ये भी पक्का कर लें कि लगातार ऊंचे ख़र्च के ज़रिये कंपाउंडिंग चुपचाप कम न होती जा रही हो.
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