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सारांशः जियोपॉलिटिकल झटकों से बाज़ार में उथल-पुथल होना लाज़मी है. पर इतिहास हमें बताता है कि बाज़ार आख़िरकार संभल ही जाता है. कई मामलों में घबराकर बेच देना निवेशकों को उन घटनाओं से भी ज़्यादा नुक़सान पहुंचाता है जिनसे गिरावट शुरू हुई थी.
‘अमेरिका ने ईरान पर हमला किया’. ‘सेंसेक्स 1,000 पॉइंट से ज़्यादा गिरा’. ‘कच्चे तेल की क़ीमतों में 8 प्रतिशत से ज़्यादा का इज़ाफ़ा’.
ऐसी ही कुछ ख़बरें बीते हफ़्ते हर जगह दिख रही थीं. ज़ाहिर है ,बाज़ार ने भी तेज़ गिरावट के साथ प्रतिक्रिया दी.
हालांकि, किसी संकट पर तुरंत होने वाली प्रतिक्रिया हमेशा सही तस्वीर नहीं दिखाती. कई बार बाज़ार शुरुआत में साफ़ आर्थिक असर की क़ीमत नहीं लगाते, बल्कि अनिश्चितता की क़ीमत लगाते हैं. और जब अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक ज़्यादा रिस्क प्रीमियम की मांग करते हैं, जिससे क़ीमतों में बदलाव आता है.
बाज़ार आपकी उम्मीद से भी जल्दी संभल जाते हैं
युद्ध जैसे भू-राजनीतिक संकट शुरू में बाज़ार के लिए बड़ी तबाही जैसे लग सकते हैं. लेकिन, हक़ीक़त अक्सर इससे अलग होती है.
इतिहास ने दिखाया है कि शॉर्ट टर्म में भारी गिरावट तो आती है, लेकिन रिकवरी भी जल्दी होती है. नीचे दी गई टेबल में पिछले कुछ ख़ास भू-राजनीतिक घटनाक्रम और उनके बाद बाज़ार (निफ़्टी 50) की प्रतिक्रिया दिखाई गई है.
शॉर्ट टर्म गिरावट के बाद तेज़ रिकवरी
शॉर्ट टर्म में गिरावट के बावजूद बाज़ार अक्सर जल्दी संभल जाते हैं
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तारीख़
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घटना | उस महीने की सबसे बड़ी गिरावट (%) | एक साल का रिटर्न (%) |
|---|---|---|---|
| 20 मार्च 2003 | अमेरिका-इराक युद्ध | -8 | 60 |
| 13 सितम्बर 2008 | दिल्ली सिलसिलेवार धमाके | -15 | 18 |
| 26 नवम्बर 2008 | मुंबई हमले | -19 | 82 |
| 20 फ़रवरी 2014 | क्रीमिया का अधिग्रहण (रूस-यूक्रेन) | -2 | 45 |
| 28 सितम्बर 2016 | उरी सर्जिकल स्ट्राइक | -4 | 12 |
| 26 फ़रवरी 2019 | बालाकोट एयर स्ट्राइक | -4 | 10 |
| 5 मई 2020 | गलवान झड़प | -5 | 58 |
| 24 फ़रवरी 2022 | रूस-यूक्रेन युद्ध | -9 | 7 |
| यहां निफ़्टी 50 को बेंचमार्क माना गया है. | |||
डेटा एक साफ़ पैटर्न दिखाता है. झटके के तुरंत बाद का समय अक्सर उतार-चढ़ाव भरा होता है, लेकिन अगले एक साल में बाज़ार कई बार संभल जाते हैं और अच्छे रिटर्न भी देते हैं.
इसका मतलब यह नहीं कि भू-राजनीतिक घटनाओं का अर्थव्यवस्था पर असर नहीं होता. बल्कि यह दिखाता है कि बाज़ार डर को बहुत जल्दी क़ीमत में शामिल कर लेते हैं, जबकि लॉन्ग-टर्म के रिटर्न ज़्यादातर बड़ी आर्थिक ताक़तों से तय होते रहते हैं.
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कई बार बाज़ार गिरने के लिए निवेशक ख़ुद ज़िम्मेदार होते हैं
भू-राजनीतिक संकट अक्सर बाज़ार में तेज़ गिरावट ला सकते हैं, लेकिन यह गिरावट सिर्फ़ आर्थिक कारणों से नहीं होती. निवेशकों का मनोविज्ञान भी इसमें अहम भूमिका निभाता है.
अनिश्चितता के समय कुछ इस तरह के हालात और ज़्यादा दिखाई देते हैं:
- उपलब्धता झुकाव: लगातार नाटकीय ख़बरें हाल की घटनाओं को लंबे समय तक रहने वाले संकट जैसा महसूस करा देती हैं.
- नुक़सान से बचने की प्रवृत्ति: गिरती क़ीमतों का दर्द जल्दी बेचने की इच्छा बढ़ा देता है.
- भीड़ का असर: जब बाज़ार गिरता है तो निवेशक भीड़ का पीछा करने लगते हैं.
- हालिया अनुभव का असर: मार्केट में हाल की गिरावट एक गहरी गिरावट की शुरुआत का संकेत देती है.
- तुरंत कुछ करने की प्रवृत्ति: निवेशकों को तुरंत कुछ करने की इच्छा होती है, जबकि कई बार इंतज़ार बेहतर होता है.
