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एक समय था, बहुत ज़्यादा पुराना भी नहीं, जब इनकम टैक्स एक्ट में ये तय था कि सेक्शन 80C के तहत जितनी रक़म निवेश की जा सकती है, उसमें से सिर्फ़ ₹10,000 ही टैक्स-सेविंग म्यूचुअल फ़ंड में लगाए जा सकते हैं. बाक़ी पैसा कहीं और-PPF, इंश्योरेंस, NSC, जो भी हो- में जाना ज़रूरी था. सरकार ने अपनी समझ से ये तय कर लिया था कि इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड जोखिम भरे हैं और नागरिकों को उनके अपने उत्साह से बचाने की ज़रूरत है. इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि ELSS फ़ंड किसी भी वाजिब समयावधि में बाकी सभी विकल्पों से लगातार बेहतर परफ़ॉर्म कर चुके थे. नियम तो आखिर नियम था.
आख़िरकार वो सीमा हटा दी गई और आज अगर चाहें तो पूरा 80C एलोकेशन ELSS में लगाया जा सकता है. लेकिन जिस सोच ने वो नियम बनाया था, वो उस भरोसे पर आधारित थी कि रेगुलेटर सबसे अच्छा जानते हैं और उन्हें ही यह तय करना चाहिए कि नागरिक अपने पैसे का क्या करें. और, वो सोच बहुत व्यापक थी. भारतीय फ़ाइनेंशियल रेगुलेशन का इतिहास ऐसे निर्देशात्मक नियमों से भरा पड़ा है, जो ये मानकर चलते थे कि हर किसी की ज़िंदगी एक जैसी है.
यहीं से हाल में नेशनल पेंशन सिस्टम में हुए बदलावों की बात आती है. पेंशन रेगुलेटर ने अनिवार्य एन्युटी ख़रीद को घटाया है, लॉक-इन पीरियड हटाए हैं, 85 साल की उम्र तक निवेश की अनुमति दी है, सिस्टमैटिक विदड्रॉल के विकल्प जोड़े हैं और 100 प्रतिशत तक इक्विटी एलोकेशन की इजाज़त दी है. इन संशोधनों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि NPS अब पारंपरिक पेंशन स्कीम से कम और टैक्स फ़ायदे वाले निवेश अकाउंट जैसा ज़्यादा दिखने लगा है, जिसमें रिटायरमेंट से जुड़े फ़ीचर जुड़े हुए हैं.
कुछ टिप्पणीकारों को चिंता है कि इससे NPS का “पेंशन” वाला चरित्र कमज़ोर पड़ता है. आख़िरकार, शुरुआती सोच काफ़ी पितृसत्तात्मक थी. ये मान लिया गया था कि लोग रिटायरमेंट का पैसा समझदारी से ख़र्च नहीं करेंगे, इसलिए ज़्यादातर पैसा ज़बरदस्ती ऐसी एन्युटी में डाल दिया जाए जो जीवन भर हर महीने भुगतान करे. नई सोच ये कहती है कि ये आपका पैसा है, अपने फ़ैसले ख़ुद लीजिए.
क्या ये जोखिम भरा है? शायद. लेकिन दूसरे विकल्प पर भी नज़र डालिए. पुराने सख़्त नियम ये मानकर चलते थे कि हर NPS सब्सक्राइबर की फ़ाइनेंशियल स्थिति, परिवार की बनावट, सेहत की ज़रूरतें और जोखिम सहने की क्षमता एक जैसी है. जबकि हक़ीक़त ये है कि कोई भी दो रिटायरमेंट एक जैसे नहीं होते. किसी को किराए से आमदनी देने वाली प्रॉपर्टी विरासत में मिली हो सकती है. किसी के पास NPS कॉर्पस के अलावा कुछ भी न हो. कोई व्यक्ति एम्प्लॉयर द्वारा उपलब्ध कराए गए हेल्थ इंश्योरेंस के साथ रिटायर होता है जो जीवन भर चलता है, तो किसी को बुज़ुर्गावस्था के मेडिकल ख़र्चों की पूरी दहशत अकेले झेलनी पड़ती है. कुछ लोगों के बच्चे सहारा दे सकते हैं, तो कुछ के बच्चों को ख़ुद सहारे की ज़रूरत होती है.
