फंड वायर

क्या ज़्यादा मल्टीबैगर मतलब बेहतर मिड-कैप रिटर्न है?

क्यों सिर्फ़ मल्टीबैगर की गिनती से मिड-कैप फ़ंड का प्रदर्शन तय नहीं होता

क्या ज़्यादा मल्टीबैगर का मतलब बेहतर मिड-कैप रिटर्न है?Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः मिड-कैप फ़ंड के लिए मल्टीबैगर शेयर खोजना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन क्या किसी फ़ंड में ऐसे शेयरों की संख्या ही उसके रिटर्न तय करती है? हमने लंबे समय के प्रदर्शन को देखा और इसका जवाब समझने की कोशिश की.

इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड के लिए यह बहुत अहम होता है कि उनके पोर्टफ़ोलियो में कौन से शेयर हैं. और, अगर किसी फ़ंड में कई मल्टीबैगर शेयर हों, यानी ऐसे शेयर जिन्होंने निवेशकों की रक़म कई गुना बढ़ाई हो, तो क्या उसका रिटर्न बेहतर नहीं होना चाहिए?

ज़रूरी नहीं. ख़ासकर मिड-कैप फ़ंड में मल्टीबैगर मिल जाना कोई बहुत बड़ा काम नहीं है. असली सवाल यह है कि क्या इससे निवेशकों को वाक़ई बेहतर नतीजे मिले? इसी को हमने यहां परखा है.

मल्टीबैगर तभी फ़ायदा देते हैं जब उनमें सही हिस्सेदारी हो

यह समझने के लिए हमने उन मिड-कैप फ़ंड्स को देखा जिनके पास दिसंबर 2019 से दिसंबर 2025 के बीच कम से कम तीन गुना रिटर्न देने वाले सबसे ज़्यादा शेयर थे. यह सालाना क़रीब 44 प्रतिशत या उससे ज़्यादा बढ़त के बराबर है. इसके बाद हमने यह भी देखा कि इनमें से कितने मल्टीबैगर में फ़ंड ने 1 प्रतिशत से ज़्यादा पैसा लगाया था. इसे हमने मजबूत भरोसे वाली हिस्सेदारी माना.

ये भी पढ़ें: 3 साल में किन स्मॉल-कैप फ़ंड्स ने खोजे सबसे ज़्यादा मल्टीबैगर?

मल्टीबैगर के मामले में साइज़ भी अहम है

भले ही, कई फ़ंड्स के पास बड़ी संख्या में मल्टीबैगर थे, लेकिन सभी में उनकी हिस्सेदारी काफ़ी नहीं थी.

फ़ंड का नाम
मल्टीबैगर की संख्या 1% या उससे ज़्यादा एलोकेशन वाले मल्टीबैगर मज़बूत भरोसे वाले दांव (%)
Nippon India Growth Mid Cap 31 22 71
HSBC Midcap 29 23 79.3
Franklin India Mid Cap 28 26 92.9
HDFC Mid Cap 28 23 82.1
Aditya Birla Sun Life Mid Cap 27 21 77.8
Edelweiss Mid Cap 26 24 92.3
Axis Midcap 25 22 88
Kotak Midcap 24 22 91.7
Mirae Asset Midcap 21 18 85.7
ICICI Prudential Midcap 21 12 57.1
डेटा: दिसंबर 2019 से दिसंबर 2025 तक. इस अवधि में तीन गुना बढ़ने वाले शेयरों को मल्टीबैगर माना गया.

पहली नज़र में ये आंकड़े काफ़ी अच्छे लगते हैं. लेकिन सिर्फ़ गिनती से पूरी तस्वीर साफ़ नहीं होती. उदाहरण के लिए, ICICI Prudential Midcap Fund के पास 21 मल्टीबैगर थे, लेकिन उनमें से सिर्फ़ 12 में ही 1 प्रतिशत से ज़्यादा निवेश था. यानी भरोसे वाली हिस्सेदारी सिर्फ़ 57 प्रतिशत रही. वहीं Franklin और Edelweiss ने अपने 92 प्रतिशत से ज़्यादा विनर्स में ठीक-ठाक हिस्सेदारी रखी. फ़र्क़ सिर्फ़ पहचान में नहीं, भरोसे में था.