इन सबका असर मिलकर क़ीमतों को उस स्तर से भी नीचे ले जा सकता है जिसे बिज़नेस की असली हालत सही ठहराती है. किसी भू-राजनीतिक हेडलाइन से ज़्यादातर कंपनियों की लंबी अवधि की क़ीमत अचानक 10 या 15 प्रतिशत कम नहीं हो जाती. लेकिन निवेशक जब भावनात्मक प्रतिक्रिया देते हैं तो शेयर क़ीमतें इतनी गिर सकती हैं.
लेकिन घबराकर बेचने के अपने अलग जोख़िम होते हैं.
- पहला है रीइन्वेस्टमेंट रिस्क. जो निवेशक बाज़ार से निकल जाता है, उसे दो सही फैसले लेने होते हैं: कब बेचना और कब दोबारा ख़रीदना. व्यवहार में दूसरा फै़सला अक्सर ज़्यादा मुश्किल होता है. निवेशक ज़्यादा क़ीमत पर वापस ख़रीदने से हिचकते हैं और फिर किसी नई गिरावट का इंतज़ार करते रहते हैं जो कभी आती ही नहीं.
- दूसरा है कैश रिस्क. शॉर्ट टर्म में कैश रखना सेफ लग सकता है, लेकिन समय के साथ यह मुश्किलें खड़ी करता है. महंगाई आपकी ख़रीदने की ताक़त कम करती है, कंपाउंडिंग के मौक़े ग़ायब हो जाते हैं और बार-बार मार्केट टाइमिंग करने की कोशिश ग़लतियों की संभावना बढ़ा देती है.
- और आख़िर में, बाज़ार की रिकवरी अक्सर तब शुरू होती है जब ख़बरें अभी भी अच्छी नहीं होतीं. बाज़ार के कई सबसे मज़बूत दिन उसी समय आते हैं जब अनिश्चितता बनी रहती है. जो निवेशक पूरी स्पष्टता का इंतज़ार करते हैं, वे शुरुआती रिकवरी मिस कर देते हैं.
इसलिए बाज़ार के तनाव वाले समय एक अजीब स्थिति पैदा करते हैं: जिस समय निवेशक बाज़ार से दूर रहना चाहते हैं, वही समय अक्सर भविष्य के बेहतर रिटर्न की शुरुआत बन जाता है.
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हर गिरावट में ख़रीदना काम नहीं करता
हालांकि बाज़ार की गिरावट कई बार अच्छे एंट्री पॉइंट देती है, क्योंकि उस समय मजबूरी में बेचने वाले ज़्यादा होते हैं, ख़रीदने की प्रतिस्पर्धा कम होती है और रिस्क प्रीमियम बढ़ जाता है, लेकिन यह तभी काम करता है जब झटका सिर्फ़ अनिश्चितता पैदा करे, न कि स्ट्रक्चरल इकोनॉमिक नुक़सान.
अगर बाज़ार की गिरावट से बड़े आर्थिक बदलाव शुरू हो जाएं, जैसे तेल की क़ीमतों में लगातार तेज़ी, महंगाई का तेज़ दौर या तेज़ मॉनेटरी सख़्ती, तो इसका असर ज़्यादा समय तक रह सकता है.
वैल्यूएशन भी यहां अहम भूमिका निभाते हैं. बाज़ार गिरने का मतलब यह नहीं कि शेयर अपने-आप सस्ते हो गए. अगर गिरावट के बाद भी वैल्यूएशन ज़्यादा हैं, तो संभावित रिटर्न सीमित रह सकते हैं. ऐसे मामलों में भू-राजनीतिक झटका सिर्फ़ पहले से महंगे बाज़ार में सुधार या ठहराव को तेज़ कर सकता है.
आपने क्या समझा?
भू-राजनीतिक संकट स्वभाव से ही अनिश्चित होते हैं और शॉर्ट टर्म में बाज़ार को हिला सकते हैं. निवेशक जब अनिश्चितता से जूझते हैं तो क़ीमतें तेज़ी से बदलती हैं. लेकिन इतिहास बताता है कि ये गिरावटें अक्सर अस्थायी होती हैं और बाज़ार फिर अपनी लंबी अवधि की दिशा में लौट आते हैं.
निवेशकों के लिए अक्सर सबसे समझदारी भरा क़दम यही होता है कि वे शांत रहें और जल्दबाज़ी में प्रतिक्रिया न दें. घबराकर बेच देना नए जोख़िम पैदा कर सकता है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि हालात सामान्य होने के बाद बाज़ार में दोबारा प्रवेश करना अक्सर उतना आसान नहीं होता जितना दिखता है.
ऐसे समय निवेशकों को बुनियादी बातों पर ध्यान देना चाहिए. असली सवाल यह है कि क्या मौजूदा क़ीमतें उन बिज़नेस की लॉन्ग-टर्म की संभावनाओं को सही तरह दिखाती हैं जिन्हें आप रखते हैं. सिर्फ़ क़ीमत गिरने से कोई शेयर अपने-आप आकर्षक नहीं हो जाता, ख़ासकर अगर कमाई की संभावना कमज़ोर हो या वैल्यूएशन पहले से ऊंचे हों.
और अगर आप ऐसे बिज़नेस में निवेश करना चाहते हैं जिनके फ़ंडामेंटल मज़बूत हों, वैल्यूएशन संतुलित हों और जो कई मार्केट साइकल और गिरावटों के बाद भी टिके रहे हों, तो वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र सब्सक्राइब कर सकते हैं. यहां आपको हमारी रेकमेंडेशन की लिस्ट मिलती है, जिससे आप समझ सकते हैं कि कौन से बिज़नेस लंबे समय में कंपाउंड कर सकते हैं, न कि हर संकट में आपको बेचने पर मजबूर करें.
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ये लेख पहली बार मार्च 11, 2026 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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