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फ़िक्स्ड इनकम का ट्रैप

भारत का बचत का कल्चर सेविंग करने वाले को छोड़कर बाक़ी सभी के लिए फ़ायदेमंद क्यों है

फ़िक्स्ड-इनकम के प्रति आपका जुनून आपकी वेल्थ को बर्बाद कर रहा हैAditya Roy/AI-Generated Image

कुछ साल पहले मैंने इस बारे में लिखा था कि भारत मूल रूप से अब भी एक फ़िक्स्ड इनकम वाला देश बना हुआ है. तब मैंने यह भी दिखाया था कि सबसे बेहतर उपलब्ध फ़िक्स्ड इनकम का विकल्प माना जाने वाला PPF भी, 44 वर्षों तक नियमित निवेश करने पर लगभग ₹60 लाख ही देता है, जबकि उसी अवधि में सेंसेक्स में समान निवेश से करीब ₹2.3 करोड़ की वेल्थ बन सकती है. यानी लगभग चार गुनी ज़्यादा वेल्थ- जो आरामदायक जीवन और वास्तव में अमीर होने के बीच का फ़र्क़ है. इसके बावजूद आज भी हम फ़िक्स्ड डिपॉज़िट रखने वालों का देश बने हुए हैं.

पिछले कुछ समय से मेरे मन में एक सवाल लगातार घूम रहा है: आखिर ऐसा क्यों है? यह जानकारी तो छिपी हुई नहीं है. म्यूचुअल फ़ंड के विज्ञापन हर जगह हैं. वित्तीय साक्षरता के अभियान लगातार चलते रहते हैं. गणित भी ज़्यादा जटिल नहीं है. फिर भी बड़े पैमाने पर लोगों का व्यवहार वास्तव में नहीं बदलता.

इसका एक हिस्सा यह समझने में छिपा है कि भारत की फ़िक्स्ड इनकम के प्रति इस दीवानगी से फ़ायदा किसे होता है. जैसा कहा जाता है-पैसे का पीछा कीजिए. जब आप बैंक में पैसा जमा करते हैं, तो बैंक उसे तिजोरी में बंद करके नहीं रखता. इसका एक बड़ा हिस्सा वैधानिक जरूरतों जैसे SLR और CRR के ज़रिए सरकार की ओर चला जाता है. बैंकों को अपनी जमा राशि का एक निश्चित प्रतिशत सरकारी बॉन्ड्स और RBI के पास नकद रिज़र्व के रूप में रखना होता है. व्यवहार में यह सरकार के लिए एक तरह की कैप्टिव (निजी) लेंडिंग व्यवस्था है. सरकार को खुले बाज़ार में प्रतिस्पर्धा किए बिना सस्ते पूंजी स्रोत उपलब्ध हो जाते हैं.

इसे सरकार के नज़रिए से देखिए. कोई भी सरकार, चाहे किसी भी राजनीतिक विचारधारा की हो, अपने नागरिकों को बैंक जमा से दूर और शेयर बाजार की ओर जाने के लिए सक्रिय रूप से क्यों प्रोत्साहित करेगी? संस्थागत प्रोत्साहन पूरी तरह इसके उलट दिशा में काम करता है. बैंक खाते से इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में जाने वाला हर एक रुपया, इस आरामदायक व्यवस्था के लिए उपलब्ध पूंजी में एक रुपया कम कर देता है.

PPF और अन्य स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स भी इसी तरह काम करती हैं, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि सरकार इस पैसे के लिए थोड़ा ज़्यादा ब्याज देती है. पोस्ट ऑफिस डिपॉज़िट, नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट और सुकन्या समृद्धि खाते-ये सभी सीधे नागरिकों से सरकार द्वारा उधार लेने के तरीके हैं. दरें देखने में आकर्षक लगती हैं, सॉवरेन गारंटी भरोसा देती है और टैक्स लाभ भी वास्तविक होते हैं. लेकिन मूल लेन-देन वही रहता है: आप सरकार को ऐसे रेट पर उधार देते हैं जो मुश्किल से महंगाई के साथ कदम मिला पाते हैं.

सांस्कृतिक पहलू भी उतना ही मजबूत है. पीढ़ियों से भारतीय मध्यम वर्ग में जोखिम के प्रति गहरा संदेह पनपता आया है. मामूली ही सही, लेकिन तय रिटर्न अस्थिर मगर बेहतर रिटर्न से ज्यादा सुरक्षित लगते हैं. माता-पिता बच्चों को FD में पैसा रखने की सलाह देते हैं. बैंक मैनेजर भरोसेमंद व्यक्ति माने जाते हैं. शेयर बाजार को सट्टेबाजों और बहुत अमीर लोगों की चीज समझा जाता है. यह पूरी तरह तर्कहीन भी नहीं है. हमारे इतिहास को देखते हुए पूंजी बचाने का तरीक़ा, उसे बढ़ाने से ज्यादा प्राथमिक लगता है.

लेकिन यहीं असली त्रासदी छिपी है. संस्थागत प्रोत्साहनों और सांस्कृतिक स्थितियों का यह मेल एक ऐसा सिस्टम बनाता है, जिसमें औसत बचतकर्ता दशकों के दौरान चुपचाप गरीब होता चला जाता है. महंगाई धीरे-धीरे फ़िक्स्ड इनकम रिटर्न की क्रय शक्ति को खा जाती है. टैक्स के बाद और महंगाई के बाद, बैंक FD असल में सिर्फ़ समय काटने का ज़रिया रह जाती है. बचतकर्ता खुद को सुरक्षित महसूस करता है, लेकिन वास्तव में पीछे छूट रहा होता है. वहीं, इस पैसे का प्रबंधन करने वाली संस्थाएं-बैंक, सरकार और पारंपरिक पॉलिसी बेचने वाली बीमा कंपनियां-अच्छा ख़ासा लाभ कमाती रहती हैं.

क्या भारतीय बचतकर्ता कभी इस जाल से बाहर निकल पाएगा? SIPs की हालिया बढ़त से ख़ासकर युवा निवेशकों में कुछ हलचल ज़रूर दिखती है. लेकिन आज भी भारतीय बचत का बड़ा हिस्सा किसी न किसी रूप में फ़िक्स्ड इनकम साधनों में ही अटका हुआ है. संरचनात्मक प्रोत्साहन नहीं बदले हैं. सरकार को अब भी सस्ती पूंजी चाहिए. बैंकों को स्थिर जमा चाहिए. और, सुरक्षा को ग्रोथ से ऊपर रखने की सांस्कृतिक सोच अब भी गहराई से जमी हुई है.

शायद “बचना” बहुत बड़ा शब्द है. बेहतर उम्मीद यही की जा सकती है कि धीरे-धीरे जागरूकता आए, यह समझ विकसित हो कि असली जोखिम अस्थिरता नहीं, बल्कि अपर्याप्त रिटर्न है. और, जब आंकड़े मेल नहीं खाते, गारंटीड कम रिटर्न सुरक्षा नहीं, बल्कि एक अलग किस्म का खतरा है-जो दशकों बाद रिटायरमेंट के समय सामने आता है. यह सिस्टम आपकी मदद के लिए नहीं बदलेगा. आपको इसके बावजूद खुद बदलना होगा.

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