लेकिन सिर्फ़ भरोसा भी काफ़ी नहीं है. यह भी देखना ज़रूरी है कि इन मल्टीबैगर शेयरों ने फ़ंड के कुल रिटर्न में कितना योगदान दिया.

जब मल्टीबैगर ने असली काम किया

सवाल यह है कि क्या इन शेयरों ने फ़ंड की वेल्थ सच में बढ़ाई और कितनी बढ़ाई?

इसे समझने के लिए हमने 1 जनवरी 2020 को ₹10,000 का निवेश मान लिया और 31 दिसंबर 2025 तक उसकी वैल्यू देखी. नीचे दिया गया डेटा बताता है कि छह साल बाद कुल पोर्टफ़ोलियो वैल्यू का कितना हिस्सा सिर्फ़ मल्टीबैगर शेयरों से आया.

जहां मल्टीबैगर ने बड़ा योगदान दिया

छह साल बाद अंतिम पोर्टफ़ोलियो वैल्यू में मल्टीबैगर का हिस्सा

फ़ंड 
फ़ंड वैल्यू में मल्टीबैगर का योगदान (%)
Edelweiss Mid Cap 82.3
Nippon India Growth Mid Cap 81.1
Kotak Midcap 79.7
HDFC Mid Cap 75.9
Aditya Birla Sun Life Mid Cap 74.2
Franklin India Mid Cap 73.2
HSBC Midcap 71.2
Axis Midcap 70.9
Mirae Asset Midcap 57.4
ICICI Prudential Midcap 48.7
फ़ंड कंट्रीब्यूशन का अनुमान स्टॉक्स के XIRR और एसेसमेंट पीरियड में उनके एवरेज पोर्टफोलियो एलोकेशन पर आधारित है. डेटा दिसंबर 2019 से दिसंबर 2025 के बीच का है.

ऊपर के आंकड़ों से साफ़ है कि Edelweiss, Nippon, Kotak और HDFC जैसे फ़ंड्स की कुल वैल्यू का क़रीब या उससे ज़्यादा 80 प्रतिशत हिस्सा मल्टीबैगर से आया. लेकिन Mirae Asset Midcap और ICICI Prudential Midcap जैसे फ़ंड्स में मल्टीबैगर होने के बावजूद उनका योगदान कम रहा.

साथ ही, दिलचस्प बात यह है कि Invesco India Mid Cap Fund, Motilal Oswal Midcap Fund और LIC MF Midcap Fund जैसे अच्छे रिटर्न देने वाले फ़ंड इस सूची में थे ही नहीं.

इससे यह समझ में आता है कि मल्टीबैगर का ज़्यादा योगदान एक तरीक़ा हो सकता है, लेकिन बेहतर प्रदर्शन के लिए यह ज़रूरी शर्त नहीं है.

मल्टीबैगर गिनना आसान, लेकिन उन्हें असरदार बनाना मुश्किल  है

मिड-कैप फ़ंड या कोई भी इक्विटी फ़ंड सिर्फ़ ज़्यादा मल्टीबैगर खोजने से बेहतर नहीं बनता. असली बात यह है कि क्या फ़ंड मैनेजर उन शेयरों पर भरोसा करते हैं, उन्हें समय देते हैं और इतना निवेश करते हैं कि उनका असर रिटर्न पर दिखे.

निवेशकों के लिए ज़रूरी यह नहीं है कि फ़ंड में कितने मल्टीबैगर हैं, बल्कि यह है कि उसका लॉन्ग-टर्म प्रदर्शन कैसा है, फ़ंड मैनेजर का रिकॉर्ड कैसा है, एक्सपेंस रेशियो कितना है, NAV क्या है और निवेशक की अपनी रिस्क लेने की क्षमता और लक्ष्य क्या हैं.

कौन-सा मिड-कैप फ़ंड सही रहेगा, यह जानने के लिए वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र की मदद ली जा सकती है. यहां डेटा पर आधारित रेकमेंडेशन मिलती हैं, जो लक्ष्यों के हिसाब से सही चुनाव करने में मदद करते हैं.

अनुमान से नहीं, सोच-समझकर निवेश करें.

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ये भी पढ़ें: मल्टीबैगर का पीछा करने से फ़्लेक्सी-कैप के रिटर्न क्यों नहीं बनते?

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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