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टाटा एथिकल फ़ंड: क्या यह शरिया फ़ंड सही विकल्प है?

रिटर्न और पोर्टफ़ोलियो स्ट्रक्चर को समझेंगे तो फ़ैसला करना आसान हो जाएगा

टाटा एथिकल फ़ंड: क्या यह शरिया-कम्प्लायंट फ़ंड आपके लिए सही है?Aditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः टाटा एथिकल फ़ंड के तीन दशक पूरे होने पर यह देखा गया है कि यह शरिया-कम्प्लायंट फ़ंड अब तक कैसा प्रदर्शन करता रहा है. साथ ही यह भी समझा गया है कि शरिया-आधारित निवेश क्या होता है और ऐसे फ़ंड में निवेश करने की अवसर लागत (opportunity costs) क्या हो सकती है.

टाटा एथिकल फ़ंड इस साल 30 साल पूरे कर रहा है और भारत का सबसे पुराना शरिया-कम्प्लायंट म्यूचुअल फ़ंड है. शरिया-आधारित निवेश कुछ तय सिद्धांतों पर चलता है, जिनके तहत ब्याज़ आधारित उधारी से कमाई करने वाली कंपनियों या गैर-स्वीकृत गतिविधियों में शामिल बिज़नेस में निवेश की इजाज़त नहीं होती. इसी वजह से पारंपरिक बैंकिंग और फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ के साथ-साथ शराब, लिकर, तंबाकू और सिगरेट जैसे सेक्टर भी बाहर हो जाते हैं.

निवेश के अपने अलग दायरे और स्ट्रैटेजी को देखते हुए, यहां टाटा एथिकल फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो एलोकेशन, व्यापक बाज़ार इंडेक्स के मुक़ाबले इसके प्रदर्शन और यह पोर्टफ़ोलियो में जगह पाने लायक है या नहीं, इस पर क़रीब से नज़र डाली गई है.

फ़ंड निवेश कैसे करता है?

फ़िलहाल, टाटा एथिकल फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो में 63 स्टॉक्स हैं. इनमें से टॉप 10 स्टॉक्स की पोर्टफ़ोलियो में लगभग 35 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो एक मध्यम स्तर की कंसन्ट्रेशन को दिखाता है. सेक्टर स्तर पर, टॉप तीन सेक्टर फ़ंड के कुल इक्विटी एक्सपोज़र का 50 प्रतिशत से थोड़ा ज़्यादा हिस्सा रखते हैं.

मार्केट कैपिटलाइज़ेशन के लिहाज़ से फ़ंड का झुकाव बड़ी कंपनियों की ओर है. पोर्टफ़ोलियो का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा लार्ज-कैप स्टॉक्स में लगा है, जबकि मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्टॉक्स का हिस्सा क्रमशः लगभग 31 प्रतिशत और 19 प्रतिशत है.

बैंकिंग और फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ की गैर-मौजूदगी में फ़ंड टेक्नोलॉजी सेक्टर में ज़्यादा निवेश करता है, जिसका हिस्सा 22 प्रतिशत है. इसके बाद मटीरियल्स 17 प्रतिशत और हेल्थकेयर 13 प्रतिशत के साथ आते हैं. कंज़्यूमर डिस्क्रेशनरी का हिस्सा क़रीब 12 प्रतिशत है, जबकि कंज़्यूमर स्टेपल्स लगभग 11 प्रतिशत का योगदान देता है.

बैंकिंग और फ़ाइनेंशियल स्टॉक्स को बाहर रखने की ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट

इक्विटी मार्केट में बैंकिंग और फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ की भूमिका अलग तरह की होती है. अलग-अलग सेक्टर को लोन देने के साथ, बैंक अर्थव्यवस्था की कई गतिविधियों से जुड़े रहते हैं, जिससे पूरे साइकल में सेक्टोरल रिस्क को फैलाने में मदद मिलती है. इस सेगमेंट को बाहर रखने से पोर्टफ़ोलियो से डाइवर्सिफ़िकेशन का एक अहम स्रोत हट जाता है.

इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि निवेशक भारत के एक बड़े ग्रोथ इंजन में हिस्सेदारी से वंचित रह जाते हैं. पिछले पांच सालों में बैंक ऑफ़ बड़ौदा, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया और ICICI बैंक जैसे बड़े बैंकों ने मज़बूत ग्रोथ दिखाई है और व्यापक बाज़ार रिटर्न में अहम योगदान दिया है. डिज़ाइन के हिसाब से टाटा एथिकल फ़ंड इन मौक़ों से पूरी तरह बाहर रहता है.

जिन निवेशकों पर शरिया या इसी तरह की नैतिक पाबंदियां नहीं हैं, उनके लिए यह समझना ज़रूरी है कि यह एक स्थायी निषेध है और इसके साथ जुड़ी ग्रोथ की ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट को स्वीकार करना होगा.