इतनी विविधता के बीच, ऐसा कौन-सा तर्क हो सकता है जो हर किसी को अपने कॉर्पस का ठीक 40 प्रतिशत एन्युटी में डालने के लिए मजबूर करे? जिनके पास दूसरे काफ़ी एसेट हैं, उनको एन्युटी की ज़रूरत ही न हो. जो पूरी तरह NPS पर निर्भर हैं और जिनकी कोई दूसरी आमदनी नहीं है, उनके लिए 40 प्रतिशत भी कम पड़ सकता है. “वन साइज फ़िट्स ऑल” वाला नियम लगभग हर किसी के लिए ग़लत ही साबित होना तय था, बस अलग-अलग दिशाओं में.
यही निर्देशात्मक रेगुलेशन की बुनियादी समस्या है. ये निश्चितता का भरोसा देता है, लेकिन नतीजे ऐसे देता है जो किसी के लिए ठीक नहीं बैठते. सिस्टम ये कह सकता है कि उसने नागरिकों की सुरक्षा की. नागरिकों को ऐसे प्रोडक्ट मिलते हैं जो उनकी ज़िंदगी से मेल नहीं खाते. सैद्धांतिक रूप से सब संतुष्ट रहते हैं और व्यक्तिगत स्तर पर सब निराश.
PFRDA द्वारा अपनाया गया बेहतर तरीक़ा, ये है कि आदेश देने के बजाय सीमाएं तय की जाएं. विकल्पों की एक रेंज दी जाए. लोगों को, आदर्श रूप से सही सलाह और टूल्स के साथ, ये तय करने दिया जाए कि उनकी ख़ास स्थिति में क्या काम करता है. हां, कुछ लोग ग़लत फ़ैसले करेंगे. लेकिन सख़्त नियम भी ग़लत फ़ैसलों को रोक नहीं पा रहे थे, वो बस अलग तरह के ग़लत फ़ैसलों को अनिवार्य बना रहे थे.
ये सोच सिर्फ़ रेगुलेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि फ़ाइनेंशियल प्लानिंग पर भी लागू होती है. कई पोर्टफ़ोलियो टूल और रोबो-एडवाइज़र भी इसी जाल में फंस जाते हैं. वो उम्र और जोखिम सहने की क्षमता पूछते हैं, किसी मॉडल पोर्टफ़ोलियो में फिट कर देते हैं और मान लेते हैं कि काम पूरा हो गया. मान लिया जाता है कि 45 साल का हर “मॉडरेटली एग्रेसिव” (मध्यम रूप से आक्रामक) व्यक्ति एक जैसी फ़ाइनेंशियल ज़िंदगी जी रहा है. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र में, जब हमने अपने एल्गोरिदम डिज़ाइन किए, तो इस ग़लती से बचने को लेकर काफ़ी सजग थे. मक़सद लोगों को तय खांचों में डालना नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों को समझना है.
NPS में हुए बदलाव महज इसलिए स्वागत योग्य नहीं हैं कि लचीलापन हमेशा अच्छा होता है, बल्कि इसलिए कि सख़्ती साफ़ तौर पर काम नहीं कर रही थी. जब नियम हर किसी को एक ही रास्ते पर ज़बरदस्ती ले जाते हैं, चाहे उसे असल में कहीं और जाना हो, तब समस्या नियमों में होती है. पेंशन रेगुलेटर ने ये बात समझ ली है. उम्मीद है कि फ़ाइनेंशियल इकोसिस्टम के दूसरे हिस्से भी यही सबक़ सीखेंगे.
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