अतीत में फ़ंड का प्रदर्शन कैसा रहा है?

टाटा एथिकल फ़ंड के पिछले प्रदर्शन को परखने के लिए, इसके बेंचमार्क निफ़्टी 500 शरिया टोटल रिटर्न इंडेक्स और निफ़्टी 500 टोटल रिटर्न इंडेक्स के मुक़ाबले तीन साल के रोलिंग रिटर्न के आधार पर इसका आउटपरफ़ॉर्मेंस देखा गया.

टाटा एथिकल फ़ंड ब्रॉडर मार्केट के मुकाबले कहां खड़ा है?

हमने इसके बेहतर प्रदर्शन की तुलना इसके पेरेंट इंडेक्स और निफ़्टी 500 TRI से की है

  निफ़्टी 500 शरिया टोटल रिटर्न इंडेक्स (%) निफ़्टी 500 टोटल रिटर्न इंडेक्स (%)
आउटपरफ़ॉर्मेंस 44.4 50.5
0-2% आउटपरफ़ॉर्मेंस 29.6 18.7
2-4% आउटपरफ़ॉर्मेंस 14.6 16.4
4-6% आउटपरफ़ॉर्मेंस 0.1 10.2
>6% आउटपरफ़ॉर्मेंस 0 5.2
जनवरी 2016 से जनवरी 2026 तक का डेटा लिया गया है, जो तीन साल के रोलिंग रिटर्न पर आधारित है

ऊपर दी गई टेबल से पता चलता है कि फ़ंड ने 44.4 प्रतिशत रोलिंग पीरियड में निफ़्टी 500 शरिया TRI से बेहतर प्रदर्शन किया. हालांकि, यह बढ़त ज़्यादातर सीमित रही, क्योंकि लगभग 30 प्रतिशत पीरियड में आउटपरफ़ॉर्मेंस 0–2 प्रतिशत के दायरे में ही रहा, जबकि 2 प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़त वाले मामले करीब 15 प्रतिशत रहे.

निफ़्टी 500 TRI से तुलना करने पर फ़ंड का आउटपरफ़ॉर्मेंस थोड़ा बेहतर दिखता है, जहां यह करीब 50.5 प्रतिशत रोलिंग पीरियड में इंडेक्स से आगे रहा.

निष्कर्ष के तौर पर, भले ही टाटा एथिकल फ़ंड ने तीन और पांच साल की अवधि में औसतन करीब 15 प्रतिशत के ठीक-ठाक रिटर्न दिए हों, लेकिन यह अपने बेंचमार्क को न तो लगातार और न ही निर्णायक रूप से मात दे सका. K.P.R. Mill जैसे स्टॉक्स, जिनका XIRR 106 प्रतिशत रहा, टाटा एलेक्सी के क़रीब 90 प्रतिशत रिटर्न या भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स जैसी लंबे समय से होल्ड की गई पोज़िशन, जिनका एलोकेशन 1 प्रतिशत से ऊपर रहा, भी नतीजों को बेंचमार्क से साफ़ तौर पर ऊपर नहीं ले जा सके.

क्या इस शरिया-कम्प्लायंट फ़ंड में निवेश करना सही है?

भले ही, टाटा एथिकल फ़ंड का प्रदर्शन ठीक रहा है, लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह शरिया-कम्प्लायंट मैंडेट के तहत चलता है. इसके चलते कुछ सेक्टर निवेश फ़्रेमवर्क से मेल न खाने के कारण बाहर हो जाते हैं, जिसका असर फ़ंड के रिटर्न पर काफ़ी हद तक पड़ सकता है.

जिन निवेशकों के निवेश के फ़ैसले शरिया सिद्धांतों या इसी तरह के नैतिक फ़्रेमवर्क पर आधारित हैं, उनके लिए यह फ़ंड उन्हीं सीमाओं के भीतर इक्विटी बाज़ार में एक्सपोज़र देता है. ऐसे मामलों में कुछ सेक्टरों का बाहर रहना और उससे जुड़ी ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट, किसी अनचाहे समझौते की बजाय निवेश के फ़ैसले का ही हिस्सा होती है.

अगर यह तय करने में उलझन हो कि इस फ़ंड में या किसी और में निवेश किया जाए, तो Value Research Advisor App डेटा और एक्सपर्ट के फ़ैसलों के आधार पर बेहतर रिटर्न या स्थिर इनकम के लिए सही फ़ंड चुनने में मदद करता है, अंदाज़ों के भरोसे नहीं.

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यह भी पढ़ेंः निफ़्टी स्मॉल कैप 250 क्वालिटी 50 इंडेक्स कितना बेहतर है?

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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